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Param Veer Chakra

परमवीर चक्र (मरणोपरांत), 1 गोरखा राइफल्स कैप्टन गुरबचन सिंह सलारिया

 

कैप्टन गुरबचन सिंह सलारिया

परमवीर चक्र (मरणोपरांत), 1 गोरखा राइफल्स

कैप्टन गुरबचन सिंह सलारिया (आई सी 8497) का जन्म 29 नवंबर, 1935 को गांव जांगल, गुरदासपुर, पंजाब में हुआ था। इनके पिता का नाम श्री मुंशी राम था। उन्हें जून, 1957 को गोरखा राइफल्स में कमीशन मिला था।

बेल्जियनों के कांगो छोड़ने के बाद वहां पर गृह युद्ध की स्थिति पैदा हो गई। स्थिति में सुधार लाने के लिए राष्ट्र संघ ने वहां पर सैनिक हस्तक्षेप करने का निर्णय लिया जिसमें भारत ने राष्ट्र संघ सेना के लिए 3000 सैनिकों की एक बिग्रेड का सहयोग दिया। नवंबर 1961 में सुरक्षा परिषद ने कांगो में कटंगा के सैनिकों की गतिविधियों को रोकने का निश्चय किया। इससे कटंगा के अलगाववादी नेता शौम्बी बहुत नाराज हुए और उन्होंने राष्ट्र संघ के प्रति घृणा के प्रचार को और भी तेज कर दिया। फलस्वरूप वहां पर राष्ट्र संघ सेना के खिलाफ हिंसा भड़क उठी।

5 दिसंबर, 1961 को 3/1 गोरखा राइफल्स ने, एलिजाबेथविले हवाई अड्डे और कटंगा के बीच के सामरिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण गोल चक्कर पर, कटांगा सैनिकों द्वारा स्थापित सड़क अवरोध पर, 3′ मोर्टारों से हमला किया। उसने शत्रु का सड़क अवरोध नष्ट कर वहां पर अपना अवरोध स्थापित किया। जब कैप्टन सलारिया एक प्लाटून को लेकर अवरोध को मजबूत करने के लिए कंपनी से संपर्क करने की कोशिश में थे तब रास्ते में पुराने हवाई अड्डे के पास उन्हें कड़े विरोध का सामना करना पड़ा। दुश्मन ने अपने सुरक्षित ठिकानों से प्लाटून के दाहिने भाग पर स्वचालित और छोटे अस्त्रों से भारी गोलीबारी की। शत्रु के 90 सैनिक और 2 कवचित कारें उस क्षेत्र की सुरक्षा में डटी थीं। कैप्टन सलारिया दुश्मन की अधिक संख्या और फायर शक्ति से जरा भी विचलित नहीं हुए। उन्होंने सीधे हमला करके लक्ष्य को प्राप्त करने का निश्चय किया।
गोरखा सैनिकों ने दुश्मन पर खुखरी, संगीन और ग्रेनेड से हमला बोला। एक रॉकेट लांचर ने हमले में उनकी मदद की। इस तीखी झड़प में कैप्टन सलारिया और उनके सैनिकों ने दुश्मन के 40 सैनिकों को मार गिराया और कवचित कारों को ध्वस्त कर दिया। इस निर्भीक कार्रवाई से दुश्मन के हौसले पस्त हो गए और बड़ी संख्या तथा सुरक्षित पोजीशन में होने के बावजूद वे भाग खड़े हुए। इस झड़प में दुश्मन के स्वचालित हथियार की मार से कैप्टन सलारिया की गर्दन में चोट आई परंतु चोट की परवाह न कर वे तब तक लड़ते रहे जब तक बहुत खून बहने के कारण वे बेहोश न हो गए। बाद में इन्हीं घावों के कारण उनकी मृत्यु हो गई। इस मुठभेड़ में 12 सैनिक भी जख्मी हुए। इस प्रकार कैप्टन सलारिया ने बहादुरी से गोल चक्कर पर दुश्मन को आगे बढ़ने से रोक कर एलिजाबेथविले में राष्ट्र संघ मुख्यालय को शत्रु के घेरे में फंसने से बचा लिया।

कप्तान सलारिया को उनके उत्कृष्ट नेतृत्व, साहस और कर्तव्यपरायणता के लिए मरणोपरांत परम वीर चक्र से सम्मानित किया गया।

 

जय हिन्द जय भारत

(साभार – गूगल , पराक्रम गाथा सूचना और प्रसारण मंत्रालय भारत सरकार, विजय सोहनी, पेन टुडे, #shauryanamanfoundation)

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