kirti chakra – shauryasaga.com https://shauryasaga.com shaurya saga Mon, 01 Dec 2025 11:08:29 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=6.9 https://i0.wp.com/shauryasaga.com/wp-content/uploads/2024/02/cropped-logo1.png?fit=32%2C32&ssl=1 kirti chakra – shauryasaga.com https://shauryasaga.com 32 32 230886147 Inspector Dilip Kumar Das इंस्पेक्टर दिलीप कुमार दास ‘कीर्ति चक्र’ (मरणोपरांत) https://shauryasaga.com/inspector-dilip-kumar-das-kirti-chakra/ https://shauryasaga.com/inspector-dilip-kumar-das-kirti-chakra/?noamp=mobile#respond Mon, 01 Dec 2025 11:08:23 +0000 https://shauryasaga.com/?p=5992 देश के लिए सर्वोच्च बलिदान देने वाले माँ भारती के सपूत की कहानी: अदम्य साहस और कर्तव्यनिष्ठा का प्रतीक

Inspector Dilip Kumar Das भारत भूमि हमेशा से वीर सपूतों की जन्मस्थली रही है, जिन्होंने अपने प्राणों की बाजी लगाकर राष्ट्र की संप्रभुता और सुरक्षा को सुनिश्चित किया है। इंस्पेक्टर दिलीप कुमार दास ऐसे ही एक असाधारण वीर थे, जिन्होंने आंतरिक सुरक्षा के सबसे चुनौतीपूर्ण मोर्चे पर अदम्य साहस का परिचय दिया और देश के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया। उनकी इस अविस्मरणीय वीरता के लिए उन्हें भारत का दूसरा सबसे बड़ा शांतिकालीन वीरता पुरस्कार ‘कीर्ति चक्र’ (Kirti Chakra) मरणोपरांत प्रदान किया गया।

यह ब्लॉग पोस्ट असम के इस जाँबाज़ अधिकारी की संक्षिप्त जीवनी, उनकी यूनिट, और उस ऐतिहासिक नक्सल विरोधी अभियान का विस्तृत विवरण प्रस्तुत करता है, जिसने उन्हें भारतीय शौर्य गाथा में अमर कर दिया।

Inspector Dilip Kumar Das
Inspector Dilip Kumar Das

संक्षिप्त जीवनी: इंस्पेक्टर दिलीप कुमार दास Inspector Dilip Kumar Das

विवरण जानकारी
नाम इंस्पेक्टर दिलीप कुमार दास
पद इंस्पेक्टर/जीडी (General Duty)
यूनिट 210 कोबरा बटालियन (CoBRA), केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF)
मूल निवास असम (Assam)
शहादत की तिथि 03 अप्रैल 2021
वीरता पुरस्कार कीर्ति चक्र (मरणोपरांत)
पुरस्कार ग्रहणकर्ता उनकी धर्मपत्नी, श्रीमती प्रांजलि दास

इंस्पेक्टर दिलीप कुमार दास का जन्म भारत के पूर्वोत्तर राज्य असम में हुआ था। उनमें बचपन से ही देश सेवा का गहरा जुनून था, जिसने उन्हें दुनिया के सबसे बड़े अर्धसैनिक बलों में से एक, केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF) में शामिल होने के लिए प्रेरित किया। उनकी कार्यक्षमता और नेतृत्व क्षमता को देखते हुए, उन्हें CRPF की एक विशिष्ट और कुलीन इकाई CoBRA (Commando Battalion for Resolute Action) की 210वीं बटालियन में तैनात किया गया। कोबरा बटालियन विशेष रूप से नक्सलवाद और वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित क्षेत्रों में ऑपरेशन चलाने के लिए जानी जाती है, जो कि भारत के सबसे खतरनाक मोर्चों में से एक है। इस बटालियन का हिस्सा होना ही उनकी असाधारण शारीरिक और मानसिक दृढ़ता का प्रमाण था।


शौर्य का वो दिन: बीजापुर का भीषण ऑपरेशन

इंस्पेक्टर दिलीप कुमार दास को कीर्ति चक्र से सम्मानित करने का कारण 3 अप्रैल 2021 को छत्तीसगढ़ के बीजापुर जिले के टेकलागुडेम गांव के पास हुए एक भीषण नक्सल विरोधी ऑपरेशन में उनके द्वारा प्रदर्शित असाधारण बहादुरी, अनुकरणीय नेतृत्व और निस्वार्थ कर्तव्यपरायणता थी।

ऑपरेशन का विवरण:

  1. संयुक्त अभियान की शुरुआत: 03 अप्रैल 2021 को, बीजापुर के घने और दुर्गम जंगलों में बड़े माओवादी कैडरों की उपस्थिति की खुफिया जानकारी मिली। इसके आधार पर CRPF, CoBRA, और छत्तीसगढ़ पुलिस की DRG (District Reserve Guard) सहित सुरक्षा बलों का एक विशाल संयुक्त दल तलाशी और घेराबंदी अभियान पर निकला।

  2. घात और जवाबी हमला: दोपहर के समय, जैसे ही संयुक्त दल एक विशेष क्षेत्र में पहुँचा, माओवादियों के एक बड़े समूह ने सुरक्षा बलों पर घात लगाकर हमला (Ambush) कर दिया। उन्होंने ऊँची चोटियों और प्राकृतिक कवर का फायदा उठाकर भीषण और अंधाधुंध गोलीबारी शुरू कर दी। यह हमला इतना तेज था कि शुरुआती मिनटों में ही कई जवान घायल हो गए।

  3. दिलीप दास का अदम्य साहस: इस प्राणघातक स्थिति में, इंस्पेक्टर दिलीप कुमार दास ने तुरंत स्थिति की गंभीरता को समझा। उन्होंने अपनी व्यक्तिगत सुरक्षा की तनिक भी परवाह किए बिना, सबसे पहले स्वयं को अत्यधिक खतरे में डालकर आगे बढ़े और एक सुरक्षित फायरिंग पोजीशन स्थापित की। उनके इस साहसिक कदम ने उनकी टीम के बाकी सदस्यों को जवाबी कार्रवाई के लिए प्रेरित किया।

  4. सर्वोच्च बलिदान और विजय: दिलीप दास ने न केवल बहादुरी से नक्सलियों की ओर से आ रहे घातक हमले का जवाब दिया, बल्कि एक महत्वपूर्ण कार्य किया—उन्होंने अपने घायल सहयोगियों को सुरक्षित निकालने के लिए एक मज़बूत रक्षात्मक घेरा (Defensive Perimeter) बनाया। वह लगातार गोलीबारी करते रहे, जिससे माओवादियों का ध्यान उन पर केंद्रित रहा और अन्य जवान अपनी पोजिशन सुधार सके। इस भीषण आदान-प्रदान के दौरान, उन्होंने अनेक नक्सलियों को मार गिराया, लेकिन अंततः देश की सेवा में लगी गोलियों से वह गंभीर रूप से घायल हो गए और वीरगति को प्राप्त हुए। उनका यह सर्वोच्च बलिदान सुनिश्चित करने में निर्णायक था कि माओवादी इस ऑपरेशन में अपने मंसूबों में कामयाब न हो सकें और उन्हें पीछे हटने पर मजबूर होना पड़ा।

Inspector Dilip Kumar Das राष्ट्र के गौरव : ‘कीर्ति चक्र’ (मरणोपरांत)

Kirti Chakra
Kirti Chakra KC

इंस्पेक्टर दिलीप कुमार दास की बहादुरी और बलिदान ने भारतीय आंतरिक सुरक्षा के इतिहास में एक अमिट छाप छोड़ी है।वीर को मरणोपरांत कीर्ति चक्र से सम्मानित किया गया, जो उनके सामूहिक शौर्य और निस्वार्थ सेवा का प्रमाण है।

पुरस्कार समारोह में, देश के राष्ट्रपति ने उनकी धर्मपत्नी, श्रीमती प्रांजलि दास, को यह प्रतिष्ठित सम्मान प्रदान किया। यह सम्मान न केवल दिलीप कुमार दास की यादों को अमर करता है, बल्कि पूरे राष्ट्र को यह याद दिलाता है कि हमारे जवान किस दृढ़ता और साहस के साथ हमारी सुरक्षा करते हैं।

इंस्पेक्टर दिलीप कुमार दास का जीवन हमें निस्वार्थता, साहस और कर्तव्य के प्रति पूर्ण समर्पण का पाठ पढ़ाता है। उनकी बहादुरी की कहानी पीढ़ियों तक देशवासियों को प्रेरित करती रहेगी।


 

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Naik Dilwar Khan नाइक दिलवर खान (कीर्ति चक्र) – 28 राष्ट्रीय राइफल्स https://shauryasaga.com/naik-dilwar-khan-kirti-chakra-28-rr-sacrifice/ https://shauryasaga.com/naik-dilwar-khan-kirti-chakra-28-rr-sacrifice/?noamp=mobile#respond Mon, 01 Dec 2025 07:50:20 +0000 https://shauryasaga.com/?p=5983

Naik Dilwar Khan नाइक दिलवर खान (कीर्ति चक्र) – 28 राष्ट्रीय राइफल्स के शौर्य की पराकाष्ठा

परिचय: कर्तव्य, साहस और बलिदान की मिसाल

Naik Dilwar Khan :भारतीय सेना का इतिहास असंख्य वीर गाथाओं से भरा पड़ा है, और इनमें से प्रत्येक कहानी देश के प्रति अटूट निष्ठा और सर्वोच्च बलिदान की भावना को दर्शाती है। आज हम एक ऐसे ही अदम्य साहसी सिपाही, नाइक दिलवर खान को श्रद्धांजलि दे रहे हैं, जिनका नाम शांतिकाल के दूसरे सबसे बड़े वीरता पुरस्कार कीर्ति चक्र से जुड़ा है। नाइक दिलवर खान मूल रूप से भारतीय सेना की तोपखाना रेजीमेंट (Regiment of Artillery) का हिस्सा थे, लेकिन अपने शौर्य और समर्पण के कारण वह प्रतिनियुक्ति पर 28वीं बटालियन राष्ट्रीय राइफल्स (28 RR) की विशिष्ट आतंकवाद-विरोधी इकाई में सेवारत थे। उनका बलिदान, सैन्य पराक्रम और राष्ट्र प्रेम की एक अमर मिसाल है।

