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Veer Chakra

वीर चक्र सिपाही सरदार सिंह

—— शौर्य दिवस -शौर्यनमन—–
सिपाही सरदार सिंह
वीर चक्र
यूनिट – 2 डोगरा रेजिमेंट
ऑपरेशन आइबेक्स 1989
ऑपरेशन मेघदूत
सिपाही सरदार सिंह का जन्म 10 अगस्त 1964 को श्री धर्म सिंह के घर में हुआ था। वह हिमाचल प्रदेश के चंबा जिले के सिहुन्ता तहसील के हटली गांव के निवासी थे। 26 अक्टूबर 1983 को वह भारतीय सेना की डोगरा रेजिमेंट में रंगरूट के रूप में भर्ती हुए थे। प्रशिक्षण के पश्चात उन्हें 2 डोगरा बटालियन में नियुक्त किया गया था।
वर्ष 1984 से ही सियाचिन ग्लेशियर में भारत और पाकिस्तान के मध्य रह-रह कर युद्ध होते रहे हैं। वहां घास का एक तिनका भी नहीं उगता, किंतु अपने सामरिक महत्व के कारण सियाचिन विश्व का सर्वाधिक ऊंचा युद्ध क्षेत्र बना हुआ है। भारतीय सेना सियाचिन ग्लेशियर के पश्चिम में साल्टोरो रिज पर लगभग सभी प्रमुख ऊंचाइयों पर अधिकार कर चुकी है।
प्रभुत्व रखने के लिए और चोटी के उत्तर और पश्चिम में रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण स्थितियों पर प्रभावी होने के लिए, वर्ष 1984 से ही समय और स्थान के चयन पर भारतीय सेना इस क्षेत्र में अभियान चलाती रही है। अप्रैल 1984 में ऑपरेशन मेघदूत, जून 1987 में ऑपरेशन राजीव और अप्रैल 1989 में ऑपरेशन आइबेक्स भारतीय सेना द्वारा सफलतापूर्वक चलाए गए निर्णायक ऑपरेशन हैं। 2 डोगरा बटालियन भी ‘ऑपरेशन आइबेक्स’ में सम्मिलित थी।
—— ऑपरेशन आइबेक्स ——
11 अप्रैल 1989 को भारतीय सेना द्वारा सियाचिन ग्लेशियर क्षेत्र के चुमिक ग्योंगला क्षेत्र में “ऑपरेशन आइबेक्स” आरंभ किया गया था। इस ऑपरेशन का उद्देश्य साल्टोरो चोटी पर सामरिक महत्व के मैदान पर अधिकार करना था जिससे शत्रु को आगे ही रोका जा सके और उसकी आक्रामक योजना को विफल किया जा सके। ऑपरेशन का क्षेत्र 15,000 और 22,000 फीट की ऊंचाई के मध्य भिन्न-भिन्न स्थानों पर था।
अति अल्प तापमान था, जो न्यूनतम माइनस 30 डिग्री सेल्सियस तक भी जा रहा था। वायु की गति 80 किमी प्रति घंटे तक पहुंच गई थी। प्राकृतिक कारणों और शत्रु की गोला वृष्टि के कारण वहां व्यापक स्तर पर हिमस्खलन होना सामान्य घटनाएं थीं। सिपाही सरदार सिंह को कामेन से ICE WALL-1 तक के मार्ग को खोलने वाली विशेष टुकड़ी के सदस्य के रूप में चुना गया था।
30 अप्रैल/1मई 1989 की रात्रि को, सिपाही सरदार सिंह बंप कहलाने वाले भूभाग के दक्षिण-पश्चिमी पहुंच स्थान की रक्षा करने वाले एक लघु समूह के सदस्य थे। लांस नायक प्रेम सिंह ने जब उनके स्थान पर संतरी ड्यूटी संभाली और उन्हें मुक्त किया तो वह अपने शिविर पर लौटे ही थे और जूते उतार कर एक लघु से चूल्हे पर अपने हाथ, पैर और शस्त्र तपा रहे थे। उसी समय शत्रु ने आक्रमण कर दिया। संतरी, लांस नायक प्रेम सिंह की चेतावनी सुनकर, उन्होंने त्वरित अपना शस्त्र उठाया और हिम पर नंगे पांव ही अपनी चौकी की ओर दौड़ पड़े।
तत्क्षण ही, उन्होंने मात्र 10 मीटर के अंतर पर एक सेक्शन जितनी संख्या में शत्रु सैनिकों को दुबके बैठे हुए और संतरी पर गोलियां चलाते हुए देखा। उन्होंने त्वरित अपनी राइफल से गोलियां चलाईं और धीरता से शत्रु के तीन सैनिकों को मार दिया। दांई ओर मुड़ने पर उन्होंने पाया कि एक शत्रु सैनिक पीछे से उन पर गोलियां चला रहा था। सिपाही सरदार सिंह ने फायर कर उसे भी मार दिया।
भीषण गोली वर्षा में संतरी लांस नायक प्रेम सिंह घायल होकर गिर गए। अपनी व्यक्तिगत सुरक्षा की घोर उपेक्षा करते हुए और गोलियों की झड़ी में रेंगते हुए सिपाही सरदार सिंह चौकी पर गए। उन्होंने संतरी को सुरक्षित किया और उसकी की राइफल से मैगजीन निकालकर अपनी पॉकेट में रख ली। शत्रु से प्रतिरोध करने के लिए वह पुनः बाहर आए। वे रेंगते हुए एक लाभप्रद स्थिति में पहुंच गए और शत्रु पर सटीक फायरिंग की।
दोनों ओर से हुई फायरिंग में, सिपाही सरदार सिंह के कंधे में एक गोली लग गई, किंतु घायल होते हुए भी उस कड़ाके की शीत में, नंगे पांव उन्होंने एकाकी ही शत्रु से संघर्ष किया और जब तक निकट की प्लाटून के सैनिक सहायता के लिए आए तब तक शत्रु को आगे नहीं बढ़ने दिया। शत्रु संख्या में श्रेष्ठ होते हुए भी, अपने मृतकों और घायलों को वहीं छोड़कर पीछे हट गया।
वास्तव में, उस रात्रि सिपाही सरदार सिंह ने सामरिक रूप से महत्वपूर्ण बंप पर शत्रु के आक्रमण को तोड़ने में विशेष भूमिका निर्वहन की।
सिपाही सरदार सिंह ने संख्या में श्रेष्ठ शत्रु के आक्रमण के समक्ष प्रचंड साहस, दृढ़ निश्चय एवं वीरता का परिचय दिया। 26 जनवरी 1991 को महामहिम राष्ट्रपति द्वारा उन्हें “वीर चक्र” से सम्मानित किया गया।
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