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Param Veer Chakra

परमवीर चक्र नायब सूबेदार बाना सिंह

—— शौर्य दिवस -शौर्यनमन—–
नायब सूबेदार बाना सिंह
परमवीर चक्र
यूनिट – 8 जेएके एलआई (सियाचिन)
बाना पोस्ट का संग्राम
ऑपरेशन राजीव (ऑपरेशन मेघदूत)
नायब सूबेदार बाना सिंह का जन्म 6 जनवरी 1949 को जम्मू-कश्मीर के कादयाल गाँव में सरदार अमर सिंह एवं श्रीमती भोली देवी कौर के परिवार में हुआ था। 6 जनवरी 1969 को वह भारतीय सेना की जम्मू एंड कश्मीर लाइट इंफेट्री रेजिमेंट में रंगरूट के रूप में भर्ती हुए थे। प्रारंभिक प्रशिक्षण के पश्चात उन्हें 8 जेएके एलआई बटालियन में राइफलमैन के पद पर नियुक्त किया गया था।
—— सियाचिन में वीरता ——
वर्ष 1987 में पाकिस्तान ने सियाचिन ग्लेशियर क्षेत्र में, भारतीय सीमा में घुसपैठ कर एक ऊँची स्थिति पर अधिकार कर उसे पाकिस्तान के जनक कायदे-आजम मोहम्मद अली जिन्ना के नाम पर ‘कायद पोस्ट’ नाम दे दिया। यह शत्रु चौकी एक किले की भांति थी, जिसके दोनों ओर 1500 फीट ऊँची हिम की भीतें थी। शत्रु के रणनीतिक महत्व की साल्टोरो रिज पर प्रभावी होने से भारत की अमर एवं सोनम नामक चौकियों तक रसद पहुंचाने वाले हेलीकॉप्टरों पर संकट उत्पन्न हो गया एवं यहां से शत्रु हमारे 80 किलोमीटर के क्षेत्र पर सीधी दृष्टि रख रहा था। अत: रणनीतिक कारणों से भी सुरक्षा संकट में थी।
8 अप्रैल 1987 को, पाकिस्तानी सैनिकों ने ‘कायद पोस्ट’ से गोलीबारी की जिससे सोनम पोस्ट पर एक JCO व पांच सैनिक वीरगति को प्राप्त हो गए। अब भारत के लिए शांत रहना संभव नहीं था। तब भारतीय सेना की कमान ने इस चौकी पर पुनः अधिकार करने के लिए एक ऑपरेशन चलाने का निर्णय लिया। सर्वप्रथम सैकिंड लेफ्टिनेंट राजीव पांडे के नेतृत्व में एक टुकड़ी भेजी गई , उन्होंने ऊपर चढ़ने के लिए रस्सियां भी लगा दी थी, किंतु उन्हें पाकिस्तानी कमांडो ने देख लिया और 29 मई 1987 को शत्रु की फायरिंग में सैकिंड लेफ्टिनेंट राजीव पांडे व 5 सैनिक बलिदान हो गए। आगे चलकर उनकी स्मृति में ही इस ऑपरेशन का नाम ‘ऑपरेशन राजीव’ रखा गया था।
23 जून 1987 को कैप्टन वरिंदर सिंह के नेतृत्व में नायब सूबेदार बाना सिंह, हवलदार बलवंत सिंह, राइफलमैन चुन्नी लाल, राइफलमैन लक्ष्मण दास, राइफलमैन ओमराज और राइफलमैन कश्मीर चंद मिशन पर चल दिए। योजना के अनुसार बटालियन के अन्य सैनिकों ने पाकिस्तानियों को फायरिंग में व्यस्त रखा व इस टुकड़ी ने उद्देश्य की ओर बढ़ना आरंभ कर दिया।
‘कायद पोस्ट’ की हिम की खड़ी भीत पर चढ़ना अत्यंत कठिन और संकटमय कार्य था। रात्रि का तापमान शून्य से भी तीस डिग्री नीचे गिरा हुआ था। तीव्र हवाएं चल रही थी। पिछले तीन दिनों से निरंतर भारी हिमपात हो रहा था। शीत के कारण शस्त्र भी ठीक से कार्य नहीं कर रहीं थे। अंधेरे का लाभ लेते हुए यह टुकड़ी आगे बढ़ रही थी। मार्ग में उन्हें इस मिशन में बलिदान हुए सैकिंड लेफ्टिनेंट राजीव पांडे और उनके सहकर्मियों के शव भी पड़े दिखाई दिए। तीन दिन और तीन रात्रि तक यह टुकड़ी अनावृत आकाश के नीचे ही रही और आगे सरकती रही।
26 जून 1987 की भोर में 4:00 बजे यह टुकड़ी ऊपर चोटी तक पहुँचने में सफल हो गई। वहाँ पहुँच कर उन्होनें अपने दल को दो भागों में विभाजित कर, दो दिशाओं में तैनात किया। एक दल ने ‘कायद पोस्ट’ पर बने बंकरों में हथगोले फेंकने आरंभ किए तो दूसरे दल ने ने भागने का प्रयास कर रहे पाकिस्तानियों को संगीनों से मार दिया। वहां पर पाकिस्तान के स्पेशल सर्विस ग्रुप (SSG) की 3 बटालियन की शाहीन कंपनी के सात फीट लंबे-बलिष्ठ कमांडो तैनात थे। जो इस आकस्मिक एवं अप्रत्याशित रूप से हुए आक्रमण में मारे गए और अल्प समय में ही इस टुकड़ी ने वहां अधिकार कर लिया।
नायब सूबेदार बाना सिंह ने शत्रु के आधिपत्य में जा चुकी अति महत्वपूर्ण सामरिक पोस्ट को पुनः प्राप्त किया। अत्यंत विपरीत परिस्थितियों में प्रदर्शित की गई विशिष्ट वीरता, अदम्य साहस और कुशल नेतृत्व के लिए नायब सूबेदार बाना सिंह को “परमवीर चक्र” से सम्मानित किया गया। आगामी दिवस ही कायद पोस्ट का नाम परिवर्तित कर ‘बाना पोस्ट’ कर दिया गया। जम्मू में एक स्टेडियम का नामकरण बाना सिंह के नाम पर किया गया है। कारगिल युद्ध के समय भी नायब सूबेदार बाना सिंह सेना में सेवाएं प्रदान कर रहे थे। वह मानद कैप्टन के रूप में सेवानिवृत्त हुए।
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