—— बलिदान दिवस -शौर्यनमन—–
“नौशेरा का शेर”
ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान
IA269T
15-07-1912 – 03-07-1948
महावीर चक्र (मरणोपरांत)
पैराशूट
झांगड़ व नौशेरा का संग्राम
भारत-पाक युद्ध 1947-48
ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान का जन्म ब्रिटिश भारत में, 15 जुलाई 1912 को संयुक्त प्रांत (वर्तमान उत्तरप्रदेश) के मऊ जिले के बीबीपुर गांव में पुलिस अधिकारी मोहम्मद फारूक एवं श्रीमती जमीलन बीबी के परिवार में हुआ था। उन्हें ब्रिटिश-भारतीय सेना की 10 बलूच रेजिमेंट में कमीशन प्राप्त हुआ था। बंटवारे के समय पाकिस्तान ने ब्रिगेडियर उस्मान को पाकिस्तानी सेना के सेनाध्यक्ष पद का प्रलोभन तक दिया, किंतु वह भारत में ही रहे। जब बलूच रेजिमेंट बंटवारे में पाकिस्तान चली गई तो उन्हें डोगरा रेजिमेंट में स्थानांतरित किया गया, तत्पश्चात उन्हें 77 पैरा ब्रिगेड की कमान दी गई थी।
1947-49 के कश्मीर युद्ध में 77 पैरा ब्रिगेड की कमान संभाल रहे ब्रिगेडियर उस्मान को दिसंबर 1947 में झांगड़ में तैनात 50 पैरा ब्रिगेड की कमान संभालने लिए भेजा गया था। चूंकि, भारतीय सेनाएं सर्वप्रथम नागरिक ठिकानों को सुरक्षित कर रही थी। ऐसे में 25 दिसंबर 1947 को भारी प्रतिरोध होते हुए भी कबायलियों ने झांगड़ पर अधिकार कर लिया। मीरपुर और कोटली से आने वाली सड़कों के जंक्शन पर स्थित झांगड़ का अत्यंत सामरिक महत्व था। किंतु, उससे अधिक महत्व ब्रिगेडियर उस्मान का अपने सैनिकों पर गर्व और उनके सम्मान को स्थाई करने के झांगड़ को पुनः प्राप्त करने के दृढ़ संकल्प का था।
उसी दिन ब्रिगेडियर उस्मान ने झांगड़ पर पुनः अधिकार करने का प्रण लिया। एक ऐसा प्रण या उपलब्धि जो उन्होंने अपने जीवन के मूल्य पर तीन महीने पश्चात प्राप्त की थी। नौशेरा की रक्षा में भारी बाधाओं में भी उनके रणकौशल, कुशल रणनीति एवं उग्र नेतृत्व के परिणामस्वरूप नौशेरा में और उसके आसपास 2000 हताहतों (लगभग 1000 मृत और 1000 घायल) के साथ पाकिस्तान की घोर पराजय हुई जबकि भारतीय सेना के मात्र 33 सैनिक बलिदान हुए और 102 घायल हुए।
इस युद्ध ने उन्हें “नौशेरा का शेर” की उपाधि दी। नौशेरा की पराजय से आक्रोशित पाकिस्तान ने ब्रिगेडियर उस्मान के सिर पर 50,000 रुपयों के पुरस्कार की घोषणा की थी, जो उस समय अति वृहद राशि हुआ करती थी। नौशेरा की विजय से अप्रभावित ब्रिगेडियर उस्मान मात्र भूमि पर एक चटाई बिछा कर उस पर ही शयन करते रहे क्योंकि उन्होंने प्रण किया था कि जब तक वह झांगड़ को पुनः विजित नहीं कर लेते तब तक वह खाट पर नहीं सोएंगे। झांगड़ में पाकिस्तानी सेना व घुसपैठिए दोनों मिलकर वृहद बल थे व संख्या में अधिक थे। झांगड़ पर अधिकार का ब्रिगेडियर उस्मान के लिए विशेष महत्व था।
ऑपरेशन फरवरी 1948 के अंतिम सप्ताह में आरंभ हुआ। 19 इंफेंट्री ब्रिगेड उत्तरी रिज के साथ आगे बढ़ी, जबकि 50 पैरा ब्रिगेड ने दक्षिण में नौशेरा-झांगड़ रोड पर प्रभावी घुसपैठियों को पहाड़ियों से निष्कासित किया। अंततः शत्रु को इस क्षेत्र से खदेड़ दिया गया और झांगड़ पर पुनः अधिकार कर लिया गया था। पाकिस्तान ने मई 1948 में अपनी नियमित सेना को युद्ध मैदान में उतारा। ऐसे में झांगड़ को एक बार पुनः तोपों की भयानक गोला वृष्टि को झेलना पड़ा। पाकिस्तानी सेना द्वारा झांगड़ पर अनेक निर्धारित आक्रमण किए गए, किंतु ब्रिगेडियर उस्मान ने शत्रु के झांगड़ पर अधिकार करने के समस्त प्रयासों को विफल कर दिया था।
3 जुलाई 1948 को, झांगड़ की कठिन रक्षा में, सांय के समय शत्रु तोप का एक 25 पाउंडर गोला दुर्भाग्य से प्रत्यक्ष वहीं आ कर गिरा जहां ब्रिगेडियर उस्मान खड़े थे। गोले के भयानक विस्फोट से वह वहीं पर ही वीरगति को प्राप्त हो गए। उनके अंतिम शब्द थे “हम तो मर रहे हैं, लेकिन वह क्षेत्र शत्रु के हाथ नहीं पड़ना चाहिए जिस के लिए हम लड़ रहे थे।” दिल्ली के जामिया मिल्लिया विश्वविद्यालय में उनका सैन्य सम्मान से अंतिम संस्कार किया गया। ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान को उनके प्रेरक नेतृत्व, कुशल रणनीति एवं दृढ़ निश्चय के लिए मरणोपरांत “महावीर चक्र” से सम्मानित किया गया।
ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान 1947-48 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में बलिदान होने वाले सर्वाधिक ऊंची रैंक के अधिकारी थे। सादगीपूर्ण व व्यसन रहित जीवन जीने वाले ब्रिगेडियर उस्मान आजीवन अविवाहित रहे। अपने वेतन का वृहद भाग वह अनाथ और निर्धन बालकों की सहायता करने और उनकी शिक्षा के लिए दान किया करते थे। वह वास्तव में वीरता के प्रतीक, महान राष्ट्रभक्त और प्रबल राष्ट्रवादी थे।
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