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कप्तान चन्दर नारायण सिंह
Maha Veer Chakra

Captain Chander Narayan Singh कप्तान चन्दर नारायण सिंह शौर्य गाथा: महावीर चक्र विजेता (मरणोपरांत)

आज हम भारतीय सेना के एक ऐसे महान सपूत की कहानी से रूबरू होंगे, जिन्होंने देश की रक्षा में अपनी निजी सुरक्षा की परवाह न करते हुए, अदम्य साहस और प्रेरक नेतृत्व का परिचय दिया। हम बात कर रहे हैं कप्तान चन्दर नारायण सिंह, जिन्हें 1965 के भारत-पाक युद्ध के दौरान वीरगति प्राप्त करने पर, देश के दूसरे सर्वोच्च सैन्य सम्मान महावीर चक्र (मरणोपरांत) से अलंकृत किया गया।

वंश और पृष्ठभूमि

कप्तान चन्दर नारायण सिंह
कप्तान चन्दर नारायण सिंह

कप्तान चन्दर नारायण सिंह का जन्म 02 जुलाई, 1939 को जम्मू और कश्मीर के श्रीनगर में हुआ था। उनके घर में सैन्य सेवा एक वंशानुगत परंपरा थी। उनके पिता, कप्तान बलवंत सिंह, और चाचा भी भारतीय सेना में उच्च पदों पर आसीन थे। यह वातावरण ही था जिसने युवा चन्दर नारायण सिंह में बचपन से ही देशभक्ति और साहस के बीज बो दिए थे।

इस गौरवशाली परंपरा को आगे बढ़ाते हुए, उन्हें 11 जून, 1961 को भारतीय सेना की अत्यंत प्रतिष्ठित रेजिमेंट गढ़वाल राइफल्स में कमीशन मिला। सेना में उनका शुरुआती कार्यकाल उनकी प्रोफेशनल दक्षता और नेतृत्व क्षमता को निखारने में बीता, जो बाद में उन्हें एक अभूतपूर्व सैन्य अधिकारी के रूप में स्थापित करने वाला था।

पुंछ में निर्णायक क्षण

1965 ind pak war
1965 ind pak war

अगस्त 1965, वह समय था जब भारत-पाकिस्तान सीमा पर तनाव चरम पर था और युद्ध की आहट सुनाई दे रही थी। कप्तान चन्दर नारायण सिंह उस समय पुंछ सेक्टर में 120 इंफैन्ट्री ब्रिगेड मुख्यालय में एक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी संभाल रहे थे।

05 अगस्त, 1965 को एक अति-महत्वपूर्ण और खतरनाक खुफिया जानकारी मिली: 5 पाकिस्तानी घुसपैठिए भारतीय क्षेत्र में प्रवेश कर चुके थे और वे सीधे ब्रिगेड मुख्यालय के आसपास देखे गए थे। यह घुसपैठ न सिर्फ एक सैन्य खतरा थी, बल्कि मुख्यालय की सुरक्षा और संचालन के लिए एक गंभीर चुनौती थी। किसी भी बड़े खतरे को टालने के लिए तत्काल और निर्णायक कार्रवाई आवश्यक थी।

इस नाजुक स्थिति में, 26 वर्षीय कप्तान चन्दर नारायण सिंह को घुसपैठियों को ढूंढ निकालने और उनका सफाया करने के लिए एक गश्ती दल का नेतृत्व करने की जिम्मेदारी सौंपी गई। यह मिशन अत्यधिक जोखिम भरा था, खासकर शाम के धुंधलके में, जब दुश्मन के पास छिपने और घात लगाने का प्राकृतिक लाभ होता है। गश्ती दल 18:30 बजे (शाम 6:30 बजे) अंधेरे और ऊबड़-खाबड़ पर्वतीय इलाके में रवाना हुआ।

दुश्मन के ठिकाने पर साहसी हमला

रात का निर्णायक धावा

1965 ind pak war
1965 ind pak war

एक घंटे की गहन खोज के बाद, 19:30 बजे (शाम 7:30 बजे), गश्ती दल को अचानक भीषण गोलाबारी का सामना करना पड़ा। दुश्मन एक ऊंचाई पर स्थित ठिकाने से हल्की मशीन गन (LMGs), मोर्टार और हथगोलों से आग उगल रहा था। इस अचानक और भारी हमले से एक भारतीय सैनिक की शहादत हो गई।

