हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले के छोटे से गांव तियारा की मिट्टी में जन्मा एक सितारा, जिसने अपनी वीरता और बलिदान से देश के इतिहास में अपना नाम स्वर्णिम अक्षरों में लिख दिया। लेफ्टिनेंट कर्नल भानु प्रताप सिंह मांकोटिया—एक ऐसा नाम, जो न केवल सैन्य शौर्य का प्रतीक है, बल्कि देशभक्ति, अनुशासन और परिवार की गौरवशाली परंपरा का भी जीवंत उदाहरण है। यह कहानी उस वीर सपूत की है, जिसने 30 जुलाई 2025 को लद्दाख की दुर्गम वादियों में देश के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए, और उस परिवार की, जो अपनी इस अनमोल धरोहर को खोने के बाद भी गर्व के साथ उसकी विरासत को संजोए हुए है।
सैन्य परंपरा की गौरवशाली शुरुआत
भानु प्रताप सिंह मांकोटिया का जन्म एक ऐसे परिवार में हुआ, जहां देश सेवा की परंपरा चार पीढ़ियों से चली आ रही थी। उनके पिता, कर्नल आर.पी.एस. मांकोटिया (सेवानिवृत्त) और मां श्रीमती सुनीता मांकोटिया ने उन्हें बचपन से ही अनुशासन, साहस और देशभक्ति के मूल्यों से सजाया। तियारा गांव से शुरू हुआ उनका सफर पठानकोट, पंजाब तक पहुंचा, जहां परिवार ने अपना नया आशियाना बनाया। छोटी उम्र से ही भानु के मन में देश के लिए कुछ कर गुजरने का जुनून था। उनकी आंखों में सपने थे—न केवल अपने परिवार का नाम रोशन करने के, बल्कि मातृभूमि की रक्षा में अपनी जिंदगी समर्पित करने के।
भानु ने अपनी प्रतिभा और मेहनत से राष्ट्रीय रक्षा अकादमी (एनडीए) में स्थान प्राप्त किया। यहां उन्होंने न केवल अपनी शारीरिक और मानसिक क्षमताओं को निखारा, बल्कि नेतृत्व और समर्पण की मिसाल भी कायम की। उनकी उत्कृष्टता का आलम यह था कि उन्हें एनडीए में स्वर्ण पदक से सम्मानित किया गया, जो उनकी नेतृत्व क्षमता और समग्र प्रदर्शन का प्रतीक था।
एनडीए के बाद भानु ने भारतीय सैन्य अकादमी (आईएमए) में कदम रखा। यहां भी उनकी प्रतिभा ने सबको चकित कर दिया। जून 2012 में, उन्हें स्वॉर्ड ऑफ ऑनर से नवाजा गया—यह सम्मान आईएमए में सर्वश्रेष्ठ कैडेट को दिया जाता है। यह उपलब्धि भानु को भारतीय सेना के सबसे होनहार युवा अधिकारियों में शुमार कर गई।

14 हॉर्स (सिंध हॉर्स) रेजिमेंट: एक वीर का सफर
आईएमए से कमीशन प्राप्त करने के बाद भानु को 14 हॉर्स (सिंध हॉर्स) रेजिमेंट में शामिल किया गया, जो भारतीय सेना की एक गौरवशाली बख्तरबंद इकाई है। इस रेजिमेंट में उन्होंने अपने कर्तव्य को पूरी निष्ठा और उत्साह के साथ निभाया। चाहे वह कठिन इलाकों में तैनाती हो या चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में नेतृत्व, भानु ने हर बार अपनी योग्यता साबित की। उनकी अनुकूलन क्षमता और रणनीतिक समझ ने उन्हें अपने साथियों और वरिष्ठ अधिकारियों के बीच सम्मान का पात्र बनाया।
2025 में, भानु लद्दाख के रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्र में तैनात थे। यह क्षेत्र, जो नियंत्रण रेखा (एलओसी) और सियाचिन ग्लेशियर जैसे विश्व के सबसे ऊंचे युद्धक्षेत्र के करीब है, अपनी कठिन भौगोलिक परिस्थितियों और अस्थिर मौसम के लिए जाना जाता है। 14 हॉर्स रेजिमेंट, फायर एंड फ्यूरी कॉर्प्स के अधीन, इस क्षेत्र में सैन्य तैयारियों को बनाए रखने और सीमाओं की रक्षा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही थी। इस रेजिमेंट का कार्य केवल युद्ध की तैयारी तक सीमित नहीं था, बल्कि बख्तरबंद वाहनों, हथियार प्रणालियों और सहायक उपकरणों की मरम्मत और रखरखाव जैसे विशेषज्ञ कार्य भी शामिल थे।