Naik Dilwar Khan
Naik Dilwar Khan


ऑपरेशन लोलाब: जब देश पहले आया

यह घटना जम्मू और कश्मीर के कुपवाड़ा जिले में स्थित लोलाब घाटी के घने और दुर्गम जंगलों में हुई थी। यह क्षेत्र अक्सर घुसपैठ करने वाले और स्थानीय आतंकवादियों का ठिकाना माना जाता है। नाइक दिलवर खान अपनी टीम के साथ एक उच्च जोखिम वाले आतंकवाद-विरोधी अभियान पर थे, जिसका उद्देश्य इस क्षेत्र से आतंकवादियों का सफाया करना था।

निर्णायक मुठभेड़ का विवरण

तलाशी और घेराबंदी (Search and Cordon) अभियान के दौरान, टीम पर आतंकवादियों के एक समूह ने घात लगाकर भारी गोलीबारी शुरू कर दी। अचानक हुए इस हमले से टीम गंभीर रूप से खतरे में पड़ गई। Naik Dilwar Khan नाइक दिलवर खान सबसे आगे की पंक्ति में थे और उन्होंने स्थिति की गंभीरता को तुरंत भाँप लिया। उन्होंने देखा कि एक खतरनाक आतंकवादी घने आवरण का फायदा उठाकर उनके साथियों पर लगातार गोलीबारी कर रहा था और टीम की जान को खतरा पहुँचा रहा था।

अपनी जान की परवाह किए बिना, Naik Dilwar Khan नाइक खान ने दुश्मन के फायर की दिशा में चतुराई से आगे बढ़ने का फैसला किया। उन्होंने तीव्र गति से आतंकवादी की स्थिति तक पहुँचने के लिए जोखिम उठाया। जब वह आतंकवादी के पास पहुंचे, तो एक बेहद करीब और व्यक्तिगत मुकाबला शुरू हो गया।

सर्वोच्च बलिदान

स्थिति इतनी विकट थी कि वह विशुद्ध रूप से आमने-सामने की लड़ाई (Hand-to-Hand Combat) में बदल गई। इस भयंकर संघर्ष में, Naik Dilwar Khan नाइक दिलवर खान ने अभूतपूर्व शारीरिक शक्ति और लड़ने की इच्छाशक्ति का प्रदर्शन किया। अपनी चोटों के बावजूद, उन्होंने आतंकवादी पर निर्णायक वार किया और उसे ढेर कर दिया। उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि खतरा समाप्त हो गया है।

हालांकि, आतंकवादी को मार गिराने की इस प्रक्रिया में, नाइक खान को कई गंभीर चोटें आईं। उन्होंने अपने अंतिम क्षणों तक बहादुरी की मिसाल कायम की और अंततः अपनी मातृभूमि की सेवा करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। उनके इस अत्यंत साहसिक कार्य ने न केवल उनके साथियों की जान बचाई, बल्कि पूरे ऑपरेशन को भी सफलता की ओर बढ़ाया।


कीर्ति चक्र: बहादुरी का दूसरा सबसे बड़ा सम्मान

Kirti Chakra
Kirti Chakra KC

Naik Dilwar Khan नाइक दिलवर खान के इस असाधारण शौर्य और सर्वोच्च बलिदान को राष्ट्र ने सम्मान दिया। उन्हें मरणोपरांत कीर्ति चक्र (Kirti Chakra) से सम्मानित किया गया। यह पुरस्कार शांतिकाल के दौरान जमीन, समुद्र या हवा में, युद्ध के मैदान से दूर, प्रदर्शित किए गए “असाधारण शौर्य या विशिष्ट बहादुरी या आत्म-बलिदान” के लिए दिया जाता है।

उनका प्रशस्ति पत्र (Citation) उनके साहस को इन शब्दों में वर्णित करता है: “अत्यधिक प्रतिकूल परिस्थितियों में अद्वितीय बहादुरी, असाधारण नेतृत्व और राष्ट्र के लिए सर्वोच्च बलिदान।” यह सम्मान न केवल नाइक खान की वीरता को दर्शाता है, बल्कि उनकी मूल रेजिमेंट – तोपखाना रेजीमेंट और उनकी सेवारत यूनिट – 28 राष्ट्रीय राइफल्स के उच्च पेशेवर मानकों को भी प्रदर्शित करता है।

राष्ट्रीय राइफल्स

28 Rashtriya Rifles
28 Rashtriya Rifles

नाइक दिलवर खान 28 राष्ट्रीय राइफल्स का एक अभिन्न अंग थे। राष्ट्रीय राइफल्स (RR) भारतीय सेना की सबसे दुर्जेय आतंकवाद-विरोधी इकाई है, जो कश्मीर में उग्रवाद से लड़ती है। इस बल के जवान देश की विभिन्न रेजीमेंटों से प्रतिनियुक्ति पर आते हैं, और ये सबसे खतरनाक अभियानों में निडर होकर हिस्सा लेते हैं। नाइक खान जैसे वीरों का बलिदान राष्ट्रीय राइफल्स की उस अदम्य भावना को दर्शाता है जो किसी भी कीमत पर देश की संप्रभुता और अखंडता की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है।


नाइक दिलवर खान एक सच्चे सिपाही थे, जिन्होंने यह साबित कर दिया कि राष्ट्र की सुरक्षा से बढ़कर कुछ नहीं है। उनका सर्वोच्च बलिदान हमारे देश की रक्षा में लगे हर सैनिक के साहस और समर्पण का प्रतीक है। उनकी कहानी हमें प्रेरणा देती रहेगी और भावी पीढ़ियों को यह याद दिलाती रहेगी कि हमारी आज़ादी और शांति की कीमत इन वीर सपूतों के खून से चुकाई गई है।

हम नाइक दिलवर खान के शौर्य को नमन करते हैं। जय हिन्द!

Naik Dilwar Khan
Naik Dilwar Khan


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Sepoy Pawan Kumar सिपाही पवन कुमार (कीर्ति चक्र): राष्ट्र के लिए एक सर्वोच्च बलिदान https://shauryasaga.com/sepoy-pawan-kumar-kirti-chakra-supreme-sacrifice/ https://shauryasaga.com/sepoy-pawan-kumar-kirti-chakra-supreme-sacrifice/?noamp=mobile#respond Sat, 15 Nov 2025 10:07:33 +0000 https://shauryasaga.com/?p=5926

शहीद सिपाही पवन कुमार (कीर्ति चक्र)

भारत माँ के सपूत, सिपाही पवन कुमार का जीवन वीरता, समर्पण और कर्तव्यनिष्ठा का एक ऐसा ज्वलंत उदाहरण है, जो पीढ़ियों तक प्रेरणा देता रहेगा। हिमाचल प्रदेश के शिमला जिले की शांत रामपुर तहसील से ताल्लुक रखने वाले पवन कुमार का जन्म वर्ष 1997 में हुआ था। उनके पिता श्री शिशु पाल और माता श्रीमती भजून दासी ने शायद ही सोचा होगा कि उनका यह बालक आगे चलकर राष्ट्र के इतिहास में अपना नाम स्वर्ण अक्षरों में दर्ज कराएगा।

सिपाही पवन कुमार
सिपाही पवन कुमार

पवन कुमार ने अपनी स्कूल की शिक्षा पूरी करने के तुरंत बाद भारतीय सेना में शामिल होने का संकल्प लिया। यह केवल एक नौकरी नहीं थी, बल्कि देश की सेवा करने का एक अटूट जुनून था। वह भारतीय सेना की प्रतिष्ठित इन्फैंट्री रेजिमेंट, ग्रेनेडियर्स रेजिमेंट की 16 ग्रेनेडियर्स बटालियन में भर्ती हुए।

यह रेजिमेंट अपने साहसी जवानों और युद्ध सम्मानों की समृद्ध विरासत के लिए प्रसिद्ध है। अपनी सेवा के दौरान, पवन कुमार ने खुद को एक समर्पित, अनुशासित और पेशेवर रूप से सक्षम सैनिक के रूप में ढाला। सेना में कुछ समय तक अपनी मूल इकाई में सेवा देने के बाद, उन्हें जम्मू और कश्मीर में प्रति-आतंकवाद अभियानों के लिए तैनात 55 राष्ट्रीय राइफल्स (RR) बटालियन में प्रतिनियुक्त किया गया। यह वह क्षेत्र था जहाँ उन्हें अपनी असाधारण वीरता प्रदर्शित करने का अवसर मिला।

पद्गमपोरा ऑपरेशन (28 फरवरी 2023)

फरवरी 2023 में, सिपाही पवन कुमार की 55 RR यूनिट पुलवामा जिले में तैनात थी, जिसका कार्यक्षेत्र सक्रिय आतंकवाद से प्रभावित था। यूनिट नियमित रूप से प्रति-आतंकवाद अभियानों में लगी हुई थी। 28 फरवरी 2023 को, खुफिया स्रोतों से मिली जानकारी के आधार पर एक महत्वपूर्ण ऑपरेशन की योजना बनाई गई। यह सूचना मिली थी कि दो आतंकवादी पुलवामा जिले के अवंतीपोरा क्षेत्र के पद्गमपोरा गाँव में छिपे हुए हैं। इन आतंकवादियों को बेअसर करने के लिए, 55 RR ने CRPF और J&K पुलिस के तत्वों के साथ मिलकर एक संयुक्त अभियान शुरू किया।

सिपाही पवन कुमार उस अग्रिम टीम का हिस्सा थे, जिसने योजना के अनुसार संदिग्ध क्षेत्र की घेराबंदी की और तलाशी अभियान शुरू किया। यह ऑपरेशन अत्यंत चुनौतीपूर्ण था क्योंकि आतंकवादी पद्गमपोरा गाँव की एक मस्जिद में छिपे हुए थे। धार्मिक स्थल की संवेदनशीलता को देखते हुए, सुरक्षा बलों ने अत्यधिक सावधानी बरतने और सीमित गोलाबारी का उपयोग करने का निर्णय लिया ताकि किसी भी प्रकार की नागरिक क्षति (Collateral Damage) को रोका जा सके। सबसे पहले, सुरक्षा बलों ने नागरिकों को क्रॉसफायर में फंसने से बचाने के लिए उन्हें सुरक्षित बाहर निकाला।

