मार्कंडेय मिश्र यह नाम कहीं गुमनाम हो गया ! क्यों कि हमने सब भुला दिया – आज आप पढ़िए एक ऐसे योद्धा की कहानी जिसे पढने के बाद आप चैन से सो नहीं पाएंगे क्यों कि यह कोई फ़िल्मी कहानी नहीं है ! यह है मेरे देश के वीर सैनिकों की कहानी –
गोरखपुर के चौरीचौरा के छोटे से गांव अवधपुर की गलियों में कभी एक बच्चे की हंसी गूंजती थी। वह बच्चा था मार्कंडेय मिश्र, जिसका नाम आज कारगिल की बर्फीली चोटियों पर अमर है। यह कहानी उस वीर सपूत की है, जिसने देश के लिए सब कुछ न्योछावर कर दिया, और उस परिवार की, जो उसके जाने के बाद धीरे-धीरे अकेलेपन और मुफलिसी की आग में जलता चला गया।
एक साधारण शुरुआत, असाधारण सपने
अवधपुर गांव की मिट्टी में जन्मा मार्कंडेय मिश्र का बचपन गरीबी की साये में बीता। उसके पिता शिवपूजन मिश्र तरकुलहा देवी मंदिर में सत्यनारायण की कथा सुनाकर और पूजा-पाठ करके जैसे-तैसे घर चलाते थे। खेत का एक छोटा-सा टुकड़ा था, जो मुश्किल से दो वक्त की रोटी जुटा पाता था। मां फूलमती देवी की गोद में पलते हुए मार्कंडेय और उसका छोटा भाई योगेंद्र बड़े हुए। लेकिन भाग्य ने योगेंद्र को कम उम्र में ही छीन लिया—महज 14 साल की उम्र में इंसेफेलाइटिस ने उसे हमेशा के लिए सुला दिया। अब मार्कंडेय ही परिवार की एकमात्र उम्मीद था।
मार्कंडेय का मन किताबों में रमता था। गांव के छोटे से स्कूल में वह घंटों पढ़ता, सपने देखता—न सिर्फ अपने परिवार को गरीबी से निकालने के, बल्कि देश के लिए कुछ बड़ा करने के। उसकी आंखों में एक जुनून था, जो उसे भारतीय सेना की वर्दी तक ले गया। जब वह सेना में भर्ती हुआ, तो मां-बाप के चेहरों पर मुस्कान लौट आई। लगा, अब सब ठीक हो जाएगा। लेकिन किसे पता था कि यह मुस्कान जल्द ही आंसुओं में डूब जाएगी।
कारगिल की बर्फीली चोटियां और एक वीर का बलिदान
सन् 1999। कारगिल की ऊंची चोटियों पर युद्ध के बादल मंडरा रहे थे। पाकिस्तानी घुसपैठियों ने भारत की सीमाओं को चुनौती दी थी। मार्कंडेय, जो अब भारतीय सेना का एक जवान था, नियंत्रण रेखा पर तैनात था। बर्फीली हवाओं और गोलीबारी के बीच उसने वीरता की ऐसी मिसाल कायम की, जो आज भी गोरखपुर के लोगों के सीने में गर्व जगाती है। दुश्मन से लोहा लेते हुए, आखिरी सांस तक लड़ते हुए, मार्कंडेय ने अपनी जान देश को समर्पित कर दी। वह शहीद हो गया।
उसकी शहादत की खबर जब अवधपुर पहुंची, तो गांव की गलियां सन्नाटे में डूब गईं। शिवपूजन और फूलमती का आंगन, जो कभी मार्कंडेय की हंसी से गूंजता था, अब सिर्फ मातम की आवाजों से भर गया। मार्कंडेय की पत्नी मंजू, जो अभी अपनी तीन छोटी-छोटी बेटियों के साथ नई जिंदगी की शुरुआत कर रही थी, अचानक विधवा हो गई। शहीद की बहन मीरा, जो ससुराल छोड़कर माता-पिता के पास रह रही थी, इस सदमे को बर्दाश्त न कर सकी।
बिखरता परिवार, ठंडा पड़ता चूल्हा
मार्कंडेय की शहादत के बाद सरकार ने कुछ वायदे किए। मंजू को सेना के अस्पताल में नौकरी मिली, और कुछ सरकारी सहायता के साथ वह अपनी बेटियों को लेकर मायके चली गई। लेकिन शिवपूजन और फूलमती के लिए ये वायदे खोखले साबित हुए। गांव में अकेले रह गए इस बुजुर्ग दंपति के पास न तो कोई सहारा था, न ही कोई उम्मीद। 2006 में शिवपूजन का निधन हो गया। दो साल बाद, 2008 में, फूलमती भी दुनिया छोड़ गई।
मीरा, जो पहले ही मानसिक रूप से अस्थिर हो चुकी थी, गांव की गलियों में भटकती रहती थी। उसकी तबीयत बिगड़ी, और जब उसे इलाज के लिए वाराणसी ले जाया गया, तो वह भी चल बसी। मार्कंडेय का घर, जो कभी प्यार और हंसी से भरा था, अब पूरी तरह वीरान हो चुका था। चूल्हा ठंडा पड़ गया, और आंगन में सिर्फ सन्नाटा बचा।
शहीद की विरासत और हमारी जिम्मेदारी
आज, कारगिल विजय दिवस पर जब हम शहीदों को याद करते हैं, तो मार्कंडेय मिश्र की कहानी हमें सिर्फ उनकी वीरता ही नहीं, बल्कि उनके परिवार के बलिदान की भी याद दिलाती है। यह कहानी हमें सिखाती है कि देश की रक्षा के लिए दी गई कुर्बानी सिर्फ एक जवान की नहीं होती—उसका पूरा परिवार उस आग में जलता है।
गोरखपुर के लोग आज भी मार्कंडेय को अपने दिल में बसाए हुए हैं। उनकी शहादत हमें याद दिलाती है कि स्वतंत्रता और सम्मान की कीमत कितनी बड़ी होती है। लेकिन क्या हमारा गर्व सिर्फ 26 जुलाई तक सीमित रहना चाहिए? क्या हमारा दायित्व सिर्फ शहीदों को याद करने तक है? मार्कंडेय जैसे वीरों की शहादत का सम्मान तभी सच्चा होगा, जब हम उनके परिवारों की सुध लेंगे, उनके बच्चों के सपनों को सहारा देंगे, और यह सुनिश्चित करेंगे कि उनका बलिदान व्यर्थ न जाए।
यह कहानी सिर्फ मार्कंडेय की नहीं, बल्कि उन तमाम शहीदों की है, जिन्होंने देश के लिए सब कुछ दे दिया। आइए, इस कारगिल विजय दिवस पर हम संकल्प लें कि हम न केवल उनकी वीरता को सलाम करेंगे, बल्कि उनके परिवारों को भी अपनेपन का एहसास दिलाएंगे। क्योंकि एक शहीद का घर कभी सूना नहीं होना चाहिए।

