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शमशेर सिंह सामरा
Maha Veer Chakra

Shamsher Singh Samra सेकंड लेफ्टिनेंट शमशेर सिंह सामरा: हिली की रक्तरंजित धरती पर अमर बलिदान

सेकंड लेफ्टिनेंट शमशेर सिंह सामरा: हिली की रक्तरंजित धरती पर अमर बलिदान

एस एस 22826
महावीर चक्र (मरणोपरांत)

आज हम बात करेंगे एक ऐसे वीर सिपाही की, जिन्होंने अपनी जान की परवाह न करते हुए देश की रक्षा के लिए सर्वस्व न्योछावर कर दिया। सेकंड लेफ्टिनेंट शमशेर सिंह सामरा – पंजाब की मिट्टी से निकले एक जांबाज़, जिनका बलिदान 1971 के भारत-पाक युद्ध में हिली के मैदान में अमर हो गया।

शमशेर सिंह सामरा
शमशेर सिंह सामरा

प्रारंभिक जीवन: पंजाब की धरती से निकला सूरमा

सेकंड लेफ्टिनेंट शमशेर सिंह सामरा का जन्म 10 जून 1945 को पंजाब के अमृतसर जिले के छोटे से गांव परवोकी में हुआ था। यह गांव पंजाब की हरियाली और सिख संस्कृति की जीवंतता का प्रतीक है, जहां खेतों की महक और मेहनतकश लोगों की कहानियां हवा में घुली रहती हैं।

उनके पिता, श्री जी.एस. सामरा, एक साधारण लेकिन गर्वीले परिवार के मुखिया थे, जिन्होंने अपने बेटे में देशभक्ति और अनुशासन की भावना बचपन से ही डाली।

शमशेर सिंह सामरा का बचपन गांव की मिट्टी में खेलते-कूदते बीता। वे पढ़ाई में होशियार थे और खेलकूद में आगे। लेकिन उनकी आंखों में हमेशा एक चमक थी – सेना में जाने की। 1960 के दशक में भारत-पाक तनाव बढ़ रहा था, और युवा शमशेर ने भारतीय थल सेना को अपना करियर चुना। 15 मार्च 1970 को उन्हें 8 गोरखा राइफल्स (8 गोरखा राइफल्स बटालियन) में कमीशन मिला।

गोरखा रेजिमेंट – नेपाली और भारतीय गोरखाओं की बहादुरी की मिसाल – में शामिल होना अपने आप में गर्व की बात थी। मात्र 25 वर्ष की उम्र में वे सेकंड लेफ्टिनेंट बन गए, और उनकी यूनिट को जल्द ही युद्ध के मोर्चे पर भेजा जाने वाला था।

1971 का युद्ध: पूर्वी मोर्चे पर हिली का किला

1971 का भारत-पाक युद्ध न केवल दो देशों का संघर्ष था, बल्कि बांग्लादेश की स्वतंत्रता की लड़ाई भी। पूर्वी मोर्चे पर पाकिस्तानी सेना ने अपनी पोजीशनें इतनी मजबूत बना ली थीं कि उन्हें तोड़ना असंभव लगता था।

हिली क्षेत्र (अब बांग्लादेश में) पाकिस्तान की रक्षा की कुंजी था। यहां की हर इमारत को किलेबंदी दी गई थी – प्रत्येक घर एक किला बन चुका था। हर टीले को खोदकर सेलप्रूफ पिलबॉक्स (गोला-प्रूफ बंकर) बना दिए गए थे। दुश्मन के पास स्वचालित हथियार, मशीन गनें और क्रॉसफायर की पूरी व्यवस्था थी।

8 गोरखा राइफल्स को इसी हिली कॉम्प्लेक्स पर कब्जा करने का जिम्मा सौंपा गया। यह यूनिट अपनी बहादुरी के लिए मशहूर थी – “कायर गोरखा मरे, बहादुर गोरखा जिए” उनका नारा था। लेकिन हिली में कई रक्तरंजित लड़ाइयां लड़ी गईं। पाकिस्तानी सैनिकों की भारी गोलाबारी ने कई हमलों को रोक दिया। हजारों गोले बरस रहे थे, और भारतीय सैनिकों की जान पर बन आई थी।