पराक्रम : हाथों-हाथ मुकाबला

सिपाही पवन कुमार
सिपाही पवन कुमार

तलाशी अभियान चल रहा था, और सिपाही पवन कुमार अपनी पार्टी के नेतृत्व में आगे बढ़ रहे थे। इसी दौरान, उनका सामना छिपकर बैठे एक आतंकवादी से हुआ। यह एक जीवन-मरण का क्षण था। सिपाही पवन कुमार ने बिना किसी संकोच या भय के, अविश्वसनीय बहादुरी का प्रदर्शन किया। उन्होंने आतंकवादी को नियंत्रित करने के लिए तुरंत उस पर झपट्टा मारा। गोलाबारी के जोखिम को दरकिनार करते हुए, पवन कुमार ने आतंकवादी को हाथों-हाथ मुकाबले (Hand-to-Hand Combat) में पछाड़ दिया और उसे मार गिराया।

यह वीरता का एक ऐसा दुर्लभ कार्य था जिसने न केवल उनके साथियों की जान बचाई बल्कि ऑपरेशन को भी महत्वपूर्ण सफलता दिलाई। हालाँकि, इस असाधारण संघर्ष के दौरान, सिपाही पवन कुमार को आतंकवादी की गोलीबारी का शिकार होना पड़ा। उन्हें कई गोलियां लगीं और वे गंभीर रूप से घायल हो गए। इस बीच, दूसरा आतंकवादी पास की एक इमारत में भाग गया और एक बाथरूम में छिप गया, जिसे बाद में बाकी सैनिकों ने चतुराई से बेअसर कर दिया।

अमर शहादत 

ऑपरेशन सफलतापूर्वक संपन्न हुआ और मारे गए आतंकवादियों से बड़ी संख्या में हथियार और गोला-बारूद बरामद किया गया। यह सफलता सिपाही पवन कुमार के अदम्य साहस और बलिदान के कारण ही संभव हो पाई थी। दुर्भाग्य से, अपने गंभीर घावों के कारण, वीर सिपाही पवन कुमार वीर गति को प्राप्त हुए मात्र 26 वर्ष की अल्पायु में कर्तव्य की बलिवेदी पर शहीद हो गए।

कीर्ति चक्र

कीर्ति चक्र
कीर्ति चक्र KC

सिपाही पवन कुमार की असाधारण वीरता, कर्तव्य के प्रति अटूट समर्पण और राष्ट्र के लिए किए गए सर्वोच्च बलिदान को मान्यता देते हुए, उन्हें देश के दूसरे सर्वोच्च शांतिकालीन वीरता पुरस्कार “कीर्ति चक्र” से सम्मानित किया गया।

वह अपने पीछे अपने गौरवान्वित माता-पिता, श्री शिशु पाल और श्रीमती भजून दासी को छोड़ गए हैं। सिपाही पवन कुमार की कहानी न केवल उनके परिवार के लिए, बल्कि पूरे राष्ट्र के लिए गर्व का विषय है। उनका बलिदान हमें प्रेरणा देता रहेगा कि देश की सुरक्षा हर कीमत पर सर्वोपरि है।


जय हिन्द !

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Captain Lalrinawma Sailo कैप्टन लालरिनावमा सैलो: मिजोरम से वीरता की मशाल https://shauryasaga.com/captain-lalrinawma-sailo-mizoram-first-kirti-chakr/ https://shauryasaga.com/captain-lalrinawma-sailo-mizoram-first-kirti-chakr/?noamp=mobile#respond Fri, 14 Nov 2025 11:08:26 +0000 https://shauryasaga.com/?p=5922 कैप्टन लालरिनावमा सैलो: मिजोरम से वीरता की मशाल

भारत के सैन्य पराक्रम के इतिहास में कुछ नाम ऐसे चमकते हैं, जिनमें कैप्टन लालरिनावमा सैलो का नाम सबसे ऊपर है। भारतीय सेना की कुलीन 4 पैरा (स्पेशल फोर्सेस) यूनिट के इस अधिकारी ने न केवल असाधारण साहस का परिचय दिया है, बल्कि इतिहास में अपना नाम दर्ज कराया है मिजोरम का पहला कमीशंड अधिकारी बनकर, जिसे कीर्ति चक्र—शांतिकालीन दूसरा सबसे बड़ा वीरता पुरस्कार—प्राप्त हुआ। यह सम्मान 15 अगस्त 2025 को राष्ट्रपति द्रौपदी मुरमू द्वारा घोषित किया गया, जो जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद-विरोधी अभियानों में उनके निस्वार्थ बलिदान को सलाम है।

कैप्टन लालरिनावमा सैलो
कैप्टन लालरिनावमा सैलो

प्रारंभिक जीवन और गौरव का सफर

मिजोरम के चानमारी, आइजावल की शांत पहाड़ियों में जन्मे कैप्टन सैलो का सफर अनुशासन, दृढ़ता और समर्पण की मिसाल है। उन्होंने अपनी औपचारिक शिक्षा राष्ट्रीय भारतीय सैन्य कॉलेज (RIMC), देहरादून से शुरू की, जहाँ उनकी बुद्धिमत्ता और नेतृत्व क्षमता ने सभी को प्रभावित किया। इसके बाद राष्ट्रीय रक्षा अकादमी (NDA) में उन्होंने अपने बैच में 27वाँ स्थान हासिल किया—शैक्षणिक और शारीरिक उत्कृष्टता का प्रमाण। भारतीय सैन्य अकादमी (IMA), देहरादून से लेफ्टिनेंट के रूप में कमीशन प्राप्त करने के बाद, उन्होंने तेजी से पदोन्नति पाई।

4 पैरा (SF) में चयन कोई संयोग नहीं था। यह भारत की सबसे कठिन और गोपनीय रेजिमेंट है, जो सहनशक्ति, रणनीति और नैतिक दृढ़ता की माँग करती है। कैप्टन सैलो ने इस अग्निपरीक्षा में खुद को साबित किया और उन मिशनों के लिए तैयार हुए जहाँ साहस और सटीकता का मेल जीवन-मृत्यु तय करता है। एक मिजो होने के नाते, उनका यह उपलब्धि पूर्वोत्तर भारत के युवाओं के लिए प्रेरणा बन गई है।

ऑपरेशन सिंदूर: संक्षिप्त सारांश

22 अप्रैल 2025 को पहलगाम आतंकी हमला – 26 पर्यटक शहीद (ज्यादातर पुरुष), TRF (LeT/JeM का मोर्चा) ज़िम्मेदार।

ऑपरेशन
7 मई 2025 रात, ऑपरेशन सिंदूर – भारत की ट्राई-सर्विसेज स्ट्राइक
9 आतंकी ठिकाने निशाना: 5 PoK, 4 पंजाब (मुरीदके, बहावलपुर आदि)
24 मिसाइलें: SCALP, HAMMER, लोइटरिंग म्यूनिशन
25 मिनट, भारतीय सीमा से, बिना एयरस्पेस उल्लंघन

परिणाम
100+ आतंकी मारे, हाफिज सईद का रिश्तेदार, यूसुफ अजहर सहित HVTs
पाकिस्तानी सेना: 35-40 हताहत
भारत: 5 जवान शहीद 

संदेश
“हर आंसू का जवाब शक्ति से” – आतंकवाद के खिलाफ निर्णायक, संयमित, सटीक प्रहार

नाम का अर्थ: उजड़े सिंदूर का बदला।

जय हिंद!

वीरता का कार्य: ऑपरेशन सिंदूर और उससे आगे

हालांकि स्पेशल फोर्सेस के मिशनों की आधिकारिक जानकारी गोपनीय रहती है, लेकिन रिपोर्ट्स के अनुसार कैप्टन सैलो का कीर्ति चक्र ऑपरेशन सिंदूर से जुड़ा है—जम्मू-कश्मीर में आतंकवादी नेटवर्क के खिलाफ समन्वित अभियान। इन खतरनाक मुठभेड़ों में उन्होंने:

– घात लगाकर हमला करने वाले दुश्मनों का नेतृत्व किया,
– लगातार गोलियों के बीच खतरों को निष्क्रिय किया,
– अपने साथियों की सुरक्षा सुनिश्चित की।

उनका कार्य स्पेशल फोर्सेस के मूल मंत्र को साकार करता है—मौन, तीव्र और अत्यंत प्रभावी

2025 में कीर्ति चक्र केवल चार सेना कर्मियों को मिला, जिसमें कर्नल मनप्रीत सिंह और राइफलमैन रवि कुमार जैसे वीर शामिल हैं। कैप्टन सैलो के पिता सैह्मिंगलियाना सैलो ने गर्व से कहा कि उनका बेटा अभी भी जम्मू की सुरक्षा व्यवस्था में अग्रिम पंक्ति में है—पुरस्कार से परे कर्तव्य की जीवंत मिसाल।

मिजोरम और राष्ट्र के लिए मील का पत्थर

कैप्टन लालरिनावमा सैलो
कैप्टन लालरिनावमा सैलो

मिजोरम के लिए यह उपलब्धि ऐतिहासिक है। कैप्टन सैलो असम राइफल्स के सूबेदार चल्हनुना के बाद राज्य के दूसरे प्राप्तकर्ता हैं, लेकिन कमीशंड अधिकारी के रूप में पहले। मुख्यमंत्री लालदुहोमा ने उन्हें “मिजो युवाओं के लिए प्रेरणा” बताया, जबकि राज्य सरकार ने ₹10 लाख का नकद पुरस्कार घोषित किया। राज्यपाल और पूर्व सेना प्रमुख जनरल विजय कुमार सिंह समेत कई नेताओं ने बधाई दी, जो भारत की विविधता में एकता की भावना को मजबूत करती है।

यह कहानी उन सैनिकों को सलाम है जो पहाड़ों और मन के कठिन मैदानों में चुपचाप देश की रक्षा करते हैं।

कैप्टन लालरिनावमा सैलो का सफर—आइजावल के हरे-भरे खेतों से पैरा SF के खतरनाक मिशनों तक—देशभक्ति की ज्वाला जलाता है और हर युवा को सेवा को पवित्र कर्तव्य मानने की प्रेरणा देता है।

शौर्य की यह भावना सदैव जीवित रहे।

जय हिंद!