लद्दाख की दुर्गम राह और अंतिम यात्रा
30 जुलाई 2025 का दिन भानु और उनके साथियों के लिए एक सामान्य मिशन का दिन था। 60 बख्तरबंद रेजिमेंट के एक काफिले के हिस्से के रूप में, भानु को लद्दाख के गलवान क्षेत्र में दुरबुक से चोंगताश तक एक ऑपरेशनल मूवमेंट के लिए रवाना होना था। यह मार्ग अपनी ऊबड़-खाबड़ सड़कों और अस्थिर चट्टानों के लिए कुख्यात था। हमेशा की तरह, भानु ने अपने सैनिकों का नेतृत्व आगे रहकर किया। वह जानते थे कि यह यात्रा जोखिमों से भरी है, लेकिन उनके लिए कर्तव्य सर्वोपरि था।
सुबह करीब 11:30 बजे, जब उनका सैन्य वाहन एक संकरे और खतरनाक रास्ते से गुजर रहा था, अचानक एक विशाल चट्टान पहाड़ी से टूटकर उनके वाहन पर आ गिरी। इस हादसे का प्रभाव इतना भयानक था कि वाहन पूरी तरह चकनाचूर हो गया। लेफ्टिनेंट कर्नल भानु प्रताप सिंह मांकोटिया और लांस दफादार दलजीत सिंह, दोनों 14 हॉर्स रेजिमेंट के जवान, इस हादसे में शहीद हो गए। उस समय भानु की उम्र मात्र 33 वर्ष थी।
एक परिवार का गर्व और दर्द
भानु की शहादत की खबर जब पठानकोट पहुंची, तो उनके परिवार का आंगन मातम में डूब गया। उनके पिता, कर्नल आर.पी.एस. मांकोटिया (सेवानिवृत्त), मां श्रीमती सुनीता मांकोटिया, पत्नी श्रीमती तरिणी, छोटा बेटा वयोम, और छोटे भाई मेजर सूर्य प्रताप सिंह मांकोटिया (जो वर्तमान में सेना में सेवा दे रहे हैं) के लिए यह एक असहनीय क्षति थी। लेकिन इस दुख के बीच भी, परिवार ने भानु की शहादत पर गर्व महसूस किया। 31 जुलाई 2025 को, पठानकोट में पूरे सैन्य सम्मान के साथ भानु का अंतिम संस्कार किया गया।
फायर एंड फ्यूरी कॉर्प्स और नॉर्दर्न कमांड ने भानु और लांस दफादार दलजीत सिंह को श्रद्धांजलि अर्पित की। लद्दाख के उपराज्यपाल कविंदर गुप्ता और हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने भी उनके बलिदान को सलाम किया। भानु की शहादत ने न केवल उनके परिवार, बल्कि पूरे देश को उनके प्रति कृतज्ञता से भर दिया।
अमर रहेगा भानु का बलिदान
लेफ्टिनेंट कर्नल भानु प्रताप सिंह मांकोटिया की कहानी केवल एक सैनिक की नहीं, बल्कि एक ऐसे वीर की है, जिसने अपने जीवन को देश की रक्षा के लिए समर्पित कर दिया। उनकी शहादत हमें याद दिलाती है कि सीमाओं की रक्षा करने वाले सैनिकों का बलिदान अनमोल है। भानु की तरह ही, उनके परिवार की सैन्य परंपरा और समर्पण भी प्रेरणा का स्रोत है।
आज, जब हम उनकी वीरता को याद करते हैं, तो यह हमारी जिम्मेदारी है कि हम उनके परिवार का सम्मान करें और उनकी विरासत को जीवित रखें। भानु प्रताप सिंह मांकोटिया का नाम हमेशा उन लोगों के दिलों में जिंदा रहेगा, जो देशभक्ति और बलिदान की भावना को समझते हैं। उनकी शहादत हमें सिखाती है कि सच्चा सैनिक वही है, जो न केवल युद्ध के मैदान में, बल्कि जीवन के हर क्षेत्र में अपने कर्तव्य को सर्वोपरि मानता है।
जय हिंद!

