शहीद नायक दीपक सिंह
वीर चक्र (मरणोपरांत)
वीरता, निस्वार्थ सेवा और सर्वोच्च बलिदान की अमर गाथा
प्रारंभिक जीवन एवं शिक्षा
मध्य प्रदेश के रीवा जिले के फरेंदा गाँव में 15 जुलाई 1989 को नायक दीपक सिंह का जन्म हुआ। वे श्री गजराज सिंह और श्रीमती सरोज देवी के सुपुत्र थे। ग्रामीण परिवेश में पले-बढ़े दीपक सिंह का बचपन सादगी, अनुशासन और पारिवारिक संस्कारों के बीच बीता। उनके परिवार ने उन्हें परिश्रम, विनम्रता और जिम्मेदारी का महत्व सिखाया, जो आगे चलकर उनके व्यक्तित्व की विशेष पहचान बने।
उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा सरस्वती हाई स्कूल, मनिकवार से प्राप्त की। यह विद्यालय रीवा जिले की रायपुर कर्चुलियान तहसील में स्थित है। इसके बाद उन्होंने शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, मनिकवार में अपनी आगे की पढ़ाई पूरी की।
शिक्षा के दौरान ही उनके मन में राष्ट्रसेवा की भावना प्रबल होने लगी। देश के प्रति समर्पण और अपने कर्तव्यों को निष्ठापूर्वक निभाने की प्रेरणा ने उन्हें भारतीय सेना में शामिल होने के लिए प्रेरित किया।
20 जून 2012 को वे भारतीय सेना में भर्ती हुए। सेना में शामिल होकर उन्होंने अपने जीवन को राष्ट्र की सेवा के लिए समर्पित कर दिया।
सैन्य जीवन एवं सेवाएँ
नायक दीपक सिंह को आर्मी मेडिकल कॉर्प्स (Army Medical Corps) में शामिल किया गया। यह भारतीय सेना का एक अत्यंत महत्वपूर्ण अंग है, जो युद्ध और शांति दोनों परिस्थितियों में सैनिकों को चिकित्सा सहायता प्रदान करता है। इस कोर के जवान घायल सैनिकों के उपचार, जीवन रक्षा और चिकित्सा सेवाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
कठोर प्रशिक्षण और निरंतर अभ्यास के माध्यम से दीपक सिंह एक कुशल एवं संवेदनशील सैनिक-चिकित्साकर्मी के रूप में विकसित हुए। उनके लिए अपने साथियों की सहायता करना केवल सैन्य जिम्मेदारी नहीं, बल्कि मानवीय कर्तव्य भी था।
अपने सैन्य जीवन के दौरान उन्होंने आर्मी बेस हॉस्पिटल, 426 फील्ड हॉस्पिटल और 414 फील्ड हॉस्पिटल सहित विभिन्न चिकित्सा प्रतिष्ठानों में सेवाएँ दीं। इन तैनातियों के दौरान उन्हें अलग-अलग परिस्थितियों में कार्य करने का अनुभव प्राप्त हुआ। उनकी कार्यकुशलता, समर्पण और जिम्मेदारी के प्रति निष्ठा ने उन्हें अपने वरिष्ठ अधिकारियों तथा साथियों के बीच सम्मान दिलाया।
30 नवंबर 2019 को उनका विवाह श्रीमती रेखा सिंह से हुआ। वैवाहिक जीवन की शुरुआत के साथ ही उन्होंने राष्ट्रसेवा के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को पहले की तरह बनाए रखा।
30 जनवरी 2019 को उनकी तैनाती 16 बिहार बटालियन में हुई, जो लद्दाख के कठिन और सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण क्षेत्र में तैनात थी। वर्ष 2020 तक वे आठ वर्षों से अधिक की सैन्य सेवा पूरी कर चुके थे और नायक के पद पर कार्यरत थे।
अपने सेवाकाल में उन्होंने विभिन्न ऑपरेशनल क्षेत्रों में काम किया और कठिन परिस्थितियों में चिकित्सा सहायता प्रदान करने का व्यापक अनुभव अर्जित किया। वे एक भरोसेमंद, दक्ष और समर्पित सैनिक के रूप में पहचाने जाते थे।
ऑपरेशन स्नो लेपर्ड
गलवान घाटी का संघर्ष | 15 जून 2020
वर्ष 2020 में पूर्वी लद्दाख में भारत और चीन के बीच वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर तनाव लगातार बढ़ रहा था। अप्रैल से ही सीमा क्षेत्र में चीनी सैनिकों, सैन्य उपकरणों और अन्य गतिविधियों में वृद्धि देखी जा रही थी।
