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कारगिल युद्ध 8 जुलाई 1999 सिपाही इमलियाकुम

—— शौर्य दिवस -शौर्यनमन—–
सिपाही (सूबेदार) इमलियाकुम एओ
महावीर चक्र
यूनिट – 2 नागा बटालियन (Head Hunters)
ट्विन बंप का संग्राम
ऑपरेशन विजय
कारगिल युद्ध 1999
सिपाही इमलियाकुम का जन्म 25 जुलाई 1976 को नागालैंड के मोकोकचुंग जिले के चुचुयिमपांग गांव में श्री आर.एन. उनपा आओ एवं श्रीमती आओ एन ला के परिवार में हुआ था। 4 मई 1994 को वह भारतीय सेना की नागा रेजिमेंट में रंगरूट के रूप में भर्ती हुए थे। प्रशिक्षण के पश्चात उन्हें 2 नागा बटालियन में सिपाही के पद पर नियुक्त किया गया था। कारगिल युद्ध में वह अपनी बटालियन के साथ युद्धक्षेत्र में तैनात थे।
“ऑपरेशन विजय” में, 8 जुलाई 1999 को, 2 नागा बटालियन की ‘A’ कंपनी को, द्रास सेक्टर की मश्कोह घाटी में, 15000 फीट की ऊंचाई पर ‘ट्विन बंप’ के पश्चिम में, हमारे सैनिकों को हताहत कर रही एक मोर्टार स्थिति पर आक्रमण कर उसे निष्क्रिय करने का कार्य सौंपा गया था। सिपाही इमलियाकुम भी इस आक्रमणकारी कंपनी के सदस्य थे।
सिपाही इमलियाकुम इस कार्य के लिए स्वेच्छा से आगे आए। उन्हें उस मोर्टार स्थिति की परिधि के बाहर तैनात शत्रु संतरी को मारने का विशेष दायित्व दिया गया। यद्यपि, नागा जन्मजात योद्धा होते हैं, किंतु शत्रु ठिकाने पर भारी पहरा था और यह कार्रवाई दिन के प्रकाश में, ही की जानी थी।
सिपाही इमलियाकुम दिन के प्रकाश में, छिपते हुए, दबे पांव शत्रु संतरी के समीप पहुंचे और उसे मार दिया। इसके पश्चात, वह आगे बढ़ते रहे और उन्होंने एक अन्य संतरी को भी मार दिया। तत्पश्चात उन्होंने अपनी आक्रमणकारी टुकड़ी के साथ उस मोर्टार स्थिति पर आक्रमण किया और उसे निष्क्रिय कर दिया।
सिपाही इमलियाकुम ने दो शत्रु सैनिकों को व्यक्तिगत रूप से मारने में, अनुकरणीय साहस, दृढ़ संकल्प, धैर्य और आत्मविश्वास प्रदर्शित किया। उन्होंने शत्रु की अत्यंत ही सुदृढ़ मोर्टार स्थिति को निष्क्रिय करने में कंपनी की सहायता की। सिपाही इमलियाकुम द्वारा शत्रु संतरियों को मारना एक वृहद सफलता थी। इस छापे में, नागा कंपनी ने शत्रु के तीन 120 मिमी मोर्टार, दो 81 मिमी मोर्टार और गोला-बारूद के विशाल भंडार पर अधिकार कर लिया था।
सिपाही इमलियाकुम ने, इस दुस्साहसिक कार्रवाई में, शत्रु के समक्ष अनुकरणीय साहस प्रदर्शित किया। उन्होंने शत्रु की मोर्टार स्थिति पर आक्रमण करने और दो शत्रु सैनिकों को मारने में, आत्मविश्वास, धैर्य और दृढ़ संकल्प का सफल प्रदर्शन किया। जनवरी 2000 में उन्हें महामहिम राष्ट्रपति के. आर. नारायणन द्वारा “महावीर चक्र” से सम्मानित किया गया।
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