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Maha Veer Chakra

महावीर चक्र हवलदार लाल बहादुर खत्री

—— शौर्य दिवस -शौर्यनमन—–
हवलदार लाल बहादुर खत्री
महावीर चक्र, वीर चक्र
यूनिट – 3/9 गोरखा राइफल्स
भारत-पाक युद्ध 1947-48
हवलदार लाल बहादुर खत्री का जन्म 1 जुलाई 1917 को हुआ था। वह नेपाल के पर्वत जिले के रामतला गांव के निवासी थे और भारतीय सेना की 9 गोरखा राइफल्स की 3 बटालियन में सेवारत थे। 1947-48 के भारत पाकिस्तान युद्ध में वह अपनी बटालियन के साथ जम्मू-कश्मीर में तैनात थे।
17 मई 1948 की रात्रि को जम्मू-कश्मीर के पुंछ में, 3/9 गोरखा राइफल्स की ‘D” कंपनी को एक उच्च विशेषता के दाईं ओर एक पहाड़ी को अधिकृत करने का आदेश दिया गया था। भयानक संघर्ष में, जब प्लाटून कमांडर घायल हो गया, तो हवलदार लाल बहादुर खत्री ने कमान नियंत्रित की। उनके नेतृत्व में प्लाटून ने पहाड़ी की पूर्ण वृत परिरेखा (RING CONTOUR) को ही सुरक्षित कर लिया।
उस स्थिति को पुनःप्राप्त करने के लिए, कुछ ही समय पश्चात अत्यधिक बल के साथ शत्रु ने पलटवार किया। भयानक युद्ध में, प्लाटून का गोला-बारूद भी शीघ्रता से घट रहा था जिससे हतोत्साहित होकर कुछ सैनिक रेंगते हुए पीछे हटने लगे। किंतु हवलदार खत्री पूर्ण समय अपनी चौकी पर डटे रहे और अदम्य साहस के साथ आगे बढ़ते शत्रु का प्रतिरोध किया और उसे आगे नहीं बढ़ने दिया।
इस मध्य, उनकी प्लाटून का एक राइफलमैन घातक रूप से घायल हो गया। उस रायफलमैन को, वहां से सुरक्षित निकालने के लिए आभासी मृत्यु का सामना करते हुए, हवलदार खत्री आगे बढ़े। जब हथगोले अल्प पड़ गए, तो उन्होंने आगे बढ़ते हुए शत्रु पर पत्थर फेंकना आरंभ कर दिया, वहीं अपने बाएं हाथ से उन्होंने घायल राइफलमैन को सुरक्षित स्थान पर पहुंचा दिया।
हवलदार खत्री के इस निडर साहस ने, उनके सैनिकों में उत्साह का संचार किया और उनके पलटवार में शत्रु के 14 सैनिक मारे गए। यह वीरता का एक उत्कृष्ट उदाहरण था, जिसने विकट समय में बटालियन की गंभीर असफलता को टाल दिया। हवलदार लाल बहादुर खत्री को, महावीर चक्र से सम्मानित किया गया।
इससे पूर्व 15 फरवरी 1948 को, घायल होने के उपरांत भी शत्रु की गहन गोलीबारी में, अपने सेक्शन के दो घायल सैनिकों को सुरक्षित निकाल लाने में अदम्य साहस और सौहार्द की भावना प्रदर्शित करने के लिए उन्हें “वीर चक्र” से सम्मानित किया गया।
युद्ध में दो समय वीरता पुरस्कार प्राप्त करना, किसी सैनिक के लिए परम सम्मान का विषय होता है। वह जमादार (नायब सूबेदार) के रूप में सेवानिवृत्त हुए थे।
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