मई 2020 की शुरुआत में गलवान घाटी में भारतीय सैनिकों के पारंपरिक गश्ती मार्गों को बाधित करने की घटनाएँ सामने आईं। इसके अतिरिक्त कोंगका ला, गोगरा और पैंगोंग झील के उत्तरी किनारे पर भी तनावपूर्ण परिस्थितियाँ उत्पन्न हुईं।
भारत ने इन घटनाओं का विरोध करते हुए स्पष्ट किया कि वास्तविक नियंत्रण रेखा पर एकतरफा बदलाव स्वीकार नहीं किया जाएगा। दोनों देशों के बीच सैन्य और कूटनीतिक स्तर पर बातचीत जारी रही।
6 जून 2020 को दोनों देशों के वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों के बीच हुई बैठक में तनाव कम करने और सैनिकों के पीछे हटने की प्रक्रिया पर सहमति बनी। इस समझौते का उद्देश्य सीमा पर शांति बनाए रखना और ऐसी गतिविधियों से बचना था, जिनसे स्थिति बिगड़ सकती थी।
हालाँकि, 15 जून 2020 की रात गलवान घाटी में दोनों देशों के सैनिकों के बीच हिंसक संघर्ष हुआ। ऑपरेशन स्नो लेपर्ड के अंतर्गत तैनात भारतीय सैनिकों को अत्यंत कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा।
गलवान घाटी की ऊँचाई, अत्यधिक ठंड, दुर्गम पहाड़ी क्षेत्र और सीमित संसाधनों के बीच यह संघर्ष हुआ। दोनों पक्षों के सैनिकों के बीच हाथापाई, पत्थरबाजी और अस्थायी हथियारों के इस्तेमाल से स्थिति बेहद गंभीर हो गई।
इसी चुनौतीपूर्ण वातावरण में नायक दीपक सिंह अपनी चिकित्सा संबंधी जिम्मेदारियाँ निभा रहे थे।

गलवान घाटी में अदम्य साहस एवं निस्वार्थ सेवा
आर्मी मेडिकल कॉर्प्स में नर्सिंग असिस्टेंट के रूप में कार्यरत नायक दीपक सिंह ने संघर्ष की शुरुआत से ही असाधारण साहस और सूझबूझ का परिचय दिया।
जैसे ही संघर्ष तेज हुआ और सैनिक घायल होने लगे, उन्होंने स्थिति की गंभीरता को समझते हुए घायल जवानों तक पहुँचने का निर्णय लिया। अपनी सुरक्षा की चिंता किए बिना वे संघर्ष क्षेत्र में आगे बढ़े और घायलों को तत्काल चिकित्सा सहायता प्रदान करने लगे।
उनका उद्देश्य स्पष्ट था—घायल सैनिकों की जान बचाना और उन्हें सुरक्षित उपचार उपलब्ध कराना।
संघर्ष के दौरान वे बार-बार अग्रिम क्षेत्र में पहुँचे। उन्होंने घायल जवानों को प्राथमिक उपचार दिया, उनकी स्थिति को स्थिर करने का प्रयास किया और उन्हें सुरक्षित स्थानों तक पहुँचाने में सहायता की।
चारों ओर हिंसक संघर्ष जारी था। परिस्थितियाँ अत्यंत जोखिमपूर्ण थीं, लेकिन नायक दीपक सिंह अपने कर्तव्य से पीछे नहीं हटे।
घायल सैनिकों की सहायता करते समय वे स्वयं भी गंभीर रूप से घायल हो गए। इसके बावजूद उन्होंने अपनी जिम्मेदारियों को निभाना जारी रखा। असाधारण धैर्य, साहस और सेवा भावना के साथ वे अपने साथियों की जान बचाने में जुटे रहे।
उनके निस्वार्थ प्रयासों के परिणामस्वरूप 30 से अधिक साथी सैनिकों की जान बचाने का श्रेय उन्हें दिया जाता है।
अंततः संघर्ष के दौरान लगी गंभीर चोटों के कारण उन्होंने अपने प्राणों का सर्वोच्च बलिदान दिया। मात्र 30 वर्ष की आयु में नायक दीपक सिंह वीरगति को प्राप्त हुए।
उन्होंने अपने जीवन से यह सिद्ध किया कि एक सैनिक का साहस केवल हथियार उठाकर लड़ने में ही नहीं, बल्कि संकट की घड़ी में दूसरों का जीवन बचाने के लिए स्वयं को जोखिम में डालने में भी निहित होता है।
गलवान के वीर सपूतों का सर्वोच्च बलिदान