संकट की घड़ी: प्लाटून का नेतृत्व और अदम्य साहस

शमशेर सिंह सामरा एक निर्णायक हमले में दुश्मन की लाइट मशीन गनों (LMG) की क्रॉसफायर ने 8 गोरखा को रोक दिया। कंपनी की बाईं धावामार प्लाटून का नेतृत्व कर रहे सेकंड लेफ्टिनेंट शमशेर सिंह सामरा ने इस संकट में अपनी असली परीक्षा दी। वे जानते थे कि रुकना मतलब हार है। सैनिकों को प्रेरित करते हुए उन्होंने ललकारा: “आगे बढ़ो! देश के लिए!”

दुश्मन की दो LMG की क्रॉसफायर की परवाह न करते हुए, वे प्लाटून को दुश्मन की पोजीशन से मात्र 25 मीटर की दूरी तक ले गए। यह दूरी मौत की दहलीज थी। अचानक, एक LMG का गोला उनके सीने के दाहिने तरफ लगा।

खून बहने लगा, लेकिन शमशेर रुके नहीं। चोट की पीड़ा को नजरअंदाज कर उन्होंने नजदीकी मीडियम मशीन गन (MMG) बंकर पर हैंड ग्रेनेड फेंका और उसे उड़ा दिया। बंकर में धमाका हुआ, दुश्मन के सैनिक मारे गए।

अब वे दूसरे बंकर की ओर दौड़े। ग्रेनेड फेंकने ही वाले थे कि LMG की दूसरी बौछार उनके सीने में लगी। यह घाव घातक था। फिर भी, वे लड़खड़ाते हुए बंकर को एक हाथ से पकड़े रहे और दूसरे हाथ में ग्रेनेड थामे जमीन पर गिर पड़े। उनकी आंखें बंद हो गईं, लेकिन चेहरे पर धैर्य और दृढ़ निश्चय की झलक साफ झलक रही थी – मानो कह रहे हों, “मिशन पूरा हुआ!”

बलिदान का फल: हिली पर विजय और महावीर चक्र

शमशेर सिंह सामरा का बलिदान व्यर्थ नहीं गया। उनके साहस से प्रेरित होकर प्लाटून ने बंकरों को नेस्तनाबूद कर दिया, और 8 गोरखा राइफल्स ने हिली कॉम्प्लेक्स पर कब्जा कर लिया। यह जीत पूर्वी मोर्चे पर भारत की बढ़त का महत्वपूर्ण कदम थी। लेकिन कीमत थी एक युवा अधिकारी की जान।

उनकी अत्यंत वीरता, नेतृत्व और दृढ़ता के लिए भारत सरकार ने उन्हें महावीर चक्र (मरणोपरांत) से सम्मानित किया। महावीर चक्र भारत का दूसरा सर्वोच्च युद्धकालीन वीरता पुरस्कार है, जो केवल असाधारण साहस के लिए दिया जाता है। उनकी साइटेशन में लिखा है: “मृत्यु के बाद भी उनके चेहरे पर धैर्य और दृढ़ निश्चय की झलक नजर आ रही थी।”

विरासत: आज भी प्रेरणा का स्रोत

सेकंड लेफ्टिनेंट शमशेर सिंह सामरा की कहानी भारतीय सेना की किताबों में दर्ज है। अमृतसर के उनके गांव परवोकी में उनकी स्मृति में एक स्मारक है। हर साल 16 दिसंबर (विजय दिवस) पर उनकी याद की जाती है। वे हमें सिखाते हैं कि सच्ची देशभक्ति शब्दों में नहीं, बल्कि बलिदान में होती है।

जय हिंद! जय भारत!

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