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Lieutenant Colonel Ardeshir Burzorji Tarapore लेफ्टिनेंट कर्नल अर्देशिर बर्जोरजी तारापोर: वीरता का एक अमर प्रतीक

भारत के सैन्य इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं जो साहस, बलिदान और देशभक्ति की मिसाल बन गए हैं। लेफ्टिनेंट कर्नल अर्देशिर बर्जोरजी तारापोर उनमें से एक हैं। 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में उनकी अदम्य वीरता और नेतृत्व ने उन्हें मरणोपरांत भारत के सर्वोच्च सैन्य सम्मान, परम वीर चक्र, दिलाया। यह ब्लॉग उनकी प्रेरणादायक कहानी को समर्पित है, जो हर भारतीय के लिए गर्व का विषय है। Lieutenant Colonel Ardeshir Burzorji Tarapore

प्रारंभिक जीवन: एक योद्धा का जन्म

18 अगस्त 1923 को मुंबई में जन्मे अर्देशिर तारापोर एक पारसी परिवार से थे, जिनका इतिहास वीरता से भरा हुआ था। उनके पूर्वज छत्रपति शिवाजी महाराज की सेना में योद्धा थे, जिन्हें उनकी बहादुरी के लिए 100 गांवों का इनाम मिला था। इनमें से तारापोर गांव के नाम पर उनका परिवार जाना गया। पुणे में अपनी स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद, तारापोर में देशसेवा का जुनून जागा।

सैन्य यात्रा: साहस का सफर

1942 में, तारापोर ने हैदराबाद राज्य सेना में शामिल होकर अपने सैन्य करियर की शुरुआत की। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान उन्होंने पश्चिम एशिया में सक्रिय सेवा दी। 1951 में, उन्हें पूना हॉर्स (17वीं घुड़सवार रेजिमेंट) में कमीशन मिला। अपनी मेहनत और लगन से वे 1958 में मेजर और 1965 में लेफ्टिनेंट कर्नल बने। जब भारत ने सेंटूरियन टैंकों की खरीद की, तो तारापोर को ब्रिटेन में प्रशिक्षण के लिए चुना गया। उनकी रणनीतिक समझ और नेतृत्व कौशल ने उन्हें पूना हॉर्स रेजिमेंट का कमांडिंग ऑफिसर बनाया।

1965 का युद्ध: फिल्लौरा की जंग

1965 का भारत-पाकिस्तान युद्ध तारापोर की वीरता का सबसे बड़ा मंच बना। सियालकोट सेक्टर में, विशेष रूप से फिल्लौरा की लड़ाई में, उन्होंने अपनी रेजिमेंट का नेतृत्व किया। 11 सितंबर 1965 को, पूना हॉर्स ने पाकिस्तानी सेना के कवच पर हमला बोला। पाकिस्तान ने वजीरावाली से भारी टैंकों के साथ जवाबी कार्रवाई की। इस युद्ध में तारापोर का टैंक बुरी तरह क्षतिग्रस्त हुआ, और वे स्वयं घायल हो गए।

लेकिन तारापोर का हौसला अडिग था। उन्होंने मेडिकल निकासी से इनकार कर दिया और अपनी रेजिमेंट को प्रेरित करते हुए युद्ध जारी रखा। उनके नेतृत्व में, पूना हॉर्स ने 6 दिनों की भीषण लड़ाई में लगभग 60 पाकिस्तानी टैंकों को नष्ट किया, जबकि भारत को केवल 9 टैंकों का नुकसान हुआ। वजीरावाली, जसोरान और बुटुर-डोगरांदी जैसे क्षेत्रों पर कब्जा जमाया गया। यह 1965 का सबसे बड़ा टैंक युद्ध था।

शहादत: अमर बलिदान

16 सितंबर 1965 को, तारापोर का टैंक दुश्मन के गोले की चपेट में आ गया। टैंक में आग लग गई, और इस महान योद्धा ने वीरगति प्राप्त की। लेकिन उनकी शहादत ने भारतीय सेना को एक ऐसी प्रेरणा दी, जो आज भी जवानों के दिलों में जिंदा है।

परम वीर चक्र: सर्वोच्च सम्मान

तारापोर की वीरता के लिए उन्हें मरणोपरांत परम वीर चक्र से सम्मानित किया गया। आधिकारिक उद्धरण में कहा गया: “उन्होंने दुश्मन के हमले को विफल किया, घायल होने के बावजूद फिल्लौरा पर हमला जारी रखा और अपनी रेजिमेंट को प्रेरित किया। उनके नेतृत्व ने दुश्मन के भारी कवच पर विजय दिलाई।”

विरासत

लेफ्टिनेंट कर्नल अर्देशिर तारापोर की कहानी केवल एक सैनिक की नहीं, बल्कि एक ऐसे नायक की है, जिसने देश के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए। उनकी वीरता भारतीय सेना की परंपराओं का प्रतीक है। आज, 16 सितंबर 2025 को, उनकी शहादत के 60 वर्ष पूरे होने पर, हम उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। पूना हॉर्स रेजिमेंट और भारतीय सशस्त्र बलों में उनकी कहानी आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करती रहेगी।

तारापोर का जीवन हमें सिखाता है कि साहस और बलिदान की कोई सीमा नहीं होती। उनकी कहानी हर भारतीय को गर्व से भर देती है और हमें याद दिलाती है कि हमारे देश की रक्षा करने वाले नायकों का ऋण हम कभी नहीं चुका सकते। उनकी स्मृति में, हम केवल इतना कह सकते हैं:

जय हिंद!

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