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Maha Veer Chakra

महावीर चक्र ब्रिगेडियर जोरावर चंद बख्शी

—— शौर्य दिवस -शौर्यनमन—–
ब्रिगेडियर जोरावर चंद बख्शी
21-10-1921 – 24-05-2018
महावीर चक्र , वीर चक्र, परम विशिष्ट सेवा मेडल
68 इंफेंट्री ब्रिगेड /5 गोरखा राइफल्स
ऑपरेशन अब्लेज (ऑपरेशन बख्शी)
भारत-पाक युद्ध 1965
ब्रिगेडियर जोरावर चंद बख्शी का जन्म ब्रिटिश भारत में 21 अक्टूबर 1921 को रावलपिंडी के निकट गुलयाना (वर्तमान पाकिस्तान) में ब्रिटिश-भारतीय सेना में कार्यरत बहादुर लाल चंद बख्शी के घर में हुआ था। वर्ष 1942 में रावलपिंडी के गॉर्डन कॉलेज से स्नातक होने के पश्चात वर्ष 1943 में उन्हें ब्रिटिश-भारतीय सेना की बलूच रेजिमेंट में नियुक्त किया गया था।
स्वतंत्रता के पश्चात जब भारत-पाकिस्तान का विभाजन हुआ, तो उन्हें पंजाब में शांति बनाए रखने के लिए गठित विशेष बल ‘पंजाब सीमा बल’ में सम्मिलित किया गया था। इस बल के भंग होने के पश्चात उन्हें भारतीय सेना की 5 गोरखा राइफल्स रेजिमेंट में स्थानांतरित कर दिया गया और इसके शीघ्र पश्चात उन्होंने 1947-48 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में भाग लिया था। इस युद्ध में वीरता प्रदर्शित करने के लिए जुलाई 1948 में उन्हें “वीर चक्र” से सम्मानित किया गया था।
अगस्त-सितंबर 1965 में ब्रिगेडियर जोरावर चंद बख्शी नवगठित 68 ब्रिगेड के कमांडर थे। उन्हें उरी से पुंछ की ओर आगे बढ़ने के लिए महत्वपूर्ण बसाली, हाजी पीर दर्रा और कहुटा पर आधिपत्य करने के कठिन कार्य पर नियुक्त किया गया। हाजी पीर से होकर उरी और पुंछ को जोड़ने वाली सड़क 1947-48 के कबाइली आक्रमण में हाजी पीर के पाकिस्तान में चले जाने से प्रयोग में नहीं लिए जाने के कारण अनुपयुक्त हो गई थी और कुछ स्थानों पर टूट भी गई थी। हाजी पीर तक पहुंचने के लिए पर्वत श्रृंखलाओं के अतिरिक्त कोई सीधा मार्ग नहीं था। 9,000 फीट की ऊंचाई पर स्थित हाजी पीर के आगे और निकट शत्रु की सुदृढ़ रक्षात्मक स्थितियां थी।
इस कार्रवाई में पूर्ण समय ब्रिगेडियर बख्शी आगे रहे। जैसे ही किसी उद्देश्य पर अधिकार किया गया, वह पुनर्गठन में मार्गदर्शन और सहायता करने के लिए व्यक्तिगत रूप से वहां उपस्थित रहे अनेक समय, निरंतर शत्रु की तीव्र फायरिंग थी, तो भी अपनी व्यक्तिगत सुरक्षा की घोर उपेक्षा करते हुए वह सबसे अग्रणी रहे। हाजी पीर पर आधिपत्य के पश्चात, यह जानते हुए भी कि शत्रु निश्चित रूप से उन पर दुष्टतापूर्वक आक्रमण करेगा , तो भी वह त्वरित अपने सामरिक मुख्यालयों को आगे ले गए।
इस पूर्ण ऑपरेशन में, ब्रिगेडियर बख्शी ने अपने सैनिकों की कठिनाइयों को साझा करने में उत्कृष्ट नेतृत्व, दृढ़ संकल्प और सौहार्द के साथ हमारी सेना की उच्चतम परंपराओं में उच्च स्तरीय योजना और सामरिक कौशल का प्रदर्शन किया। जिसके लिए उन्हें “महावीर चक्र” से सम्मानित किया गया। किसी सैनिक को दो समय वीरता सम्मान प्राप्त होना असाधारण बात होती है।
1962 के युद्ध को छोड़कर उन्होंने सभी युद्धों में भाग लिया था। उन्होंने 2/5 गोरखा राइफल्स बटालियन, 68 इंफेट्री ब्रिगेड, 8 व 26 माउंटेन डिवीजन और चंडीमंदिर में C कॉर्प्स की कमान नियंत्रण की थी तथा उन्होंने सेना मुख्यालय में सैन्य सचिव के रूप में भी कार्य किया था। वर्ष 1979 में लेफ्टिनेंट जनरल के रूप में वह सेवानिवृत्त हुए थे। 24 मई 2018 को इन अत्यधिक सुशोभित और महान सेनानायक का निधन हुआ था।
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