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Sudeep Sarkar शहीद सुदीप सरकार: कीर्ति चक्र विजेता – एक अमर वीर की गाथा https://shauryasaga.com/sudeep-sarkar-kirti-chakra-legend/ https://shauryasaga.com/sudeep-sarkar-kirti-chakra-legend/?noamp=mobile#respond Mon, 10 Nov 2025 08:55:39 +0000 https://shauryasaga.com/?p=5900 शहीद सुदीप सरकार: कीर्ति चक्र विजेता – एक अमर वीर की गाथा

भारत माता के सपूतों की कहानियां हमें न केवल गर्व से भर देती हैं, बल्कि राष्ट्रभक्ति की भावना को भी जीवंत कर देती हैं। आज हम बात करेंगे एक ऐसे बहादुर जवान की, जिन्होंने अपनी जान की बाजी लगाकर देश की सीमाओं की रक्षा की। शहीद सुदीप सरकार, जो सीमा सुरक्षा बल (BSF) के आरक्षी थे, को मरणोपरांत कीर्ति चक्र से सम्मानित किया गया। यह सम्मान उनकी असाधारण वीरता, कर्तव्यनिष्ठा और सर्वोच्च बलिदान का प्रतीक है।

सुदीप सरकार
सुदीप सरकार

सेवा और पद: सीमा का सजग प्रहरी

सुदीप सरकार ने अपने जीवन का एक बड़ा हिस्सा राष्ट्र की सेवा में समर्पित कर दिया। वे सीमा सुरक्षा बल (BSF) के एक समर्पित सदस्य थे, जो भारत की अंतरराष्ट्रीय सीमाओं की रक्षा करने वाली प्रमुख अर्धसैनिक बल है। BSF को “भारत की पहली रक्षा पंक्ति” कहा जाता है, और सुदीप जी इसी पंक्ति के मजबूत स्तंभ थे।

मुख्य विवरण:
पद: आरक्षी (Constable) / जीडी (General Duty)
बल: सीमा सुरक्षा बल (BSF – Border Security Force)
बटालियन: 169 बटालियन, बीएसएफ

सुदीप सरकार की तैनाती कश्मीर की नियंत्रण रेखा (LoC) पर थी, जो विश्व की सबसे चुनौतीपूर्ण सीमाओं में से एक है। यहां घुसपैठ, आतंकवाद और प्रतिकूल मौसम जैसी चुनौतियां रोजाना का हिस्सा होती हैं। फिर भी, उन्होंने कभी हार नहीं मानी और हमेशा ड्यूटी को प्राथमिकता दी। उनकी बटालियन, 169वीं BSF, LoC पर घुसपैठ रोधी अभियानों में सक्रिय रूप से शामिल रहती थी। सुदीप सरकार जैसे जवान दिन-रात गश्त करते हुए देश की संप्रभुता की ढाल बनते थे।

वीरगति और शौर्य की घटना: 7-8 नवंबर 2020 की रात

शौर्य की कहानियां अक्सर उन पलों से जन्म लेती हैं जब मौत सामने खड़ी हो और इंसान डटकर मुकाबला करे। सुदीप सरकार की वीरता इसी तरह की एक मिसाल है। यह घटना 7-8 नवंबर 2020 की रात की है, जब कश्मीर की नियंत्रण रेखा पर तनाव चरम पर था।

स्थान और मिशन:
स्थान: कश्मीर में नियंत्रण रेखा (LoC) पर घुसपैठ रोधी बाधा प्रणाली (AIOS – Anti-Infiltration Obstacle System) के पास।
मिशन: सुदीप जी एक गश्ती और घात (Patrolling and Ambush) दल के साथ तैनात थे। वे दल का मार्गदर्शन कर रहे थे, जो घुसपैठियों को रोकने के लिए रणनीतिक रूप से तैयार किया गया था। AIOS एक उन्नत प्रणाली है जो सीमा पर बाड़, सेंसर और निगरानी उपकरणों से लैस होती है, लेकिन असली सुरक्षा तो जवानों की सतर्कता पर निर्भर करती है।

शौर्य: कदम-कदम पर वीरता

रात के अंधेरे में, जब ठंडी हवाएं और खतरे का साया चारों ओर था, सुदीप सरकार ने सशस्त्र घुसपैठियों को AIOS की ओर बढ़ते हुए देखा। ये आतंकवादी पाकिस्तान समर्थित थे और सीमा पार करके भारत में घुसने की फिराक में थे।

1. चुनौती और गोलीबारी: सुदीप जी ने तुरंत घुसपैठियों को ललकारा और चुनौती दी। जवाब में आतंकवादियों ने एक ऊंचे स्थान से सुरक्षा आड़ लेकर उन पर भारी गोलीबारी शुरू कर दी। गोलीबारी इतनी तीव्र थी कि कोई भी सामान्य व्यक्ति पीछे हट जाता।

2. निडर मुकाबला: लेकिन सुदीप सरकार सुरक्षा आड़ (कवर) के बिना भी डटे रहे। उन्होंने दृढ़ संकल्प के साथ जवाबी फायरिंग की। उनकी सटीक गोलीबारी से एक आतंकवादी को मौके पर मार गिराया। यह कार्रवाई न केवल दल को बचाने वाली थी, बल्कि घुसपैठ के बड़े प्रयास को नाकाम करने वाली साबित हुई।

3. सर्वोच्च बलिदान: इस भीषण मुकाबले में सुदीप सरकार को गोली लगी और वे वीरगति को प्राप्त हो गए। उनकी मौत ने दल को प्रेरित किया, और शेष जवान घुसपैठियों को खदेड़ने में सफल रहे। सुदीप जी का बलिदान व्यर्थ नहीं गया – यह राष्ट्र की रक्षा का प्रतीक बन गया।

यह घटना BSF की आधिकारिक रिपोर्ट्स और सम्मान समारोहों में वर्णित है, जो उनकी वीरता की पुष्टि करती है। ऐसे पल हमें याद दिलाते हैं कि सीमा पर हर रात हजारों जवान इसी तरह की जोखिम उठाते हैं।

सम्मान: कीर्ति चक्र (मरणोपरांत)

कीर्ति चक्र
कीर्ति चक्र KC

सुदीप सरकार की वीरता को देखते हुए, भारत सरकार ने उन्हें कीर्ति चक्र से मरणोपरांत सम्मानित किया। यह सम्मान 2023 में घोषित किया गया और औपचारिक रूप से प्रदान किया गया।

सम्मान के मुख्य बिंदु:
पुरस्कार: कीर्ति चक्र (मरणोपरांत)
कारण: “बीएसएफ की श्रेष्ठतम परंपरा के अनुसार, उन्होंने अपनी जान की परवाह न करते हुए कर्तव्यनिष्ठा का उदाहरण प्रस्तुत किया और राष्ट्र की संप्रभुता की रक्षा में सर्वोच्च बलिदान दिया।” उनकी कार्रवाई ने न केवल एक आतंकवादी को मार गिराया, बल्कि पूरे अभियान को सफल बनाया।
पुरस्कार ग्रहणकर्ता: उनकी धर्मपत्नी, श्रीमती रूमपा सरकार, ने यह सम्मान राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से ग्रहण किया। यह पल परिवार के लिए गर्व का था, लेकिन दुख की याद भी ताजा कर गया।

कीर्ति चक्र प्राप्त करने वाले सुदीप सरकार BSF के उन चुनिंदा जवानों में शामिल हो गए जिन्होंने शांति काल में भी युद्ध जैसी वीरता दिखाई।

कीर्ति चक्र: भारत का दूसरा सर्वोच्च शांति-काल वीरता पुरस्कार

अमर शहीद की प्रेरणा

सुदीप सरकार
सुदीप सरकार

शहीद सुदीप सरकार की कहानी एक साधारण जवान की असाधारण यात्रा है – घर से सीमा तक, और जीवन से अमरता तक। उन्होंने साबित किया कि वीरता पद या हथियारों में नहीं, बल्कि दिल की दृढ़ता में होती है। उनकी पत्नी श्रीमती रूमपा सरकार और परिवार आज भी उनके बलिदान पर गर्व करते हैं।

आइए, हम सभी उनके प्रति श्रद्धासुमन अर्पित करें और संकल्प लें कि उनके जैसे वीरों की कुर्बानी व्यर्थ नहीं जाएगी।

जय हिंद! जय BSF!

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Rifleman Ravi Kumar राइफलमैन रवि कुमार कीर्ति चक्र (मरणोपरांत): भारतीय सेना के वीर सपूत https://shauryasaga.com/%e0%a4%b0%e0%a4%b5%e0%a4%bf-%e0%a4%95%e0%a5%81%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%b0-rifleman-ravi-kumar-kirti-chakra/ https://shauryasaga.com/%e0%a4%b0%e0%a4%b5%e0%a4%bf-%e0%a4%95%e0%a5%81%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%b0-rifleman-ravi-kumar-kirti-chakra/?noamp=mobile#respond Sat, 08 Nov 2025 09:40:16 +0000 https://shauryasaga.com/?p=5887 राइफलमैन रवि कुमार कीर्ति चक्र (मरणोपरांत): भारतीय सेना के वीर सपूत

राइफलमैन रवि कुमार भारतीय सेना के एक ऐसे बहादुर सिपाही थे, जिन्होंने अपनी जान की बाजी लगाकर राष्ट्र की रक्षा की और आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में अमर बलिदान दिया। वे जम्मू-कश्मीर लाइट इन्फैंट्री (63 राष्ट्रीय राइफल्स) में तैनात थे। उनकी वीरता और निस्वार्थ सेवा के लिए उन्हें भारत के शांतिकालीन सर्वोच्च वीरता पुरस्कारों में से दूसरे स्थान पर आने वाले कीर्ति चक्र से मरणोपरांत सम्मानित किया गया। यह पुरस्कार 2024 में स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर घोषित किया गया, जो उनकी 12 सितंबर 2023 को राजौरी जिले के नरला क्षेत्र में हुई एक काउंटर-टेरर ऑपरेशन के दौरान दी गई शहादत को समर्पित है।

