कंपनी हवलदार मेजर पीरू सिंह

परम वीर चक्र (मरणोपरांत), राजपूताना राइफल्स
कंपनी हवलदार मेजर पीरू सिंह (नं-2831592) का जन्म 20 मई, 1918 को गांव बेरी, झुंझुनू, राजस्थान में हुआ. था। इनके पिता का नाम श्री लाल सिंह था। वे 20 मई, 1936 को 6 राजपूताना राइफल्स में भर्ती हुए थे।
वीर भोग्या वसुन्धरा राजपूताना राइफल्स जम्मू-कश्मीर संक्रिया के दौरान 18 मई, 1948 को पाकिस्तानी कबायलियों ने टिथवाल सेक्टर में एक जोरदार जवाबी हमला किया। 8 जुलाई को उन्होंने रिंग कंटूर पर धावा बोलकर उसे अपने कब्जे में कर लिया और भारतीयों को किशन गंगा नदी के उस पार की अग्रिम चौकियों को भी खाली करने पर मजबूर कर दिया। इस पराजय के बाद भारतीय सैनिकों ने टिथवाल पर्वत श्रेणी पर पोजिशन ले ली। तभी 163 ब्रिगेड को सन्निकट आक्रमण में सहायता देने के लिए 6 राजपूताना राइफल्स को उरी से टिथवाल भेजा गया।
11 जुलाई को भारत का आक्रमण शुरू हुआ। 15 जुलाई तक इसकी प्रगति ठीक रही। तभी टोह रपट ने सूचना दी कि दुश्मन एक ऊंचे ठिकाने पर जमा बैठा है और आगे बढ़ने के लिए उस ठिकाने पर कब्जा करना आवश्यक है। उससे कुछ और आगे एक दूसरे ठिकाने पर भी दुश्मन बड़ी तादाद में मौजूद था। इन दोनों ठिकानों पर कब्जा करने का दायित्व 6 राजपूताना राइफल्स को दिया गया। ‘डी’ कंपनी को पहले ठिकाने पर कब्जा करना था और उसके कार्य संपादन के बाद ‘सी’ कंपनी को दूसरे ठिकाने पर। 18 जुलाई को 13:30 बजे ‘डी’ कंपनी ने लक्ष्य की ओर कूच किया। लक्ष्य तक पहुंचने का रास्ता लगभग एक मीटर चौड़ा था और उसकी दोनों ओर गहरी खाइयां थीं। इस संकरे रास्ते पर दुश्मन के गुप्त बंकरों की भी नजर थी। जब कंपनी आगे बढ़ रही थी तभी उसे भारी गोलीबारी का सामना करना पड़ा जिसके कारण आधे घंटे में ही उसके 51 सैनिक हताहत हो गए।
इस लड़ाई के दौरान कंपनी हवलदार मेजर पीरू सिंह कंपनी के उस अग्रिम सेक्शन के साथ थे जिसके आधे से ज्यादा सैनिक उस विनाशकारी फायर में हताहत हो चुके थे। वे अपने साथियों पर आग बरसाने वाली दुश्मन की मीडियम मशीन गन चौकी की ओर लपके। इस प्रयास में दुश्मन द्वारा फेंके गए ग्रेनेड के टुकड़ों से उनके कपड़े फट गए तथा शरीर में कई जगह जख्म हो गए। लेकिन ये घाव उन्हें रोक न सके। वे ‘राजा रामचन्द्र की जय जयघोष करते हुए आगे बढ़े तथा मीडियम मशीन गन क्रू को अपनी स्टेनगन से जख्मी कर दिया। फिर तेजी से लपककर संगीन से क्रू को मौत के घाट उतार दिया और इस प्रकार खतरनाक मशीनगन को शांत कर चौकी पर कब्ज़ा कर लिया।
अब तक उनके सभी साथी या तो मारे जा चुके थे या जख्मी हो चुके थे, अतः दुश्मन को पहाड़ी से हटाने का जिम्मा अब केवल उन्हीं पर था। यद्यपि उनके शरीर से खून बह रहा था तब भी वे दुश्मन की दूसरे मशीनगन ठिकाने पर हमला बोलने के लिए धीर-धीरे आगे बढ़े। इसी समय दुश्मन के एक ग्रेनेड से उनका चेहरा जख्मी हो गया। ललाट से निकलते लहू के कारण उन्हें दिखाई भी नहीं दे रहा था। अब तक उनकी स्टेनगन की सारी गोलियां भी समाप्त हो चुकी थीं। बहादुरी के साथ वे कब्जे में आई शत्रु की खाई से रंगकर बाहर आए और उसकी अगली चौकी पर एक ग्रेनेड फेंक दिया। इसके बाद पीरू सिंह अगली खाई में कूद पड़े और वहां बैठे दो शत्रु सैनिकों को संगीन घोंप कर मार गिराया। जब वे एक खाई से बाहर निकलकर दूसरी खाई पर कब्जा करने जा रहे थे तभी दुश्मन की एक गोली उनके सिर पर लगी, लेकिन मरने से पहले उन्होंने दुश्मन की तीसरी खाई में भी ग्रेनेड फेंक दिया।
कंपनी हवलदार मेजर पीरू सिंह ने इस विलक्षण वीरतापूर्ण कृत्य में अपने प्राणों की आहूति दे दी और दृढ़ साहस का एक अनोखा उदाहरण प्रस्तुत किया। उन्हें मरणोपरांत परम वीर चक्र से सम्मानित किया गया।
जय हिन्द जय भारत
(साभार – गूगल , पराक्रम गाथा सूचना और प्रसारण मंत्रालय भारत सरकार, विजय सोहनी, पेन टुडे, #shauryanamanfoundation)
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