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अशोक चक्र (मरणोपरांत), सिख रेजिमेंट हवलदार बचित्तर सिंह

हवलदार बचित्तर सिंह

अशोक चक्र (मरणोपरांत), सिख रेजिमेंट

हवलदार बचित्तर सिंह (नं-133730) का जन्म 1916 में ग्राम लोपो, जिला फिरोजपुर, पंजाब में हुआ था। उनके पिता का नाम सरदार रूर सिंह था। वे 10 जनवरी, 1934 को 2 सिख रेजीमेंट में भर्ती हुए थे। उन्होंने द्वितीय महायुद्ध में उत्तरी अफ्रीका के रेगिस्तान की लड़ाई में भी भाग लिया था।

सिख रेजिमेंट-1947 में भारत के आजाद होने के बाद हैदराबाद रियासत के नवाब ने एक स्वतंत्र राज्य की स्थापना के लिए प्रयास किया, जबकि रियासत का भारी बहुमत भारत में विलय के पक्ष में था। उस समय रियासत में उग्रवादी रजाकर दल का बोलबाला था और उसकी लूटपाट से पड़ोसी जिलों के लोग बहुत त्रस्त थे। बिगड़ते हालात में हठी निजाम को सही रास्ते पर लाने के लिए, भारत के पास सैनिक कार्रवाई के सिवाय और कोई विकल्प नहीं रह गया था।

1916 सितंबर 13. 1948 ‘ऑपरेशन पोलो‘ अथवा हैदराबाद में पुलिस कार्रवाई 13 सितंबर, 1948 को शुरू हुई। इस संक्रिया के दौरान 2 सिख ने, ‘किल’ फोर्स की एक यूनिट के रूप में, नालदुर्ग क्षेत्र में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 4:00 बजे ‘बी’ कंपनी की अग्रिम प्लाटून ने हवलदार बचित्तर सिंह के नेतृत्व में, दुश्मन को रोकने के लिए एक सड़क अवरोध खड़ा किया। उन्होंने नालदुर्ग की ओर से दो गाड़ियों को अपनी तरफ आते देखा। अपने एक सैनिक को गाड़ियों पर गोलियां चलाने का आदेश देकर वे स्वयं एक और सैनिक को साथ लेकर गाड़ियों को पकड़ने के लिए आगे बढ़े। गाड़ियों में सवार लोगों की गोलियों की परवाह न करते हुए वे आगे बढ़ते रहे और अपने उद्देश्य में सफल रहे। थोड़ी देर बाद दुश्मन ने अपने एक मजबूत ठिकाने से उनकी प्लाटून पर गोलियां चलानी शुरू कर दी। तब दुश्मन को सुरक्षित ठिकाने से खदेड़ने के लिए हवलदार बचित्तर सिंह ने आत्म-विश्वास के साथ उस पर हमला बोल दिया। जब वे लक्ष्य से लगभग 30 मीटर की दूरी पर थे, एक लाइट मशीन गन की बौछार से उनकी जांघ में गंभीर चोट आई और वे गिर पड़े। परन्तु चोट के बावजूद वे रेंगते हुए लाइट मशीन गन के ठिकाने तक गए और उस पर दो हथगोले फेंक दिए। इस प्रकार लाइट मशीन गन बेकार हो गई। हवलदार बचित्तर सिंह की चोट बहुत गंभीर थी। यह जानते हुए भी कि उनका अंत समय अब निकट है उन्होंने युद्ध भूमि से हटने और चिकित्सा सहायता लेने से मना कर दिया और अपने सैनिकों को लक्ष्य पर कब्जा करने के लिए उत्साहित करते रहे। उनके साहस से प्रेरित होकर सैनिक जमकर लड़े और उन्होंने दुश्मन के मजबूत ठिकाने पर कब्जा कर लिया।हवलदार बचित्तर सिंह ने इस लड़ाई में अभूतपूर्व पराक्रम, अनुकरणीय कर्तव्यनिष्ठा और निर्भीक नेतृत्व का प्रदर्शन किया। उन्हें मरणोपरांत अशोक चक्र प्रदान किया गया।

(साभार – गूगल , पराक्रम गाथा सूचना और प्रसारण मंत्रालय भारत सरकार, पेन टुडे, #shauryanamanfoundation)

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