स्थिति विकट थी, लेकिन कप्तान चन्दर नारायण सिंह की दृढ़ता और शांत मन अविचलित रहा। उन्होंने तुरंत स्थिति का आकलन किया। दुश्मन को उनकी स्थिति से बेदखल करना आसान नहीं था, लेकिन जान गंवाने के बजाय, उन्होंने रणनीतिक चतुराई का प्रदर्शन किया।

भारी गोलाबारी से अपने दल को बचाते हुए, उन्होंने बड़ी समझदारी से गश्ती दल को दुश्मन के पार्श्व (Flank) की ओर ले गए, जहाँ उन्हें प्राकृतिक ओट (कवर) मिल गई। यह एक मास्टरस्ट्रोक था। नई स्थिति से, भारतीय सैनिकों ने सटीक जवाबी कार्रवाई की। इस पैंतरेबाजी के कारण, दुश्मन की वे LMGs, जो पहले प्रभावी ढंग से गश्ती दल पर हमला कर रही थीं, तुरंत निष्क्रिय हो गईं।

लेकिन दुश्मन संख्या में अधिक और अच्छी तरह से जमा हुआ था। कप्तान चन्दर नारायण सिंह ने दिन के उजाले में सीधी लड़ाई के बजाय रात के अंधेरे का फायदा उठाने का निर्णय लिया। उन्होंने रात को धावा बोलने की योजना बनाई।

परिणाम

कप्तान चन्दर नारायण सिंह
कप्तान चन्दर नारायण सिंह

व्यक्तिगत सुरक्षा की परवाह न करते हुए, कप्तान सिंह ने अपनी वीरता की पराकाष्ठा दिखाते हुए, मुट्ठी भर सैनिकों के साथ रात में दुश्मन पर धावा बोल दिया। मोर्टार की गर्जना और हथगोलों की बौछार के बीच, उन्होंने अपने सैनिकों को प्रेरित किया और उन्हें आगे बढ़ाया। उनका लक्ष्य स्पष्ट था: घुसपैठियों के ठिकाने को नष्ट करना

अविश्वसनीय साहस का परिचय देते हुए, कप्तान चन्दर नारायण सिंह अपनी टीम के साथ दुश्मन के ठिकाने के 50 मीटर अंदर तक घुस गए। उनकी दहाड़ और प्रेरणा ने उनके सैनिकों में नई ऊर्जा भर दी। उन्होंने तुरंत बिना रुके दूसरा आक्रमण शुरू किया, और दुश्मन की चौकी के 10 मीटर के करीब पहुँच गए।

विजय की दहलीज पर, नियति ने अपना क्रूर खेल दिखाया। इसी क्षण, दुश्मन की एक लाइट मशीन गन की बौछार उनके सीने में लगी और कप्तान चन्दर नारायण सिंह ने देश की सेवा में अपनी अंतिम सांस ली।

हालांकि उन्होंने अपनी जान गंवा दी, लेकिन उनका बलिदान व्यर्थ नहीं गया। उनके साहसी और निर्णायक हमले ने दुश्मन को भारी नुकसान पहुंचाया। इस मुठभेड़ में 6 पाकिस्तानी सैनिक मारे गए और कई घायल हुए। दुश्मन भगदड़ में बड़ी मात्रा में गोला-बारूद पीछे छोड़ गया।

सम्मान महावीर चक्र

महावीर चक्र MVC
महावीर चक्र MVC

कप्तान चन्दर नारायण सिंह को विशिष्ट वीरता, अदम्य साहस और उत्कृष्ट प्रेरक नेतृत्व के लिए मरणोपरांत महावीर चक्र से अलंकृत किया गया।

उनका यह सर्वोच्च बलिदान भारतीय सेना के अमर बलिदानों में हमेशा याद किया जाएगा, जो हमें सिखाता है कि कर्तव्य हमेशा सुरक्षा से ऊपर होता है।

जय हिन्द! 

also read:-नायक सुगन सिंह (महावीर चक्र) Naik Sugan Singh (Maha Vir Chakra)1971:A Legend of Unyielding Valor and Sacrifice

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