——-शौर्यनमन——-
लेफ्टिनेंट प्रकाश रोपेरिया (आई सी-39994) का जन्म 10 जून, 1959 को हिसार, हरियाणा में हुआ था। उनके पिता का नाम श्री भाल सिंह रोपरिया था। उन्हें मद्रास रेजिमेंट में 19 दिसंबर, 1981 को कमीशन मिला था।
1984 में 26 मद्रास को ऑपरेशन ब्लू स्टार में भाग लेने के लिए अमृतसर में तैनात किया गया था। 5/6 जून की रात ‘सी’ कंपनी को स्वर्ण मंदिर परिसर के प्रथम तल पर कब्जा करने का दायित्व सौंपा गया। उस समय लेफ्टिनेंट रोपेरिया कंपनी के स्थानापन्न कमांडर थे। इमारत परिसर की मजबूती से किलेबंदी की गई थी और उसे खूंखार आतंकवादियों ने सुरक्षित कर रखा था। साथ ही जो सीढ़ियां इमारत के प्रथम तल तक जाती थीं उन्हें आतंकवादियों ने स्वचालित हथियारों से घेर रखा था। ऐसी स्थिति में लेफ्टिनेंट रोपेरिया ने सीढ़ियों (लैडर) के सहारे प्रथम तल पर चढ़ने का निश्चय किया। लेकिन आतंकवादियों की प्रभावी गोलीबारी के सामने प्रथम तल पर जाने के तीन प्रयास असफल रहे। आगे भी उस प्रकार का कोई प्रयास करना कठिन लग रहा था।
इस स्थिति में लेफ्टिनेंट रोपेरिया ने अपने साथ जाने के लिए वालंटियर्स मांगे। अपनी सुरक्षा की जरा भी परवाह न करते हुए, नायब सूबेदार कोशी को साथ लेकर, उन्होंने चौथे प्रयास का नेतृत्व किया और प्रथम तल पर चढ़ने में कामयाब रहे।
मशीन गन की तीव्र गोलीबारी के बावजूद लेफ्टिनेंट रोपेरिया ने बंकरों को साफ करना शुरू किया और उनके सैनिकों ने पूरे प्रथम तल को आतंकवादियों से खाली कर दिया। तब उन्होंने निचली मंजिल में स्थित ‘डी’ कंपनी से सम्पर्क जोड़ने का निर्णय लिया और अपने सैनिकों के साथ सीढ़ी का रास्ता खाली करवाने के लिए आगे बढ़े।
जैसे ही उन्होंने सीढ़ी का दरवाजा खोला आतंकवादियों ने उन पर गोलियां दागीं। लेफ्टिनेंट रोपेरिया ने दो हाथगोले फेंके और सीढ़ियों की ओर चले गए। वहां पर एक घायल आतंकवादी ने उन पर गोलियां चलाईं, जो उनके कंधे और गर्दन पर लगीं। गंभीर चोटों के बावजूद उन्होंने उस आतंकवादी पर गोली चलाई और उसे मार डाला। उसके बाद अपनी सुरक्षा की परवाह न कर वे सीढ़ी से नीचे उतरे और ‘डी’ कंपनी से सम्पर्क स्थापित किया। भूतल पहुंचते ही अत्यधिक रक्तस्राव एवं थकान के कारण वे गिर पड़े। उन्हें तुरंत अस्पताल पहुंचाया गया परंतु उनके प्राण न बचाए जा सके।
इस संक्रिया में लेफ्टिनेंट राम प्रकाश रोपेरिया ने भारतीय सेना की उच्च परम्पराओं के अनुकूल अनुकरणीय वीरता, साहस, नेतृत्व और कर्त्तव्यनिष्ठा का परिचय दिया। उन्हें मरणोपरांत अशोक चक्र से सम्मानित किया गया।
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