राइफलमैन रवि कुमार का जीवन भारतीय सेना की उस परंपरा का प्रतीक है, जहां सिपाही न केवल अपनी ड्यूटी निभाते हैं, बल्कि अपने साथियों की सुरक्षा और राष्ट्र की एकता के लिए अंतिम सांस तक लड़ते हैं।

प्रारंभिक जीवन और सेना में प्रवेश

राइफलमैन रवि कुमार कीर्ति चक्र
राइफलमैन रवि कुमार कीर्ति चक्र

राइफलमैन रवि कुमार का जन्म जम्मू-कश्मीर के एक सामान्य परिवार में हुआ था। वे बचपन से ही देशभक्ति की भावना से ओतप्रोत थे। स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद, उन्होंने भारतीय सेना में शामिल होने का फैसला किया। जम्मू-कश्मीर राइफल्स रेजिमेंट में भर्ती होकर वे जल्द ही एक कुशल सिपाही के रूप में उभरे। उनकी इकाई, 63 राष्ट्रीय राइफल्स (बिहार रेजिमेंट से संबद्ध), जम्मू-कश्मीर के संवेदनशील क्षेत्रों में आतंकवाद विरोधी अभियानों के लिए जानी जाती है।

सेना में शामिल होने से पहले, रवि कुमार एक सामान्य युवा थे, जो अपने परिवार और गांव की जिम्मेदारियों को निभाते थे। लेकिन सेना की वर्दी पहनते ही वे राष्ट्रसेवा के प्रति समर्पित हो गए।

12 सितंबर 2023 का काउंटर-टेरर ऑपरेशन

राइफलमैन रवि कुमार कीर्ति चक्र
राइफलमैन रवि कुमार कीर्ति चक्र

राइफलमैन रवि कुमार की शहादत 12 सितंबर 2023 को जम्मू-कश्मीर के राजौरी जिले के घने जंगलों में स्थित नरला क्षेत्र में एक काउंटर-टेरर ऑपरेशन के दौरान सामने आया। इस ऑपरेशन की जानकारी इंटेलिजेंस एजेंसियों से प्राप्त हुई थी, जिसमें दो भारी हथियारों से लैस आतंकवादियों की मौजूदगी का संकेत मिला था। राइफलमैन रवि कुमार अपनी इकाई के साथ ट्रैकिंग पर थे, जब लगभग दोपहर 3:30 बजे उन्होंने करीब से दो आतंकवादियों को देखा, जो गोलीबारी के लिए तैयार थे।

इस क्रिटिकल मोमेंट पर राइफलमैन रवि कुमार ने जो किया, वह वीरता का अनुपम उदाहरण है:
– साथी की सुरक्षा: उन्होंने तुरंत अपने साथी को धक्का देकर सुरक्षित स्थान पर पहुंचाया, ताकि वह आतंकियों की गोली का शिकार न बने।
– आत्म-बलिदान: खुद कवर की तलाश में डुबकी लगाई, लेकिन शुरुआती गोलीबारी में वे घायल हो गए।
– अटूट संघर्ष: गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद, उन्होंने हार नहीं मानी। उन्होंने एक आतंकी को घायल किया और दूसरे को पूरी तरह neutralize (मार गिराया)।
– टीम को निर्देशन: अपनी अंतिम सांसों तक, उन्होंने अपनी टीम को दुश्मन के भागने के रास्तों को काटने के लिए रणनीतिक निर्देश दिए।

इस संघर्ष के दौरान राइफलमैन रवि कुमार बेहोश हो गए और इवैक्यूएशन के दौरान शहीद हो गए। उनकी इस कार्रवाई से न केवल दो आतंकी मारे गए, बल्कि पूरी इकाई का मनोबल बढ़ा और ऑपरेशन सफल रहा। उनके बलिदान ने साबित किया कि एक सिपाही का कर्तव्य केवल खुद की रक्षा नहीं, बल्कि राष्ट्र और साथियों की हो।

यह घटना राजौरी क्षेत्र में चल रहे आतंकवाद विरोधी अभियानों का हिस्सा थी, जहां भारतीय सेना लगातार घुसपैठियों और स्थानीय आतंकियों से निपट रही है। रवि कुमार की वीरता ने न केवल दुश्मन को करारा जवाब दिया, बल्कि पूरे क्षेत्र में शांति स्थापना में योगदान दिया।

कीर्ति चक्र (मरणोपरांत)

कीर्ति चक्र
कीर्ति चक्र KC

राइफलमैन रवि कुमार को उनकी असाधारण वीरता के लिए कीर्ति चक्र से सम्मानित किया गया, जो शांतिकाल में दूसरा सबसे बड़ा वीरता पुरस्कार है (पहला अशोक चक्र)। यह पुरस्कार 2024 के स्वतंत्रता दिवस पर घोषित किया गया

कीर्ति चक्र कीर्ति चक्र अधिनियम, 1960 के तहत प्रदान किया जाता है और यह उन सैनिकों को दिया जाता है जो युद्ध न होने पर भी असाधारण साहस दिखाते हैं। राइफलमैन रवि कुमार का यह सम्मान उनकी शहादत का प्रमाण है, जो सेना के उच्चतम आदर्शों को प्रतिबिंबित करता है।

निजी जीवन और परिवार

राइफलमैन रवि कुमार कीर्ति चक्र
राइफलमैन रवि कुमार कीर्ति चक्र

राइफलमैन रवि कुमार एक पारिवारिक व्यक्ति थे। वे अपनी पत्नी और बेटी के प्रति बेहद समर्पित थे। उनकी शहादत के बाद, परिवार ने गर्व के साथ उनका सम्मान किया। सेना ने परिवार को सभी सुविधाएं प्रदान कीं, जिसमें पेंशन, आवास और चिकित्सा सहायता शामिल है।

उनके साथी और अधिकारी उन्हें एक “सच्चा योद्धा” के रूप में याद करते हैं, जो हमेशा जोखिम भरे मिशनों में आगे रहते थे।

विरासत

राइफलमैन रवि कुमार की शहादत भारतीय सेना की उस भावना को मजबूत करती है, जो कहती है: “जय हिंद, जय भारत।” उनकी कहानी न केवल सैनिकों के लिए, बल्कि पूरे राष्ट्र के लिए प्रेरणा स्रोत है।

राइफलमैन रवि कुमार का बलिदान हमें सिखाता है कि सच्ची वीरता तब होती है, जब कोई अपनी जान देकर दूसरों को बचाता है। वे अमर हैं, और उनकी यादें भारतीय सेना के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में अंकित हैं।

जय हिंद!

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Colonel Manpreet Singh Kirti Chakra कर्नल मनप्रीत सिंह कीर्ति चक्र (मरणोपरांत): भारतीय सेना के एक वीर नायक की अमर गाथा https://shauryasaga.com/colonel-manpreet-singh-kirti-chakra-%e0%a4%ae%e0%a4%a8%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%80%e0%a4%a4-%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%82%e0%a4%b9/ https://shauryasaga.com/colonel-manpreet-singh-kirti-chakra-%e0%a4%ae%e0%a4%a8%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%80%e0%a4%a4-%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%82%e0%a4%b9/?noamp=mobile#respond Sat, 08 Nov 2025 07:36:04 +0000 https://shauryasaga.com/?p=5883 कर्नल मनप्रीत सिंह कीर्ति चक्र (मरणोपरांत)

भारतीय सेना के उन अनगिनत शूरवीरों में से एक नाम है कर्नल मनप्रीत सिंह का, जिन्होंने अपनी जान की बाजी लगाकर राष्ट्र की रक्षा की। जम्मू-कश्मीर के अनंतनाग जिले में 13 सितंबर 2023 को आतंकवादियों के साथ मुठभेड़ में शहीद होने वाले कर्नल मनप्रीत सिंह की कहानी साहस, त्याग और देशभक्ति की जीवंत मिसाल है।

प्रारंभिक जीवन: एक सैन्य परिवार की परंपरा

कर्नल मनप्रीत सिंह कीर्ति चक्र
कर्नल मनप्रीत सिंह कीर्ति चक्र (मरणोपरांत)

कर्नल मनप्रीत सिंह का जन्म 1982 में पंजाब के अमृतसर में हुआ था। वे भरोन्जियां गांव के निवासी थे, जो मोहाली जिले के मुल्लांपुर के निकट स्थित है। उनके परिवार में सैन्य परंपरा गहरी जड़ें रखती थी। उनके पिता, स्वर्गीय नायक लाखमीर सिंह, भारतीय सेना में सेवा दे चुके थे। दादा शीतल सिंह और चाचा रंजीत सिंह भी सेना में रहे। यह पारिवारिक पृष्ठभूमि ही थी जिसने मनप्रीत को बचपन से ही अनुशासन, कर्तव्यनिष्ठा और देशप्रेम की सीख दी।

स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद, मनप्रीत ने भारतीय सेना में अधिकारी बनने का संकल्प लिया। 2006 में वे सिख लाइट इन्फैंट्री रेजिमेंट के 12वीं बटालियन में कमीशन हुए। मात्र 24 वर्ष की आयु में सेना में प्रवेश करने वाले मनप्रीत ने जल्द ही अपनी क्षमताओं से सबको प्रभावित किया। वे न केवल शारीरिक रूप से मजबूत थे, बल्कि रणनीतिक सोच और नेतृत्व के गुणों से भी सम्पन्न थे। उनके सहयोगियों के अनुसार, मनप्रीत हमेशा “लीड फ्रॉम द फ्रंट” के सिद्धांत पर चलते थे, यानी हमेशा आगे रहकर नेतृत्व करना।

सैन्य करियर: सम्मानों और चुनौतियों से भरा सफर

कर्नल मनप्रीत सिंह कीर्ति चक्र
कर्नल मनप्रीत सिंह कीर्ति चक्र (मरणोपरांत)

कर्नल मनप्रीत सिंह का सैन्य जीवन लगभग 17 वर्षों का रहा, जिसमें उन्होंने कई महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाईं। कमीशन के बाद वे राष्ट्रीय राइफल्स (राष्ट्रीय राइफल्स) की 19वीं बटालियन में डेपुटेड हुए, जो जम्मू-कश्मीर में काउंटर-इंसर्जेंसी ऑपरेशंस के लिए तैनात रहती है। 2019 से 2021 तक वे इस बटालियन के सेकंड-इन-कमांड (2IC) रहे, और बाद में कमांडिंग ऑफिसर (CO) बने।

