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Maha Veer Chakra

महावीर चक्र जमादार हरदेव सिंह

—— बलिदान दिवस -शौर्यनमन—–
जमादार हरदेव सिंह
14-07-1921 – 24-05-1948
महावीर चक्र (मरणोपरांत)
वीरांगना – श्रीमती बलजिंदर कौर
यूनिट – 1 पटियाला इंफेंट्री (RS)
मछोई का युद्ध
भारत-पाक युद्ध 1947-48
जमादार हरदेव सिंह का जन्म ब्रिटिश भारत में, 14 जुलाई 1921 को संयुक्त पंजाब में वर्तमान बठिंडा जिले में सरदार रणजीत सिंह के घर में हुआ था। 14 जुलाई 1941 को वह 1 पटियाला इंफेंट्री (RS) में रंगरूट के रूप में भर्ती हुए थे। आगे चलकर यह रेजिमेंट जींद राज्य से जींद इंफेंट्री और नाभा राज्य से नाभा अकाल इंफेंट्री में परिवर्तित होते हुए स्वतंत्रता के पश्चात भारतीय सेना की 15 पंजाब रेजिमेंट में विलय हो गई।
मई 1948 में, जमादार हरदेव सिंह की बटालियन को पाकिस्तानी आक्रमणकारियों की अग्रिम जाँच के लिए जम्मू-कश्मीर क्षेत्र में तैनात किया गया था। बटालियन के सैनिक 21 मई 1948 को जोजिला पहुंचे और 22 मई को गुमरी में उनकी शत्रु सेना के साथ भीषण मुठभेड़ हुई, किंतु इस मुठभेड़ में बटालियन को अत्यधिक जनहानि हुई। इसके पश्चात बटालियन ने जोजिला और मछोई के मध्य के क्षेत्र में सघन गश्त आरंभ की।
23 मई 1948 को, जमादार हरदेव सिंह मछोई में एक प्लाटून गश्ती दल की कमान नियंत्रित कर रहे थे। मार्ग में, उनके गश्ती दल पर शत्रु की भलीभांति सुदृढ़ स्थितियों से भीषण आक्रमण हुआ। प्लाटून शत्रु की गहन, सटीक और निकटतम गोली वर्षा में घिर गई, जिसमें एक तिहाई सैनिक बलिदान हुए या घायल हो गए।
जमादार हरदेव सिंह को, भी बांह में गोली लगी, किंतु उन्होंने धैर्य नहीं छोड़ा और वे त्वरित सक्रिय हुए। स्थिति की गंभीरता को अनुभूत करते हुए, घने हिमाच्छादित क्षेत्र में, स्वचालित शस्त्रों और मोर्टार फायर में वह एक-एक सैनिक तक गए और अपने दल को पहाड़ी ढलान पर इकट्ठा करने का प्रयास किया, जिससे सुदृढीकरण आने तक वह शत्रु को वहां से व्यस्त रख सकें।
इस प्रक्रिया में, जमादार हरदेव सिंह को कंधे पर दो समय आघात लगा , किंतु इससे उनकी अदम्यता अल्प नहीं हुई और वह अधिक दृढ हो गए। अपनी व्यक्तिगत सुरक्षा की घोर उपेक्षा करते हुए, उन्होंने अपने समस्त घायल सैनिकों को निकटतम आड़ में पहुँचाया। वह स्वयं सबसे अंत में रेंग कर आड़ में आने वाले अंतिम व्यक्ति थे।
आते समय उन्हें शत्रु की मीडियम मशीन गन से अनेक गोलियां लगीं और वह घातक रूप से घायल हो गए। अपने समस्त घायल सैनिकों को चिकित्सा सहायता प्रदान किए जाने और पट्टी होने तक उन्होंने स्वयं चिकित्सा लेना अस्वीकार कर दिया। मृत्यु से पूर्व उन्होंने शत्रु का दृढ़ प्रतिरोध करने के लिए अपने सैनिकों को संगठित और उत्साहित किया।
जमादार हरदेव सिंह को उनके अदम्य साहस, अडिग नेतृत्व और कर्तव्य से परे सर्वोच्च बलिदान के कार्य के लिए मरणोपरांत “महावीर चक्र” से सम्मानित किया गया।

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