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कैप्टन शंकर शंखपण वाल्कर
Maha Veer Chakra

Captain Shankar Shankhapan Walkar कैप्टन शंकर शंखपण वाल्कर – महावीर चक्र विजेता

कैप्टन शंकर शंखपण वाल्कर – महावीर चक्र विजेता

इतिहास में कुछ नाम ऐसे होते हैं जो केवल रिकॉर्ड का हिस्सा नहीं होते, बल्कि वे निस्वार्थ सेवा, अदम्य साहस और सर्वोच्च बलिदान की अमर गाथा बन जाते हैं। भारतीय सेना के जांबाज कैप्टन शंकर शंखपण वाल्कर (आईसी 23473), ऐसे ही एक वीर योद्धा थे, जिन्होंने 1971 के भारत-पाक युद्ध में अपनी असाधारण बहादुरी से देश की रक्षा करते हुए वीरगति प्राप्त की। उनकी अद्वितीय वीरता के लिए उन्हें मरणोपरांत भारत के दूसरे सबसे बड़े सैन्य अलंकरण महावीर चक्र से सम्मानित किया गया।

प्रारंभिक जीवन और सैन्य यात्रा

कैप्टन शंकर शंखपण वाल्कर
कैप्टन शंकर शंखपण वाल्कर

कैप्टन शंकर शंखपण वाल्कर का जन्म 08 मार्च, 1943 को महाराष्ट्र के कडगांव में हुआ था। उनके पिता श्री शखाराम खैरु वाल्कर थे। बचपन से ही देश सेवा का भाव रखने वाले कैप्टन शंकर शंखपण वाल्कर ने 15 जून, 1969 को भारतीय सेना की प्रतिष्ठित मद्रास रेजीमेंट में कमीशन प्राप्त किया। अपनी कमीशनिंग के मात्र दो वर्षों के भीतर, उन्हें राष्ट्र की रक्षा में अपना कौशल दिखाने का अवसर मिला, जो भारतीय सैन्य इतिहास में हमेशा के लिए दर्ज हो गया।

1971 के रणक्षेत्र में कर्तव्यनिष्ठा

1971 war
1971 का भारत-पाक युद्ध

जब 1971 का भारत-पाक युद्ध छिड़ा, तब कैप्टन शंकर शंखपण वाल्कर राजस्थान सेक्टर में 18 मद्रास बटालियन के साथ मोर्टार अफसर (Mortar Officer) के रूप में तैनात थे। उनकी बटालियन को गदरा-छाचरो अक्ष पर आगे बढ़ने का महत्वपूर्ण कार्य सौंपा गया था।

बटालियन ने दुश्मन के कड़े प्रतिरोध और सारे अवरोधों को सफलतापूर्वक पार करते हुए, 04 दिसम्बर को गदरा नगर पर कब्जा कर लिया। उनकी अग्रिम कार्रवाई 16 दिसम्बर को हिंगोर तार तक पहुँची, जहाँ दुश्मन ने एक अत्यंत मजबूत रक्षात्मक मोर्चा बना रखा था। भारतीय सैनिकों को भीषण गोलाबारी का सामना करना पड़ा, और इस चुनौती से निपटने का जिम्मा कैप्टन वाल्कर के कंधों पर था।

घावों की उपेक्षा कर नेतृत्व

भयंकर गोलाबारी के बीच, कैप्टन शंकर शंखपण वाल्कर ने अपनी सुरक्षा को पूरी तरह से नजरअंदाज करते हुए, रक्षात्मक गोलाबारी के कार्य को प्रभावी ढंग से समन्वयित करने के लिए हर कंपनी के ठिकाने का दौरा किया। वे लगातार आगे की चौकियों पर जाकर स्थिति का जायजा लेते रहे और सैनिकों का हौसला बढ़ाते रहे।

इसी दौरान, दुश्मन की गोलाबारी में उन्हें दो बार किर्चे (स्पलिंटर्स) लगीं और वे गंभीर रूप से घायल हो गए। युद्ध के नियम के अनुसार, उन्हें चिकित्सा के लिए युद्ध भूमि से निकाला जाना चाहिए था, लेकिन इस बहादुर अधिकारी ने निकासी के लिए स्पष्ट असहमति प्रकट की। उनके लिए, अपने व्यक्तिगत घावों से ज्यादा महत्वपूर्ण बटालियन का मिशन और उनके साथी सैनिकों की सुरक्षा थी। वह अपने घायल शरीर के साथ भी मोर्चे पर डटे रहे।

मोर्टार प्लाटून का अंतिम संघर्ष

रात भर गोलाबारी जारी रहने के बाद, सुबह दुश्मन ने “ए” और “डी” कंपनियों के ठिकानों पर भयानक हमला कर दिया। आक्रमण इतना भीषण था कि ये दोनों कंपनियाँ पीछे हटने को मजबूर हो गईं, जिससे बटालियन मुख्यालय और कैप्टन शंकर शंखपण वाल्कर की मोर्टार प्लाटून दुश्मन के सामने अरक्षित हो गई। स्थिति अत्यंत खतरनाक थी, क्योंकि उन्हें भारतीय तोपखाने से कोई सहायता भी उपलब्ध नहीं थी।

संकट की इस घड़ी में, घायल कैप्टन शंकर शंखपण वाल्कर का नेतृत्व अद्भुत और प्रेरणादायक साबित हुआ। उन्होंने अपनी मोर्टार प्लाटून को प्रेरित किया और व्यक्तिगत रूप से मार्टर फायर का निर्देशन करना जारी रखा। उनके सटीक निर्देशन और अदम्य साहस ने दुश्मन को भारी नुकसान पहुँचाया। इस रक्षात्मक झड़प के दौरान, कैप्टन शंकर शंखपण वाल्कर ने खुद भी अपनी राइफल से कम से कम चार शत्रुओं को मार गिराया

इस भयंकर और असमान संघर्ष में, देश की रक्षा करते हुए, बहादुर कैप्टन शंकर शंखपण वाल्कर को घातक चोटें आईं और उन्होंने वहीं वीरगति प्राप्त की। इस लड़ाई में बटालियन के 2 जेसीओ और 18 अन्य सैनिक भी शहीद हुए, जबकि 3 अफसर, 2 जेसीओ और 8 अन्य लापता रहे या मारे गए।

महावीर चक्र

महावीर चक्र MVC
महावीर चक्र MVC

कैप्टन शंकर शंखपण वाल्कर ने न केवल अपने दायित्व का निर्वहन किया, बल्कि उन्होंने व्यक्तिगत खतरे और गंभीर चोट के बावजूद, अंतिम क्षण तक लड़कर सैन्य नेतृत्व का एक अभूतपूर्व मानक स्थापित किया। उनकी उत्कृष्ट वीरता, प्रेरक नेतृत्व और अनुकरणीय कर्तव्यनिष्ठा के लिए, राष्ट्र ने उन्हें मरणोपरांत महावीर चक्र से सम्मानित किया।

कैप्टन शंकर शंखपण वाल्कर की कहानी हमें याद दिलाती है कि हमारे देश की स्वतंत्रता उन वीरों के सर्वोच्च बलिदान पर टिकी है, जो ‘पहले मैं नहीं, बल्कि तुम’ के सिद्धांत पर जीते और मरते हैं।

also read:-ग़दर आंदोलन The Ghadar Conspiracy, and the CRUSHING Sacrifice of Lahore (1915)

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