—— बलिदान दिवस -शौर्यनमन—–
नायक निर्भय सिंह सिसोदिया
4167546
01-05-1958 – 06-06-1984
अशोक चक्र (मरणोपरांत)
यूनिट – 15 कुमाऊं रेजिमेंट
ऑपरेशन ब्लू स्टार
नायक निर्भय सिंह का जन्म 1 मई 1958 को राजस्थान के झालावाड़ कस्बे में श्री नंद सिंह सिसोदिया एवं श्रीमती बसंत कंवर के परिवार में हुआ था। बाल्यकाल से ही, वह भारतीय सेना में सेवा के लिए दृढ़ संकल्पित थे, अतः नौवीं कक्षा उत्तीर्ण करने के पश्चात वह भारतीय सेना की कुमाऊं रेजिमेंट में रंगरूट के रूप में भर्ती हो गए। प्रारंभिक प्रशिक्षण के पश्चात उन्हें 15 कुमाऊं बटालियन में सिपाही के पद पर नियुक्त किया गया था। अपनी बटालियन में सेवाएं देते हुए वह नायक के पद पर पदोन्नत हो गए थे।
—— ऑपरेशन ब्लू स्टार: 1984 ——
वर्ष 1984 में पंजाब में आतंकवाद चरम पर पहुंच गया था। खालिस्तानी आतंकवादियों ने पवित्र स्वर्ण मंदिर परिसर पर अधिकार कर लिया था और वहां सुदृढ़ रक्षण कर उसे अपना मुख्यालय बना लिया था। अंततः स्वर्ण मंदिर परिसर पर नियंत्रण स्थापित करने और परिसर को मुक्त कराने के लिए 1 जून 1984 से 8 जून 1984 तक भारतीय सेना द्वारा ‘ऑपरेशन ब्लू स्टार’ चलाया गया था। 15 कुमाऊं बटालियन को भी ऑपरेशन ब्लू स्टार में भाग लेने का आदेश दिया था।
“ऑपरेशन ब्लू स्टार” में, 6 जून 1984 को नायक निर्भय सिंह 15 कुमाऊं की ‘A’ कंपनी के लाइट मशीन गन टुकड़ी के कमांडर का कर्तव्य निर्वहन कर रहे थे। उनकी कंपनी को स्वर्ण मंदिर परिसर में एक भवन को आतंकवादियों से मुक्त कराने का कार्य दिया गया था। इस सुदृढ़ रक्षित भवन में दुर्दांत आतंकवादियों ने दृढ़ता से मोर्चा ले रखा था। अपने लक्ष्य की ओर बढ़ते ही यह कंपनी आतंकवादियों की प्रचंड फायरिंग में घिर गई, अतः उन्हें अपनी कार्रवाई रोकनी पड़ी।
इस विकट स्थिति में, उनके कंपनी कमांडर ने एकाकी ही उस भवन की ओर बढ़ने का निर्णय किया। अपने कंपनी कमांडर को कवरिंग फायर प्रदान करने के लिए नायक निर्भय सिंह तत्परता से आगे बढ़े और लाइट मशीन गन स्थापित कर स्थिति नियंत्रित की। भवन में छिपे आतंकवादियों ने उन पर प्रचंड फायरिंग की किंतु वह कवरिंग फायर देने के लिए अनावृत स्थिति में ही डटे रहकर फायरिंग करते रहे।
फायरिंग करते समय, उन्हें एक तलघर के PORTHOLE से फायरिंग कर रही एक लाइट मशीन गन से अपने कंपनी कमांडर के जीवन पर गंभीर संकट का आभास हुआ। प्रचंड साहस और वीरता का परिचय देते हुए व स्वयं को गंभीर संकट में डालते हुए नायक निर्भय सिंह उस PORTHOLE की ओर दौड़ पड़े।
इस साहसिक प्रक्रिया में उनके पैर में गोलियां लग गईं, किंतु वह अपने उद्देश्य पर अडिग रहे। घायल होते हुए भी, वह PORTHOLE की ओर रेंगते रहे और उसमें हथगोला फेंककर उस मशीन गन को शांत कर दिया। किंतु इस भयानक प्रक्रिया में, उन्हें पुनः गोलियां लगी जो प्राणघातक सिद्ध हुई और वह वीरगति को प्राप्त हो गए।
इस ऑपरेशन में नायक निर्भय सिंह अपनी व्यक्तिगत सुरक्षा की घोर अवहेलना की और अपनी कंपनी के प्रति अनुकरणीय साहस और समर्पण का प्रदर्शन करते हुए भारतीय सेना की सर्वोच्च परंपराओं में राष्ट्र की सेवा में सर्वोच्च बलिदान दिया और अपने निर्भय नाम को सार्थक किया।
नायक निर्भय सिंह को उनकी अति विशिष्ट वीरता, असाधारण साहस, कर्तव्य के प्रति समर्पण के लिए मरणोपरांत शांतिकाल के सर्वोच्च वीरता सम्मान “अशोक चक्र” से सम्मानित किया गया।
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