इस दौरान उन्होंने दक्षिणी अनंतनाग, कोकरनाग, वेरिनाग-अचाबल और ऊंचाई वाले क्षेत्रों में आतंकवादियों के खिलाफ कई सफल अभियान चलाए। इन क्षेत्रों में विदेशी आतंकवादी सक्रिय रहते हैं, और चुनौतियां अत्यंत कठिन होती हैं—घने जंगल, ऊबड़-खाबड़ इलाके और लगातार घात लगाने का खतरा। मनप्रीत की रणनीतिक कुशलता और साहस ने उन्हें 2021 में सेना मेडल (गैलेंट्री) से सम्मानित कराया। यह पुरस्कार उनके एक अभियान के दौरान दिखाए गए असाधारण साहस के लिए दिया गया था।

2021 में प्रमोशन के बाद उन्हें शांतिपूर्ण पोस्टिंग का विकल्प दिया गया, लेकिन उन्होंने तुरंत “नो सर” कहकर इनकार कर दिया। वे जानते थे कि उनकी बटालियन को उनकी जरूरत है। इस निर्णय ने उनकी देशभक्ति की गहराई को दर्शाया।

मुख्य उपलब्धियां विवरण
कमीशन वर्ष 2006, सिख लाइट इन्फैंट्री (12वीं बटालियन)
मुख्य पोस्टिंग 19वीं राष्ट्रीय राइफल्स, जम्मू-कश्मीर
पहला सम्मान सेना मेडल (गैलेंट्री), 2021
अनुभव 5 वर्षों में कई सफल ऑपरेशन, आतंकवाद विरोधी अभियान
नेतृत्व भूमिका 2019-2021: सेकंड-इन-कमांड; बाद में कमांडिंग ऑफिसर

शहादत की गाथा: अनंतनाग में अमर बलिदान

कर्नल मनप्रीत सिंह
कर्नल मनप्रीत सिंह

 

 

13 सितंबर 2023 को अनंतनाग जिले के गडोल (कोकरनाग क्षेत्र) में एक संयुक्त अभियान के दौरान कर्नल मनप्रीत सिंह की शहादत हुई। खुफिया जानकारी के आधार पर सेना और जम्मू-कश्मीर पुलिस की संयुक्त टीम ने घने जंगलों में छिपे आतंकवादियों की तलाश शुरू की। कर्नल मनप्रीत अपनी 19वीं राष्ट्रीय राइफल्स बटालियन का नेतृत्व कर रहे थे।

जैसे ही टीम एक इमारत के ऊपर चढ़ी, छिपे हुए आतंकवादियों ने अंधाधुंध गोलीबारी शुरू कर दी। कर्नल मनप्रीत ने तुरंत जवाबी कार्रवाई की और एक आतंकवादी को मार गिराया। बावजूद इसके कि वे जानते थे कि बाकी आतंकवादी भागने की कोशिश कर रहे हैं, उन्होंने अपनी टीम को फौरन पुनर्गठित किया। उन्होंने सभी संभावित भागने के रास्तों को ब्लॉक करने के निर्देश दिए और खुद आगे रहकर गोलीबारी का नेतृत्व किया।

इस दौरान उन्हें माथे पर गंभीर गोली लगी। बावजूद घाव के, उन्होंने अंतिम क्षण तक अपनी टीम को निर्देशित किया। दुर्भाग्य से, वे मौके पर ही शहीद हो गए।

कीर्ति चक्र उद्धरण (आधिकारिक)

कीर्ति चक्र
कीर्ति चक्र KC

अपनी सुरक्षा की परवाह न करते हुए, कर्नल मनप्रीत सिंह, सेना मेडल ने भागते हुए आतंकवादियों पर गोली चलाई और एक को मार गिराया। असाधारण नेतृत्व दिखाते हुए उन्होंने टीम को पुनर्गठित किया और भागने के रास्तों को रोका। गोलीबारी में उन्हें माथे पर गोली लगी, लेकिन उन्होंने अंत तक लड़ाई जारी रखी। उनके साहस, नेतृत्व और साथीभाव के लिए उन्हें कीर्ति चक्र (मरणोपरांत) प्रदान किया जाता है।

यह घटना न केवल आतंकवाद के खिलाफ सेना की दृढ़ता दिखाती है, बल्कि कर्नल मनप्रीत के व्यक्तिगत साहस को भी उजागर करती है।

कीर्ति चक्र: शांति काल का सर्वोच्च सम्मान

कीर्ति चक्र भारत का दूसरा सबसे बड़ा शांति कालीन वीरता पुरस्कार है, जो महावीर चक्र का शांति कालीन समकक्ष है। यह 4 जनवरी 1952 को स्थापित किया गया था। स्वतंत्रता दिवस 2024 पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा अनुमोदित 103 वीरता पुरस्कारों में कर्नल मनप्रीत को यह सम्मान मरणोपरांत दिया गया।

यह पुरस्कार कर्नल मनप्रीत के 17 वर्षों के समर्पण का प्रमाण है। उनकी शहादत ने साबित किया कि सच्चा सैनिक कभी पीछे नहीं हटता।

व्यक्तिगत जीवन: परिवार और मूल्य

कर्नल मनप्रीत सिंह का व्यक्तिगत जीवन भी प्रेरणादायक था। वे अपनी पत्नी जगमीत कौर (जो एक स्कूल शिक्षिका हैं) और दो बच्चों—6 वर्षीय पुत्र कबीर सिंह तथा 2 वर्षीय पुत्री वाणी—के साथ नई चंडीगढ़ में रहते थे। उनकी मां, स्मत। मंजीत कौर, उनके पिता के निधन के बाद परिवार का सहारा बनीं। मनप्रीत परिवार के प्रति समर्पित थे।

विरासत

कर्नल मनप्रीत सिंह की शहादत ने न केवल जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा को मजबूत किया, बल्कि पूरे राष्ट्र को एकजुट किया। उनकी कहानी युवाओं को सेना जॉइन करने और देश सेवा के लिए प्रेरित करती है। अनंतनाग जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में सेना के अभियान जारी हैं, और मनप्रीत जैसे वीरों की याद हमें दृढ़ बनाती है।

जय हिंद! जय भारत!

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Captain Anshuman Singh कैप्टन अंशुमान सिंह: वीरता और बलिदान की अमर गाथा https://shauryasaga.com/captain-anshuman-singh-%e0%a4%85%e0%a4%82%e0%a4%b6%e0%a5%81%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%82%e0%a4%b9-kirti-chakra/ https://shauryasaga.com/captain-anshuman-singh-%e0%a4%85%e0%a4%82%e0%a4%b6%e0%a5%81%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%82%e0%a4%b9-kirti-chakra/?noamp=mobile#respond Fri, 07 Nov 2025 11:53:43 +0000 https://shauryasaga.com/?p=5875 कैप्टन अंशुमान सिंह: वीरता और बलिदान की अमर गाथा

कैप्टन अंशुमान सिंह भारतीय सेना के एक ऐसे बहादुर अधिकारी थे, जिन्होंने मात्र 26 वर्ष की आयु में अपने प्राणों की बाजी लगाकर न केवल अपने साथियों की जान बचाई, बल्कि राष्ट्र की सेवा में सर्वोच्च बलिदान दिया। वे आर्मी मेडिकल कोर के रेजिमेंटल मेडिकल ऑफिसर थे और सियाचिन ग्लेशियर की कठोर परिस्थितियों में तैनात थे। उनकी वीरता के लिए उन्हें मरणोपरांत भारत के द्वितीय सर्वोच्च शांतिकालीन वीरता पुरस्कार कीर्ति चक्र से सम्मानित किया गया। उनकी कहानी न केवल सैनिकों के लिए प्रेरणा है, बल्कि पूरे राष्ट्र के लिए एक उदाहरण है कि कर्तव्य और समर्पण क्या होता है।

प्रारंभिक जीवन और पारिवारिक पृष्ठभूमि

कैप्टन अंशुमान सिंह
कैप्टन अंशुमान सिंह

कैप्टन अंशुमान सिंह का जन्म 1997 में उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले के बरडीहा दलपत गांव में हुआ था। वे तीन भाई-बहनों में सबसे छोटे थे—उनका एक बड़ा भाई और एक बड़ी बहन थी। उनके पिता सुबेदार रवि प्रताप सिंह (रिटायर्ड) एक सेना के अधिकारी थे, जिनकी सेवा ने अंशुमान को बचपन से ही सैन्य जीवन की प्रेरणा दी। मां मंजू सिंह ने परिवार को मजबूती प्रदान की। परिवार मूल रूप से देवरिया का रहने वाला था, लेकिन वर्तमान में वे लखनऊ में रहते हैं। अंशुमान का बचपन सादगी और अनुशासन से भरा था।

शिक्षा और प्रारंभिक विकास

अंशुमान ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा राष्ट्रीय सैनिक स्कूल, चैल (हिमाचल प्रदेश) से प्राप्त की, जो एक आवासीय सैन्य स्कूल है।स्कूल के दौरान ही वे सेना में शामिल होने का सपना देखने लगे। स्कूली शिक्षा के बाद, उन्होंने आर्म्ड फोर्सेस मेडिकल कॉलेज (AFMC), पुणे में चयन प्राप्त किया, जहां से उन्होंने चिकित्सा में स्नातक (MBBS) की डिग्री हासिल की। AFMC में उनके प्रदर्शन ने उन्हें सेना के मेडिकल कोर के लिए एक आदर्श उम्मीदवार बना दिया। शिक्षा के दौरान ही उन्होंने नेतृत्व क्षमता और करुणा का प्रदर्शन किया, जो बाद में उनके सैन्य जीवन में झलका।

