—— बलिदान दिवस -शौर्यनमन—–
सैकिंड लेफ्टिनेंट पुनीत नाथ दत्त
IC53987X
29-04-1973 – 20-07-1997
अशोक चक्र (मरणोपरांत)
यूनिट – 1/11 गोरखा राइफल्स
CI/IS ऑपरेशन्स
सैकिंड लेफ्टिनेंट पुनीत नाथ का जन्म 29 अप्रैल 1973 को राजस्थान के जोधपुर नगर में, मेजर प्रमोद नाथ दत्त एवं श्रीमती अनीता दत्त के परिवार में हुआ था। उनके पिता ने 1/11 गोरखा राइफल्स बटालियन में सेवाएं प्रदान की थीं। सैकिंड लेफ्टिनेंट दत्त का शैक्षणिक कॅरियर उत्कृष्ट था। वे खेलों और शिक्षा के साथ अन्य क्रियाकलापों में भी रूचि लेते थे। उनकी शिक्षा दार्जिलिंग और जयपुर में हुई थी। वे सेंट बैथनीज स्कूल, दार्जिलिंग, सेंट जोसेफ्स एकेडमी, देहरादून, सेंट जेवियर्स स्कूल, जयपुर और टैगोर पब्लिक स्कूल, जयपुर आदि विद्यालयों से पढ़े थे।
वह अपने मित्रों में ‘डिक्की’ नाम से जाने जाते थे। सैनिक परिवार से होने के कारण बाल्यकाल से ही वह सैन्य सेवा के अभिलाषी रहे थे। उसके लिए उन्होंने स्वयं को तैयार किया और वर्ष 1991 में राष्ट्रीय रक्षा अकादमी (NDA) में प्रवेश लिया। उन्होंने NDA में, उत्कृष्ट प्रदर्शन किया। 9 दिसंबर 1995 को उन्हें भारतीय सेना की 11 गोरखा राइफल्स रेजिमेंट की 1st बटालियन में सैकिंड लेफ्टिनेंट के रूप में कमीशन प्राप्त हुआ था। डेढ़ वर्ष की अवधि में उन्होंने Young Officers Course, Commando Course और Fire Fighting Course पूर्ण कर लिए थे।
वर्ष 1997 में उनकी बटालियन को, जम्मू-कश्मीर में, आतंकवाद विरोधी अभियानों में तैनात किया गया। 19 जुलाई 1997 की रात्रि में, गोपनीय सूत्रों से बटालियन को श्रीनगर के नौशेरा क्षेत्र में एक घर में कुछ विदेशी आतंकवादियों के छिपे होने की विश्वसनीय सूचना प्राप्त हुई। 20 जुलाई 1997 की भोर मेंं 4:00 बजे गोरखाओं ने इस क्षेत्र को घेर लिया। सैकिंड लेफ्टिनेंट दत्त को एक तीन तल्ला घर संदिग्ध प्रतीत हुआ, अतः सर्वप्रथम उन्होंने इस घर के वातायन और द्वारों पर पत्थर फेंके।
इसके पश्चात एक सैनिक को उस घर पर फायरिंग करने के लिए कहा। सैकिंड लेफ्टिनेंट दत्त का संदेह उचित था। वे आतंकवादी, जो अब तक छिपकर निशब्द बैठे थे, फायरिंग करने से आक्रोशित हो गए व प्रत्युत्तर में फायरिंग करने लगे। दोनों ओर से तीन घंटे तक चली मुठभेड़ में इस घर पर हथगोले भी फेंके गए, किंतु उनका कोई परिणाम नहीं देखते हुए, इस घर पर 84 mm कार्ल गुस्ताफ रॉकेट दागा गया, किंतु, उस रॉकेट में विस्फोट ही नहीं हुआ।
आकस्मिक, सैकिंड लेफ्टिनेंट दत्त ने इस घर के प्रथम तल की बालकनी में छिपे हुए एक आतंकवादी को देखा, जो निरंतर सैनिकों पर गोलियां चला रहा था और भागने के प्रयास में था। उन्होंने, तत्क्षण अपनी AK-47 से सटीक फायर कर, वहीं उसे मार दिया।
अब इस सैन्य टुकड़ी के सामने उस घर को विस्फोटकों से उड़ा देने के अतिरिक्त और कोई उपाय शेष नहीं रहा था, किंतु वह अत्यंत संकटमय कार्य था। सैकिंड लेफ्टिनेंट दत्त ने स्वयं यह कार्य करने का निर्णय किया। उन्होंने अपने सैनिकों को कवर फायर के निर्देश दिए और स्वयं भीत लांघ कर उस घर में चले गए। वहां एक और आतंकवादी ने उन पर फायरिंग की, जिसे भी उन्होंने तत्क्षण AK-47 से त्वरित फायर कर मार गिराया।
इसके पश्चात उन्होंने घर में विस्फोटक लगाए और बाहर आ गए, तत्पश्चात उस घर के प्रथम तल पर हथगोले फेंके, क्योंकि वहां से भी एक आतंकवादी फायरिंग कर रहा था। इस मध्य सेकिंड लेफ्टिनेंट दत्त के मुख से रक्त आने लगा और उन्हें शीघ्र, चिकित्सालय ले जाया गया। प्रथम दृष्टया देखने में तो लगा कि यह कोई साधारण घाव है, किंतु बाद में ज्ञात हुआ कि ना जाने कब एक गोली उनके मुँह में घुसकर कान के नीचे से निकल गई थी। कुछ ही घंटों में, वह वीरगति को प्राप्त हो गए।
इस ऑपरेशन में, सैकिंड लेफ्टिनेंट दत्त ने अत्यंत साहस प्रर्दशित करते हुए अपने जीवन को दांव पर लगाकर आतंकवादियों को समाप्त किया। उन्होंने उच्च कोटि की वीरता, असाधारण नेतृत्व क्षमता और परम राष्ट्रभक्ति का परिचय दिया। 26 जनवरी 1998 को गणतंत्र दिवस के अवसर पर उन्हें मरणोपरांत शांतिकाल के सर्वोच्च वीरता सम्मान ‘अशोक चक्र’ से सम्मानित किया गया।
कुछ वर्ष पूर्व उनकी माता श्रीमती अनिता दत्त ने वह अशोक चक्र पदक 1/11 गोरखा राइफल्स को दे दिया, जिससे यह पदक सदैव बटालियन के सैनिकों को प्रेरणा देता रहे।
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