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Kargil story

कारगिल युद्ध 9 जुलाई 1999 यूनिट – 8 जाट रेजिमेंट

—— बलिदान दिवस -शौर्यनमन—–
हवलदार शीशराम गिल
3172590
16-07-1961 – 09-07-1999
वीर चक्र (मरणोपरांत)
वीरांगना – श्रीमती संतरा देवी
लांस नायक आजाद सिंह
3181852K
04-05-1969 – 09-07-1999
वीरांगना – श्रीमती सुशीला देवी
सिपाही पवित्र कुमार श्योराण
3189213X
09-08-1978 – 09-07-1999
सिपाही नरेंद्र सिंह जाखड़
3189621H
17-09-1978 – 09-07-1999
यूनिट – 8 जाट रेजिमेंट
ऑपरेशन विजय
कारगिल युद्ध 1999
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हवलदार शीशराम का जन्म 16 जुलाई 1961 को, राजस्थान के झुंझुनूं जिले की बुहाना तहसील के बिशनपुरा (ब्राह्मण की ढाणी) गांव में चौधरी शंकराराम गिल एवं श्रीमती राजकौरी देवी के परिवार में हुआ था। आगे चलकर उन्हें ASC के पूर्व सैनिक चौधरी सरदाराम एवं श्रीमती सुरजी देवी ने गोद ले लिया था। बड़़ागांव से 11 वीं कक्षा उत्तीर्ण करने के पश्चात 6 दिसंबर 1979 को वह भारतीय सेना की जाट रेजिमेंट में रंगरूट के रूप में भर्ती हुए थे।
प्रशिक्षण के पश्चात उन्हें 8 जाट बटालियन में सिपाही के पद पर नियुक्त किया गया था। 20 अप्रैल 1980 को, उनका विवाह हुआ था। अपनी बटालियन में विभिन्न परिचालन परिस्थितियों और स्थानों पर सेवाएं देते हुए, वर्ष 1999 तक वह हवलदार के पद पर पदोन्नत हो गए थे।
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लांस नायक आजाद सिंह का जन्म हरियाणा के गुड़गांव जिले के पटौदी क्षेत्र के मुमताजपुर गांव में, श्री सुल्तान सिंह एवं श्रीमती कमला देवी के परिवार में हुआ था। जनवरी 1988 में वे भारतीय सेना की जाट रेजिमेंट में, भर्ती हुए थे। प्रशिक्षण के पश्चात उन्हें 8 जाट बटालियन में सिपाही के पद पर नियुक्त किया गया था। वर्ष 1990 में उनका विवाह हुआ था।
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सिपाही पवित्र कुमार का जन्म 9 अगस्त 1978 को हरियाणा के हिसार जिले के नारनौंद तहसील के मिलकपुर गांव में पूर्व सैनिक किताब सिंह श्योराण एवं श्रीमती सुजानी देवी के परिवार में हुआ था। बाल्यकाल से ही वह सेना के प्रति आकर्षित थे। वर्ष 1996 में, वह भारतीय सेना की जाट रेजिमेंट में, रंगरूट के रूप में भर्ती हुए थे। प्रशिक्षण के पश्चात उन्हें 8 जाट बटालियन में, सिपाही के पद पर नियुक्त किया गया था।
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सिपाही नरेंद्र सिंह का जन्म 17 सितम्बर 1978 को हरियाणा के फतेहाबाद जिले के भट्टूकलां ब्लॉक के मेहूवाला गांव में, सैन्य पृष्ठभूमि के परिवार में, पूर्व बीएसएफ कर्मी श्री जय सिंह जाखड़ एवं श्रीमती रेशमा देवी के घर में हुआ था। नरेंद्र सिंह के दादा व पिता सैन्य सेवाओं में होने से बाल्यकाल से ही वह सेना से अति प्रभावित थे। उनकी प्रारंभिक शिक्षा मध्यप्रदेश के टेकनपुर कैंट में व उसके पश्चात फतेहाबाद में हुई। नरेंद्र सिंह किसी प्रकार के नशे के विरोधी थे। वॉलीवाल और क्रिकेट के खेल में उनकी विशेष रूचि थी। वर्ष 1996 में वह भारतीय सेना की जाट रेजिमेंट में भर्ती हुए थे। अप्रैल 1999 में, वह दो माह के अवकाश पर गांव आए तो परिजनों ने राजस्थान की युवती से उनकी सगाई भी कर दी थी।
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“ऑपरेशन विजय” में, 8/9 जुलाई 99 को हवलदार शीशराम को उनके दल के साथ 17000 फीट की ऊंचाई पर मजनूं में, शत्रु की एक चौकी पर आक्रमण करने का कार्य सौंपा गया। हवलदार शीशराम ने आगे हो कर अपने समूह का नेतृत्व किया और लक्ष्य तक पहुंचने के लिए, अनारोहणीय, कठिन चढ़ाई वाले उबड़खाबड़ भूभाग की ऊंचाइयों को विशेष पर्वतारोही उपकरणों की सहायता से, शत्रु के तोपखाने व मोर्टार की गोला वृष्टि एवं स्वचालित शस्त्रों की गहन फायरिंग का सामना करते हुए लांघ लिया।
शत्रु के प्रभावी फायर से, हवलदार शीशराम को, पैर में गोली लगने से गंभीर घाव हो गया, तो भी वह अपने समूह को निरंतर लक्ष्य की ओर आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करते रहे। गंभीर घाव के होते हुए भी उन्होंने प्रत्येक अवसर पर अपनी स्नाइपर और लाइट मशीनगन से फायर किए जिसके परिणामस्वरूप 6 शत्रु सैनिक मारे गए और 4 घायल हो गए। गंभीर रूप से घायल होते हुए भी उन्होंने युद्धस्थल से हटना अस्वीकार कर दिया, क्योंकि वह देख रहे थे कि उनके हटने से समूह के युद्धक बल में अल्पता से मिशन विफल हो जाएगा।
हवलदार शीशराम और उनके सैनिक असाधारण साहस, कर्तव्य के प्रति अति समर्पण प्रदर्शित करते हुए, वीरता से युद्ध करते रहे। भीषण संघर्ष के पश्चात जाटों ने वहां अधिकार कर लिया। किंतु घोर अंधेरे और धुंध का लाभ लेते हुए शत्रु ने रात्रि में ही पलटवार किया और साथ ही तोपों से इस चौकी पर प्रचंड गोला वृष्टि की। 9 जुलाई 1999 की रात्रि 3:00 बजे एक गोला उनकी स्थिति के निकट आ कर गिरा, जिसके भयानक विस्फोट से हवलदार शीशराम, लांस नायक आजाद सिंह, सिपाही पवित्र कुमार और सिपाही नरेंद्र सिंह वीरगति को प्राप्त हो गए।
हवलदार शीशराम ने, शत्रु की भीषण गोला वृष्टि में अदम्य साहस, दृढ़ निश्चय व वीरता का प्रदर्शन किया और जीवन का सर्वोच्च बलिदान दिया। उन्हें मरणोपरांत “वीर चक्र” से सम्मानित किया गया।
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