वैवाहिक जीवन और व्यक्तिगत पक्ष

कैप्टन अंशुमान सिंह
कैप्टन अंशुमान सिंह

कैप्टन अंशुमान सिंह का व्यक्तिगत जीवन भी उनकी रोमांटिक और समर्पित प्रकृति का प्रतीक था। उन्होंने अपनी भावी पत्नी स्मृति सिंह (एक इंजीनियर) से पहली मुलाकात इंजीनियरिंग कॉलेज के पहले दिन की थी। AFMC में चयन के कारण दोनों एक-दूसरे से दूर हो गए, लेकिन आठ वर्षों तक दूरी बनाए रखने के बावजूद उनका प्रेम अटूट रहा। आखिरकार, 10 फरवरी 2023 को दोनों ने विवाह बंधन में बंध गए। शादी के ठीक बाद ही अंशुमान की सियाचिन में पोस्टिंग हो गई।

सैन्य सेवा और करियर

कैप्टन अंशुमान सिंह
कैप्टन अंशुमान सिंह

AFMC से स्नातक होने के बाद, कैप्टन अंशुमान सिंह को आर्मी मेडिकल कोर में कमीशन प्राप्त हुआ (सेवा संख्या: MS-20323K)। आर्मी मेडिकल कोर भारतीय सेना को शांति और युद्धकाल में चिकित्सा सेवाएं प्रदान करता है। उन्होंने 26 पंजाब रेजिमेंट की 403 फील्ड हॉस्पिटल में रेजिमेंटल मेडिकल ऑफिसर के रूप में सेवा की, जो 26 मद्रास से संलग्न थी। जुलाई 2023 में वे सियाचिन ग्लेशियर में तैनात थे, जहां वे सैनिकों की चिकित्सा देखभाल के लिए जिम्मेदार थे। सियाचिन की ऊंचाई (19,000 फीट से अधिक) और चरम मौसम की चुनौतियों के बावजूद, वे हमेशा आगे रहते थे।

सियाचिन में बलिदान: वीरता की कहानी

कैप्टन अंशुमान सिंह

19 जुलाई 2023 को सुबह करीब 3 बजे, सियाचिन ग्लेशियर के चंदन ड्रॉपिंग जोन में गोला-बारूद के भंडारण में शॉर्ट सर्किट से आग लग गई। तेज हवाओं के कारण आग तेजी से फैल गई और कई फाइबर ग्लास हट्स (टेंट) धुंए से भर गए। कई सैनिक फंस गए थे। कैप्टन अंशुमान सिंह ने आग की सूचना पाते ही अपने हट से बाहर निकलकर प्रभावित क्षेत्र में पहुंचे। अपनी जान की परवाह किए बिना, उन्होंने धुंए से भरे हट से चार से पांच सैनिकों को शांत स्वर और स्पष्ट निर्देशों से सुरक्षित बाहर निकाला।

फिर, उन्होंने अपने हट से मेडिकल जांच कक्ष में लगी आग देखी और जीवन रक्षक दवाइयों व उपकरणों को बचाने का प्रयास किया। लेकिन हवाओं ने आग को और भयावह बना दिया, जिससे उनका हट भी लपटों में घिर गया। साथियों के बार-बार प्रयासों के बावजूद उन्हें बचाया नहीं जा सका। वे बुरी तरह झुलस गए और एयरलिफ्ट कर चंडीगढ़ ले जाए गए, जहां जुलाई 2023 में वे शहीद हो गए। इस घटना में उन्होंने न केवल सैनिकों की जान बचाई, बल्कि महत्वपूर्ण चिकित्सा सामग्री को भी सुरक्षित रखने की कोशिश की। सियाचिन में तैनाती से मात्र 15 दिन पहले ही वे वहां पहुंचे थे।

सम्मान और पुरस्कार – मरणोपरांत कीर्ति चक्र

कीर्ति चक्र
कीर्ति चक्र KC

कैप्टन अंशुमान सिंह की वीरता को मान्यता देते हुए, भारत सरकार ने उन्हें मरणोपरांत कीर्ति चक्र से नवाजा। यह पुरस्कार 5 जुलाई 2024 को राष्ट्रपति भवन में आयोजित रक्षा अलंकरण समारोह में प्रदान किया गया। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने यह सम्मान उनकी पत्नी स्मृति सिंह और मां मंजू सिंह को सौंपा। समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह भी उपस्थित थे। स्मृति ने सम्मान ग्रहण करते हुए अंशुमान की वीरता और उनकी आखिरी बातचीत का जिक्र किया, जो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। यह पुरस्कार उनकी असाधारण साहस, कर्तव्यनिष्ठा और सर्वोच्च बलिदान का प्रतीक है।

विरासत

कैप्टन अंशुमान सिंह के बलिदान ने लाखों लोगों को प्रेरित किया है। वे अपने पिता सुबेदार रवि प्रताप सिंह (रिटायर्ड), मां मंजू सिंह और पत्नी स्मृति सिंह के साथ-साथ पूरे राष्ट्र के लिए अमर हो गए।  हाल ही में, उनके परिवार ने सेना के कुछ नियमों (जैसे नेक्स्ट ऑफ किन – NOK – संबंधी पेंशन वितरण) पर सवाल उठाए, जिससे राष्ट्रीय चर्चा हुई, लेकिन यह उनकी वीरता को कम नहीं कर सकता। अंशुमान की डायरी और पत्र स्मृति के पास सुरक्षित हैं, जो उनके प्रेम और समर्पण की गवाही देते हैं। वे एक ऐसे सैनिक थे जो आगे बढ़कर नेतृत्व करते थे—डॉक्टर होने के नाते चिकित्सा सेवा में उत्कृष्ट, और योद्धा के रूप में अटल।

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सिपाही प्रवीण जंजाल: भारतीय सेना के बहादुर शहीद को मरणोपरांत ‘कीर्ति चक्र’

सिपाही प्रवीण जंजाल प्रभाकर भारतीय सेना के उन अदम्य साहस वाले सैनिकों में से एक थे, जिन्होंने देश की रक्षा में अपने प्राणों का सर्वोच्च बलिदान दिया। 6 जुलाई 2024 को, जम्मू-कश्मीर के पुलवामा जिले में एक भीषण आतंकवाद विरोधी अभियान के दौरान, इस 25 वर्षीय बहादुर सिपाही ने अपनी मातृभूमि की सेवा करते हुए शहादत प्राप्त की। उनके असाधारण साहस और बलिदान को मरणोपरांत ‘कीर्ति चक्र’ – शांतिकाल के दूसरे सर्वोच्च वीरता पुरस्कार – से सम्मानित किया गया है।

सिपाही प्रवीण जंजाल
सिपाही प्रवीण जंजाल

पृष्ठभूमि और देशसेवा का सफर

शुरुआती जीवन और प्रेरणा

सिपाही प्रवीण जंजाल का जन्म महाराष्ट्र के अकोला जिले के मोरगांव गांव में हुआ था। वह एक साधारण किसान परिवार से आते थे। उनके पिता प्रभाकर जंजाल और माता शालूबाई केवल 1.5 एकड़ की छोटी सी खेती पर निर्भर थे।

गरीबी और संघर्ष के बावजूद, प्रवीण ने बचपन से ही राष्ट्रसेवा का सपना देखा। उन्होंने अपनी लगन और मेहनत से 2019 में पहली कोशिश में ही भारतीय सेना में भर्ती होकर सफलता हासिल की।

  • मूल रेजिमेंट: 2 महार रेजिमेंट
  • अंतिम पोस्टिंग: 1 राष्ट्रिय राइफल्स (काउंटर-इंसर्जेंसी ड्यूटी)
  • पिछली पोस्टिंग: अरुणाचल प्रदेश

सिपाही प्रवीण जंजाल
सिपाही प्रवीण जंजाल

शहादत

सिपाही प्रवीण जंजाल, जो महार रेजिमेंट से भारतीय सेना की 1 राष्ट्रिय राइफल्स में तैनात थे, 6 जुलाई 2024 को एक महत्वपूर्ण आतंकवाद विरोधी अभियान का हिस्सा थे। यह ऑपरेशन पुलवामा के चिंगम गांव में लश्कर-ए-तैयबा (LeT) के आतंकवादियों के खिलाफ चलाया गया था।

मुठभेड़ भयंकर थी। अपनी जान की परवाह न करते हुए, सिपाही प्रवीण जंजाल ने दुश्मन के ठिकानों पर हमला किया और उन्हें उलझाए रखा, जिससे उनके साथियों को सामरिक बढ़त मिली। इस वीरगाथा में वे अपने साथी लांस नायक परदीप कुमार के साथ शहीद हो गए।

परिणाम: इस जुड़वां मुठभेड़ (चिंगम और कुलगाम) में सेना ने चार दुर्दांत आतंकवादियों को मार गिराया, जो कश्मीर घाटी में शांति भंग करने की कोशिश कर रहे थे।

अंतिम बातचीत

सिपाही प्रवीण जंजाल का निजी जीवन भी बलिदान के साथ जुड़ा हुआ है। उनकी शहादत से महज एक साल पहले उनका विवाह शंबाला से हुआ था। शहादत के दिन, 6 जुलाई 2024 को दोपहर 3:50 बजे, परिवार से उनकी आखिरी कॉल हुई थी। इस कॉल में उन्होंने घर बनाने के लिए भेजे गए ₹49,000 के UPI ट्रांसफर के बारे में पूछा था। यह बातचीत उनके और उनके परिवार के बीच अंतिम संवाद साबित हुई।

सिपाही प्रवीण जंजाल का पार्थिव शरीर श्रीनगर से नागपुर होते हुए, 8 जुलाई 2024 को उनके पैतृक गांव अकोला लाया गया, जहां पूरे सैनिक सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार किया गया।

मरणोपरांत सम्मान: कीर्ति चक्र

कीर्ति चक्र
कीर्ति चक्र KC

सिपाही प्रवीण जंजाल के अदम्य साहस और सर्वोच्च बलिदान को राष्ट्र ने सबसे बड़ी श्रद्धांजलि दी है।

15 अगस्त 2025 को, भारत के 79वें स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर, उन्हें मरणोपरांत ‘कीर्ति चक्र’ से सम्मानित किया गया।

कीर्ति चक्र: यह युद्ध के मैदान से बाहर (शांतिकालीन) दूसरा सर्वोच्च वीरता पुरस्कार है। यह सम्मान आतंकवाद विरोधी अभियानों में उनके असाधारण साहस, कर्तव्यनिष्ठा और दृढ़ संकल्प के लिए दिया गया।

