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Maha Veer Chakra

महावीर चक्र कैप्टन प्रताप सिंह

—— बलिदान दिवस -शौर्यनमन—–
कैप्टन प्रताप सिंह
SS-31468
17-01-1960 – 26-05-1988
महावीर चक्र (मरणोपरांत)
यूनिट – 75 मीडियम रेजिमेंट (Basanter River)
ऑपरेशन मेघदूत
कैप्टन प्रताप सिंह का जन्म 17 जनवरी 1960 को दिल्ली के बसई दारापुर गांव में कैप्टन श्री खजान सिंह के परिवार में हुआ था। 27 अगस्त 1983 को उन्हें भारतीय सेना की रेजिमेंट ऑफ आर्टिलरी की 75 मीडियम रेजिमेंट में सैकिंड लेफ्टिनेंट के रूप में कमीशन प्राप्त हुआ था।
वर्ष 1988 में उन्हें सियाचिन ग्लेशियर में सामरिक रूप से सर्वाधिक महत्वपूर्ण बाना पोस्ट पर तैनात किया गया था। इस पोस्ट पर पुनः अधिकार करने के लिए पाकिस्तान प्रायः प्रयास करता रहता था।
9 मई 1988 को, पाकिस्तान की एक कमांडो टुकड़ी ने बाना पोस्ट पर अधिकार करने के उद्देश्य से पोस्ट की भीत पर रस्सियों और सीढ़ी प्रणाली के प्रयोग से चढ़ कर अत्यंत ही कपटपूर्ण आक्रमण किया। इस आक्रमण को कैप्टन प्रताप सिंह के नेतृत्व में पोस्ट पर तैनात सैनिकों ने सतर्कता से विफल कर दिया, किंतु शत्रु द्वारा स्थापित की हुई रस्सियां और सीढ़ी प्रणाली वहां वैसे ही पड़ी हुई थी। जिससे शत्रु पुनः आक्रमण का प्रयास कर सकता था। अत: सुरक्षा की दृष्टि से वहां से इन रस्सियों को काटना और सीढ़ी प्रणाली को हटाना अति आवश्यक था।
18 मई 1988 को, सैकिंड लेफ्टिनेंट अशोक चौधरी ने राइफलमैन कुंवर सिंह के साथ यह प्रयास किया और वह 4 रस्सियों में से दो रस्सियों तक पहुंचने और उन्हें काटने में सफल हो गए। 26 मई 1988 को पुनः शेष रही दो रस्सियों को काटने और सीढ़ी प्रणाली को हटाने का निर्णय लिया गया। राइफलमैन कुंवर सिंह की सहायता से कैप्टन प्रताप सिंह रेंगते हुए हिम की भीत पर नीचे उतरे। नीचे उतरने पर रस्सियों के सिरों पर उन्हें प्रचुर मात्रा में गोला-बारूद और हथगोले पड़े मिले, जो वास्तव में शत्रु की एक कुटिल चाल थी।
कैप्टन प्रताप सिंह इस गोला-बारूद की जांच कर रहे थे, उसी समय एक हथगोले में विस्फोट हो गया, जिससे उनके दांए हाथ और छाती में घातक आघात लगने से वह गंभीर रूप से घायल हो गए। घायल होते हुए भी अदम्य साहस और दृढ़ निश्चय का परिचय देते हुए, वह रेंगते हुए आगे बढ़े और उन्होंने कमांडो चाकू से रस्सियों को काट दिया व सीढ़ियों को हटाकर नीचे गिरा दिया। जब वह ऊपर आ रहे थे, उस समय वीरगति को प्राप्त हो गए।

कैप्टन प्रताप सिंह को उनके असाधारण साहस, दृढ़ता एवं सर्वोच्च बलिदान के लिए मरणोपरांत “महावीर चक्र” से सम्मानित किया गया।
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