15 जून 2020 को गलवान घाटी में हुए संघर्ष में भारतीय सेना के अनेक वीर सैनिकों ने देश की रक्षा करते हुए अपने प्राण न्यौछावर किए।
इस संघर्ष में नायक दीपक सिंह के साथ कर्नल बी. संतोष बाबू और 18 अन्य वीर सैनिकों ने सर्वोच्च बलिदान दिया।
शहीद होने वाले वीर सैनिकों में शामिल थे:
- नायब सूबेदार नंदराम सोरेन
- नायब सूबेदार सतनाम सिंह
- नायब सूबेदार मंदीप सिंह
- हवलदार विपुल राय
- हवलदार सुनील कुमार
- हवलदार के. पलानी
- सिपाही गणेश हंसदा
- सिपाही चंदन कुमार
- सिपाही चंद्रकांत प्रधान
- सिपाही अमन कुमार
- सिपाही कुंदन कुमार
- सिपाही राजेश ओरंग
- सिपाही गणेश राम
- सिपाही के.के. ओझा
- सिपाही जय किशोर सिंह
- सिपाही गुरतेज सिंह
- सिपाही अंकुश
- सिपाही गुरबिंदर सिंह
इन सभी वीर सैनिकों का बलिदान राष्ट्र के इतिहास में सदैव सम्मान के साथ याद किया जाएगा।
वीर चक्र से सम्मानित
नायक दीपक सिंह ने अत्यंत कठिन परिस्थितियों में घायल सैनिकों की सहायता करते हुए जिस अदम्य साहस, निष्ठा और कर्तव्यपरायणता का परिचय दिया, वह भारतीय सेना की सर्वोच्च परंपराओं का प्रतीक है।
दुश्मन के सामने अपनी जान की परवाह किए बिना साथियों के जीवन की रक्षा करने के उनके असाधारण प्रयासों को राष्ट्र ने सम्मानित किया।
26 जनवरी 2021 को उन्हें मरणोपरांत वीर चक्र से सम्मानित किया गया।
यह सम्मान उनके साहस, व्यावसायिक दक्षता, निस्वार्थ सेवा और सर्वोच्च बलिदान का प्रतीक है।
परिवार एवं राष्ट्रसेवा की अमर परंपरा

नायक दीपक सिंह के परिवार में उनके पिता श्री गजराज सिंह, माता श्रीमती सरोज देवी और पत्नी श्रीमती रेखा सिंह हैं।
उनके बलिदान के बाद उनकी पत्नी श्रीमती रेखा सिंह ने भी देशसेवा के मार्ग पर चलने का संकल्प लिया। अपने पति के आदर्शों, कर्तव्यनिष्ठा और राष्ट्रप्रेम से प्रेरित होकर उन्होंने भारतीय सेना में अधिकारी बनने का निर्णय लिया।
मई 2022 में उन्होंने चेन्नई स्थित ऑफिसर्स ट्रेनिंग अकादमी (OTA) में प्रशिक्षण के लिए प्रवेश लिया। कठिन प्रशिक्षण सफलतापूर्वक पूरा करने के बाद वे भारतीय सेना की आर्मी ऑर्डनेंस कॉर्प्स में अधिकारी के रूप में कमीशन प्राप्त कर देशसेवा के लिए समर्पित हुईं।
श्रीमती रेखा सिंह का यह निर्णय नायक दीपक सिंह की विरासत को आगे बढ़ाने का एक प्रेरणादायक उदाहरण है। यह दर्शाता है कि राष्ट्रसेवा की भावना केवल एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रहती, बल्कि परिवारों और आने वाली पीढ़ियों को भी प्रेरित करती है।
अमर प्रेरणा
नायक दीपक सिंह का जीवन साहस, सेवा और मानवीय संवेदना का अनुपम उदाहरण है।
उन्होंने अपने सैन्य जीवन में चिकित्सा सेवाओं के माध्यम से अनेक सैनिकों की सहायता की और गलवान घाटी के संघर्ष में अपने प्राणों की परवाह किए बिना घायल साथियों की जान बचाने का प्रयास किया।
उनका बलिदान हमें यह संदेश देता है कि सच्ची वीरता अपने कर्तव्य के प्रति अटूट निष्ठा और दूसरों के जीवन की रक्षा के लिए हर संभव प्रयास करने में निहित है।
मध्य प्रदेश के रीवा जिले की धरती के इस वीर सपूत ने अपने साहस और त्याग से पूरे राष्ट्र को गौरवान्वित किया।
उनकी वीरता, निस्वार्थ सेवा और सर्वोच्च बलिदान सदैव आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बने रहेंगे।
शहीद नायक दीपक सिंह, वीर चक्र (मरणोपरांत), को शत्-शत् नमन।
जय हिंद!
जय भारत!

