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Shaurya chakra

शौर्य चक्र मेजर आशीष भटनागर

—— बलिदान दिवस -शौर्यनमन—–
मेजर आशीष भटनागर
IC-48109
15-08-1967 – 16-08-1997
शौर्य चक्र (मरणोपरांत)
वीरांगना – श्रीमती रचना भटनागर
यूनिट – 6 सिख लाइट इंफेंट्री
आतंकवाद विरोधी अभियान
मेजर आशीष भटनागर का जन्म 15 अगस्त 1967 को श्री के.के. भटनागर एवं श्रीमती सुधा भटनागर के परिवार में हुआ था। वह उत्तर प्रदेश के मोरादाबाद के निवासी थे। बालपन से ही वह सैन्य सेवा सेवा की अभिलाषा रखते थे। उनका NDA खड़कवासला में चयन हुआ और तत्पश्चात उन्होंने IMA में देहरादून में प्रवेश लिया।
IMA से प्रशिक्षण पूर्ण होने के पश्चात उन्हें भारतीय सेना की सिख लाइट इंफेंट्री रेजिमेंट की 6 बटालियन में सैकिंड लेफ्टिनेंट के रूप में कमीशन प्राप्त हुआ था। अपनी बटालियन में विभिन्न स्थानों पर और परिचालन परिस्थितियों में सेवाएं देते हुए वह मेजर के पद पर पदोन्नत हो गए थे।
वर्ष 1997 में 6 सिख एलआई बटालियन को पंजाब के पठानकोट क्षेत्र में तैनात किया गया था। 16 अगस्त 1997 को मेजर आशीष एक ऑपरेशन में भारत-पाकिस्तान सीमा के निकट संवेदनशील लासियन एन्क्लेव, गुरदासपुर में परिचालन तैनाती पर थे। सांय के लगभग 5:45 बजे, रावी नदी में एक परिचालन मिशन में मेजर भटनागर और उनके नौ साथियों को ले जा रही नाव पलट गई।
अपने उत्कृष्ट कमांडो कौशल का उपयोग करते हुए और अदम्य साहस प्रदर्शित करते हुए, मेजर आशीष ने अपने साथियों की रक्षा के लिए तत्क्षण नदी की तेज धारा में छलांग लगा दी। उन्होंने अपना स्वयं का लाइफ जैकेट अन्य अधिकारी को दिया और निश्चित मृत्यु की स्थिति से उसके जीवन की रक्षा की। इतने पर भी विराम नहीं लेते हुए और व्यक्तिगत सुरक्षा की घोर उपेक्षा करते हुए मेजर आशीष ने विद्युत जैसी गति से एक अन्य डूबते हुए सैनिक की उसके शस्त्र सहित रक्षा की।
उस समय चल रहे वर्षाकाल के कारण, नदी में जल कीचड़युक्त था और तीव्र धारा थी, जिससे रक्षण अभियान और कठिन व संकटपूर्ण हो गया था। तो भी जल की तीव्र धारा में स्वयं फंस जाने तक मेजर आशीष ने निरंतर अन्य के रक्षण का प्रयास किया। अपने साथियों की सुरक्षा को सर्वोपरि रखते हुए उन्होंने एक नायक जैसी मृत्यु का वरण किया।
उनके अंतिम शब्द, “रूको, तुम्हें बचा लिया जाएगा” और “मेरा पीछा मत करो, यहां की अंतर्धाराएं अति संकटमय हैं” उनके सौहार्द, वीरता और कर्तव्य के प्रति समर्पण को दर्शाते हैं। मेजर आशीष भटनागर को उनकी विशिष्ट वीरता, अनुकरणीय साहस और अपने साथियों की रक्षा हेतु सर्वोच्च बलिदान के लिए मरणोपरांत “शौर्य चक्र” सम्मान दिया गया।
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