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Shaurya chakra

शौर्य चक्र लांस नायक मनरूप सिंह

—— बलिदान दिवस -शौर्यनमन—–
लांस नायक मनरूप सिंह
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शौर्य चक्र (मरणोपरांत)
वीरांगना – श्रीमती जसवंती देवी
यूनिट – 16 गार्ड्स रेजिमेंट
ऑपरेशन ब्लू स्टार
लांस नायक मनरूप सिंह राजस्थान के झुंझुनूं जिले की सूरजगढ़ तहसील के काकोड़ा गांव के निवासी थे। वह भारतीय सेना की ब्रिगेड ऑफ द गार्ड्स रेजिमेंट की 16 बटालियन में सेवारत थे।
वर्ष 1984 में पंजाब में आतंकवाद चरम पर पहुंच गया था। खालिस्तानी आतंकवादियों ने पवित्र स्वर्ण मंदिर परिसर पर अधिकार कर लिया था और वहां सुदृढ़ रक्षण कर उसे अपना मुख्यालय बना लिया था। अतः स्वर्ण मंदिर परिसर पर नियंत्रण स्थापित करने और परिसर को मुक्त कराने के लिए 1 जून 1984 से 8 जून 1984 के मध्य भारतीय सेना द्वारा ऑपरेशन ब्लू स्टार चलाया गया था। 16 गार्ड्स बटालियन को भी ऑपरेशन ‘ब्लूस्टार’ में भाग लेने का आदेश दिया गया था।
‘ऑपरेशन ब्लू स्टार’ में 5/6 जून 1984 की रात्रि को 16 गार्ड्स बटालियन की ‘D’ कंपनी को आतंकवादियों के एक महत्वपूर्ण परिसर के भवनों में से एक को रिक्त करने का कार्य सौंपा गया था। वह भवन अति सुदृढ़ रक्षित था और आतंकवादियों ने उस पर अधिकार कर रखा था। लांस नायक मनरूप सिंह उस प्लाटून में सबसे आगे थे।
अपनी टुकड़ी की चाल को कवर करने के लिए वह शीघ्रता से भवन के प्रवेश द्वार पर खंभे के निकट तैनात हो गए। टुकड़ी के एक सैनिक ने कक्ष में प्रवेश किया और अपने शस्त्र से फायरिंग आरंभ कर दी। इससे पूर्व कि शेष सैनिक भीतर प्रवेश कर पाते, आतंकवादियों द्वारा निकट के कक्ष से एक हथगोला फेंका गया।
इसके पश्चात लांस नायक मनरूप सिंह ने स्वयं लाइट मशीन गन संभाल ली। जब उन्होंने देखा कि तीन आतंकवादी उनकी गन झपटने आ रहे हैं, तो उन्होंने तत्क्षण उन सभी आतंकवादियों पर गोलियां चलाईं, जिससे वे मारे गए। इस कार्रवाई में लांस नायक मनरूप सिंह घायल हो गए और एक आतंकवादी ने उन्हें कटार भी घोंप दिया।
घायल होते हुए भी, यह वीर सैनिक खंभों के साथ आगे बढ़ता रहा और वह चौथे कक्ष में प्रवेश करने में सफल रहे। उन्होंने अपनी लाइट मशीन गन से उस कक्ष में अंधाधुंध गोलियां बरसाईं और उस कक्ष में तीन आतंकवादियों को मार दिया। जब वह कक्ष से बाहर आ रहे थे, तो उन्हें आतंकवादियों के स्वचालित फायर से अनेक गोलियां लगी और वह वहीं वीरगति को प्राप्त हो गए।
इस प्रकार लांस नायक मनरूप सिंह ने अदम्य वीरता, अविचल साहस, उदात्त सतर्कता, दृढ़ संकल्प और उच्च कोटि की कर्तव्यपरायणता का परिचय दिया व भारतीय सेना की सर्वोच्च परम्पराओं का पालन करते हुए अपने प्राण न्यौछावर किए। उन्हें मरणोपरांत “शौर्य चक्र” से सम्मानित किया गया।
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