यह पुरस्कार मई 2025 में हुए ‘ऑपरेशन सिंदूर’ (पहलगाम हमले के बाद पाकिस्तान और PoK में आतंकी ठिकानों पर भारत की स्ट्राइक) से जुड़े आतंकवाद विरोधी प्रयासों की श्रृंखला का हिस्सा था, जिसमें प्रवीण का बलिदान एक महत्वपूर्ण कड़ी था।

पुरस्कार की घोषणा पर, उनकी माता शालूबाई ने गर्व के साथ कहा कि वह स्वयं इस सम्मान को ग्रहण करना चाहती हैं। बड़े भाई सचिन और पूरे परिवार ने प्रवीण के राष्ट्रसेवा के सपने को याद किया, जो अब अनगिनत लोगों के लिए प्रेरणा बन गया है।

एक अमर कहानी

सिपाही प्रवीण जंजाल
सिपाही प्रवीण जंजाल

सिपाही प्रवीण जंजाल की कहानी सिर्फ शहादत की नहीं, बल्कि एक साधारण भारतीय युवक के असाधारण साहस और राष्ट्र के प्रति अटूट प्रेम की कहानी है। उनका बलिदान हमें याद दिलाता है कि हमारी स्वतंत्रता और शांति की कीमत अनमोल है, जिसे ऐसे वीरों ने अपने रक्त से सींचा है।

उनके बड़े भाई सचिन अब राज्य पुलिस बल में शामिल होकर परिवार की सेवा परंपरा को आगे बढ़ाना चाहते हैं—यह दर्शाता है कि बलिदान और राष्ट्रप्रेम की यह विरासत पीढ़ी दर पीढ़ी जारी रहेगी।

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Lieutenant Sushil Khajuria लेफ्टिनेंट सुशील खजूरिया कीर्ति चक्र https://shauryasaga.com/keerti-chakra-sushil-khajuria-%e0%a4%b8%e0%a5%81%e0%a4%b6%e0%a5%80%e0%a4%b2-%e0%a4%96%e0%a4%9c%e0%a5%82%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%be/ https://shauryasaga.com/keerti-chakra-sushil-khajuria-%e0%a4%b8%e0%a5%81%e0%a4%b6%e0%a5%80%e0%a4%b2-%e0%a4%96%e0%a4%9c%e0%a5%82%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%be/?noamp=mobile#respond Sat, 27 Sep 2025 09:54:58 +0000 https://shauryasaga.com/?p=5635 जम्मू-कश्मीर की ऊंचाइयों पर अमर बलिदान की गाथा

आज, 27 सितंबर 2025 को, हम फिर से एक ऐसे वीर सपूत को याद करते हैं, जिन्होंने अपनी जान की परवाह किए बिना मातृभूमि की रक्षा की। लेफ्टिनेंट सुशील खजूरिया, 18 ग्रेनेडियर्स के इस जांबाज़ सैनिक ने 27 सितंबर 2011 को जम्मू-कश्मीर के कुपवाड़ा जिले में पाकिस्तानी आतंकवादियों से लोहा लेते हुए अपना सर्वोच्च बलिदान दिया। उनकी उम्र उस वक्त महज 26 साल थी। यह कहानी न सिर्फ उनके साहस की है, बल्कि एक सच्चे सैनिक की निष्ठा, भाईचारे और त्याग की भी, जो आज भी हमें प्रेरित करती है।

सुशील का प्रारंभिक जीवन: साधारण से असाधारण तक का सफर

लेफ्टिनेंट सुशील खजूरिया का जन्म 28 अगस्त 1985 को जम्मू-कश्मीर के सांबा जिले के संग्रवाली गांव में एक साधारण परिवार में हुआ। उनके पिता एक छोटे से किसान थे, और माता गृहिणी थीं। सुशील अपने माता-पिता की दूसरी संतान थे, उनके एक बड़े भाई मेजर अनिल कुमार खजूरिया (जो बाद में सेना में शामिल हुए) और एक छोटी बहन भी थीं। पढ़ाई में तेज़ सुशील ने जम्मू के एक स्थानीय स्कूल से 12वीं तक शिक्षा प्राप्त की और फिर इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल की।

सुशील का सपना इंजीनियरिंग में करियर बनाने का था, लेकिन देश सेवा का जुनून उनके दिल में था। 2009 में उन्होंने सेना में शामिल होने का फैसला किया और चेन्नई स्थित ऑफिसर्स ट्रेनिंग अकादमी (OTA) में दाखिला लिया। 14 अप्रैल 2010 को वे आर्मी सर्विस कोर (ASC) में कमीशन हुए। हालांकि, जल्द ही उन्हें 18 ग्रेनेडियर्स यूनिट में डेपुटेशन पर भेजा गया, जो उस समय जम्मू-कश्मीर में आतंकवादियों से निपटने के लिए तैनात थी। यह यूनिट कारगिल युद्ध में परम वीर चक्र जीत चुकी थी, और सुशील इसके लिए गर्व महसूस करते थे।

शहादत का दिन: 27 सितंबर 2011


सुशील की शहादत की कहानी 26 सितंबर 2011 की रात से शुरू होती है। जम्मू-कश्मीर पुलिस को खुफिया जानकारी मिली कि 5-6 हथियारबंद पाकिस्तानी आतंकवादी नियंत्रण रेखा (LoC) पार कर घुसपैठ की कोशिश कर रहे हैं। यह इलाका कुपवाड़ा जिले के मिलियाल जंगलों में शमसबारी पर्वत श्रृंखला का हिस्सा था, जहां ऊंची चोटियां, घने जंगल और तेज ढलान हर मिशन को चुनौतीपूर्ण बनाते थे। 18 ग्रेनेडियर्स की एक टीम, जिसमें सुशील घाटक प्लाटून कमांडर के रूप में शामिल थे, को स्पेशल ऑपरेशंस ग्रुप (SOG) के पुलिसकर्मियों के साथ तैनात किया गया।

27 सितंबर की सुबह करीब 10:30 बजे, ऑपरेशन अपने चरम पर था। हवलदार रवि कुमार, जो अग्रिम पंक्ति में स्काउटिंग कर रहे थे, को आतंकवादियों ने अचानक गोली मार दी। वे गंभीर रूप से घायल हो गए और दुश्मन की भारी गोलीबारी के बीच फंस गए। आतंकवादी एक बड़े पत्थर के पीछे छिपे थे, जो उन्हें फायदा दे रहा था। सुशील ने तुरंत फैसला लिया। उन्होंने अपनी टीम को कवरिंग फायर देने का आदेश दिया और खुद घने झाड़ियों से रेंगते हुए दुश्मन की ओर बढ़े।

उन्होंने एक फ्लैंकिंग पोजीशन लेते हुए दो आतंकवादियों को निशाना बनाया और उन्हें मार गिराया। फिर, अपनी जान की परवाह किए बिना, वे घायल हवलदार रवि कुमार को बचाने के लिए दौड़े। उन्होंने रवि को कंधे पर लादा और सुरक्षित स्थान की ओर बढ़े, लेकिन तीसरे आतंकी की गोली उनके सीने में लगी। सुशील ने अंतिम सांस तक लड़ाई लड़ी, लेकिन वे शहीद हो गए। इस ऑपरेशन में कुल तीन आतंकवादी मारे गए, और घुसपैठ की कोशिश नाकाम हुई। यह पांच दिनों तक चली मुठभेड़ का हिस्सा था, जिसमें सुशील का बलिदान निर्णायक साबित हुआ।

परिवार और समाज पर असर

सुशील की शहादत ने उनके परिवार को गहरा आघात पहुंचाया। उनकी मां ने बताया कि उनकी शादी अगले साल तय थी, और वे घर आने की बात कर रहे थे। उनके बड़े भाई मेजर अनिल कुमार खजूरिया ने सेना में शामिल होकर भाई की विरासत को आगे बढ़ाया। परिवार को सरकार की ओर से आर्थिक सहायता और नौकरी दी गई, लेकिन सुशील का नुकसान कभी पूरा नहीं हो सकता।

संग्रवाली गांव में उनके सम्मान में **लेफ्टिनेंट सुशील खजूरिया मेमोरियल पार्क** बनाया गया, जहां स्थानीय लोग उनकी याद में इकट्ठा होते हैं। 2021 में उनकी 10वीं शहादत वर्षगांठ पर एक स्थानीय स्कूल का नाम उनके नाम पर रखा गया। उनके भाई-बहन ने एक अनोखी पहल की – उन्होंने एक कस्टम जावा पेराक मोटरसाइकिल बनवाई, जिस पर सुशील की तस्वीरें और उनकी शहादत की कहानी उकेरी गई। यह न सिर्फ एक स्मारक है, बल्कि उनकी याद को जीवित रखने का प्रयास भी।

सम्मान: कीर्ति चक्र से अमर नाम


सुशील की वीरता को देश ने सिर झुकाकर स्वीकार किया। 26 जनवरी 2012 को उन्हें मरणोपरांत **कीर्ति चक्र** से सम्मानित किया गया, जो शांति काल में दूसरा सबसे बड़ा वीरता पुरस्कार है। यह पुरस्कार उनके परिवार को राष्ट्रपति द्वारा प्रदान किया गया। 18 ग्रेनेडियर्स यूनिट आज भी सुशील को अपनी शान मानती है, और उनकी कहानी नई पीढ़ी के सैनिकों को प्रेरित करती है।

आज का महत्व

27 सितंबर 2025 को, जब हम सुशील को याद करते हैं, यह सिर्फ एक तारीख नहीं, बल्कि एक संकल्प है। आज भी जम्मू-कश्मीर और अन्य सीमावर्ती इलाकों में हमारे जवान हर दिन अपनी जान जोखिम में डालते हैं। सुशील की कहानी हमें सिखाती है कि सच्ची वीरता स्वार्थ से ऊपर होती है। उन्होंने अपने साथी की जान बचाने के लिए अपनी जान दी, और यह बलिदान हर भारतीय के लिए गर्व का विषय है।

जय हिंद! जय भारत! लेफ्टिनेंट सुशील खजूरिया को कोटि-कोटि नमन। उनकी आत्मा को शांति मिले। आप भी उनके बलिदान को नमन करें और कमेंट में अपनी भावनाएं साझा करें। क्या हम अपने शहीदों के लिए और बेहतर कर सकते हैं?

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