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Param Veer Chakra

परम वीर चक्र, सिख रेजिमेंट लांस नायक करम सिंह  

लांस नायक करम सिंह

परम वीर चक्र, सिख रेजिमेंट

 लांस नायक करम सिंह (नं-22356) का जन्म 15 सितंबर, 1915 को गांव सेहना, बरनाला, पंजाब में हुआ था। इनके पिता का नाम उत्तम सिंह था। वे 15 सितंबर, 1941 को 1 सिख रेजीमेंट में भर्ती हुए थे। उन्होंने द्वितीय विश्व युद्ध में मिलिट्री मेडल भी प्राप्त किया था।

जम्मू और कश्मीर की लड़ाई के दौरान, 1948 की आक्रामक कार्रवाई में, भारतीय सेना ने टिथवाल क्षेत्र में महत्वपूर्ण सफलता हासिल की। परिणामस्वरूप 23 मई, 1948 को टिथवाल पर भारतीय सेना का कब्जा हो गया। दुश्मन घबराकर किशन गंगा नदी के उस पार भाग खड़ा हुआ और उसने अपने हथियार और साजो-सामान नदी में फेंक दिए। लेकिन दुश्मन जल्दी ही इस सदमे से संभल गया। उसने अपनी सेना को पुनर्गठित कर खोई हुई जमीन को वापस लेने के लिए जोरदार जवाबी हमला किया। भारतीय सेना दुश्मन के दबाव को सह न सकी और वह किशन गंगा नदी की तटवर्ती पोजीशन से पीछे हट गई। अंत में दुश्मन का मुकाबला करने के लिए उसने टिथवाल की पहाड़ियों पर मोर्चा जमाया।

टिथवाल की लड़ाई कई महीनों तक चली। परंतु दुश्मन भारतीय सुरक्षा पंक्ति को भेद न सका। भारतीयों को उनके मजबूत ठिकानों से पीछे धकेलने के लिए 13 अक्तूबर को उसने एक ब्रिगेड स्तर का हमला किया। उसका उद्देश्य टिथवाल के दक्षिण में स्थित रिछमार गली पर फिर से कब्जा करना और टिथवाल के पूर्व में स्थित नस्ताचूर दरें तक पहुंच कर भारतीय सेना को घेरना था। उसके दोनों प्रयास विफल कर दिए गए। इस हमले के दौरान 13 अक्तूबर की रात को रिछमार गली में भीषण लड़ाई हुई। शत्रु ने तोपों और मोर्टारों की भारी गोलाबारी के साथ हमले की शुरूआत की। इस विध्वंसक गोलाबारी में प्लाटून के लगभग सारे ही बंकरों को भारी नुकसान पहुंचा, इस हमले को  विफल करने में 1 सिख ने बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई ।

इस हमले के समय लांस नायक करम सिंह एक अग्रिम सीमा चौकी की कमान पर थे। इस चौकी पर शत्रु ने बहुत बड़ी संख्या में, जो भारतीयों से दस गुणा अधिक थी, हमला किया। चौकी पर आठ बार आक्रमण हुआ और हर बार सिखों ने शत्रु को मार भगाया। जब गोला-बारूद कम होने लगा तो लांस नायक करम सिंह यह जानते हुए कि दुश्मन की भयानक गोलाबारी के बीच उन तक कोई मदद नहीं पहुंच सकेगी, कंपनी की मुख्य पोजीशन से आ मिले। जख्मी होने के बावजूद वे अपने एक अन्य साथी की मदद से दो घायल साथियों को भी अपने साथ ले आए। दुश्मन की फायर में घिर जाने के कारण उनके लिए बाहर निकलना लगभग असंभव हो गया था। सारे खतरों की परवाह न करते हुए करम सिंह रेंगते हुए एक जगह से दूसरी जगह जाते रहे और अपने सैनिकों को लड़ाई जारी रखने का हौसला देते रहे। कई बार उन्होंने दुश्मनों को ग्रेनेड फेंककर मार भगाया। दो बार घायल होने के बावजूद उन्होंने अपनी निकासी से इन्कार कर दिया और अग्रिम खाइयों में डटे रहे।

दुश्मन का पांचवां हमला बहुत तीव्र था। शत्रु के दो सैनिक करम सिंह की पोजीशन के इतने नजदीक आ गए कि बिना अपने आदमियों को चोट पहुंचाए, उनसे लड़ा नहीं जा सकता था। तब वे अपनी खाई से बाहर कूद पड़े और देखते-देखते दोनों घुसपैठिए सैनिकों को संगीन घोंपकर मार डाला। इस साहसिक कार्य से दुश्मन का मनोबल टूट गया और उसने घेरा उठा लिया। करम सिंह और उनके साथियों ने दुश्मन के और तीन हमले भी विफल कर दिए। लांस नायक करम सिंह जहां अपने साथियों के लिए प्रेरणा के स्रोत थे वहीं दुश्मन के लिए आतंक। टिथवाल की लड़ाई में उत्कृष्ट भूमिका के लिए लांस नायक करम सिंह को परम वीर चक्र से सम्मानित किया गया।

जय हिन्द जय भारत

(साभार – गूगल , पराक्रम गाथा सूचना और प्रसारण मंत्रालय भारत सरकार, विजय सोहनी, पेन टुडे, #shauryanamanfoundation)

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