—— बलिदान दिवस -शौर्यनमन—–
हवलदार सेवांग रिगजिन
9923125N
30-03-1966 – 31-05-1999
वीर चक्र (मरणोपरांत)
यूनिट – लद्दाख स्काउट्स
ऑपरेशन विजय
कारगिल युद्ध 1999
हवलदार सेवांग रिगजिन का जन्म 30 मार्च 1966 को श्री ताशी मुटुप एवं श्रीमती सोनम अंगमो के परिवार में हुआ था। वह जम्मू-कश्मीर के लद्दाख क्षेत्र के जांस्कर घाटी के शंकर गांव के निवासी थे। शिक्षा पूर्ण करने के पश्चात वह भारतीय सेना की लद्दाख स्काउट्स रेजिमेंट में भर्ती हुए थे।
वर्ष 1999 तक वह हवलदार के पद पर पदोन्नत हो गए थे। कारगिल में युद्ध संभावित होने पर युद्धक कार्रवाई में, प्रथम जो बटालियन तैनात की गईं, लद्दाख स्काउट्स भी उनमें से एक थी। हवलदार सेवांग रिगजिन भी अपनी यूनिट के साथ युद्ध में सम्मिलित हो गए।
वर्ष 1998 से ही लद्दाख स्काउट्स नियंत्रण रेखा (LoC) पर तैनात थी। 12 दिसंबर 1998 को, हवलदार रिगजिन ने पॉइंट 5608 पर अवलोकन गश्त को सफल किया, जहां पिछले अनेक प्रयास विफल हो गए थे। उन्होंने खड़ी चट्टान पर चढ़ने के लिए छ: घंटे से अधिक समय तक कठिन परिश्रम किया, जिससे गश्त के अन्य सदस्यों को शीर्ष पर पहुंचने में सहायता प्राप्त हुई।
मई 1999 के आरंभ में, जब नियंत्रण रेखा पर शत्रु की घुसपैठ उजागर हुई, तो 30 मई 1999 को लद्दाख स्काउट्स के एक सेक्शन को नियंत्रण रेखा पर 18000 फीट की ऊंचाई पर हिमाच्छादित क्षेत्र में एक RIDGE LINE पर एक शत्रु स्थिति पर अधिकार करने और सीमापार से हो रही शत्रु घुसपैठ को रोकने का आदेश दिया गया। हवलदार सेवांग रिगजिन भी उस सेक्शन के सदस्य थे।
हवलदार रिगजिन का सेक्शन 80 डिग्री ढाल की हिम की भीत पर चढ़ते समय, आकस्मिक शत्रु द्वारा घात लगाकर की गई प्रभावी फायरिंग में घिर गया। अपने जीवन पर गंभीर संकट लेते हुए, हवलदार सेवांग रिगज़िन ने शत्रु से आमने-सामने के भीषण संघर्ष में स्वयं को उजागर करते हुए शत्रु पर आक्रमण किया। आकस्मिक शत्रु द्वारा सुविधाजनक स्थान से की गई फायरिंग से वह गंभीर रूप से घायल हो गए। घायल होते हुए भी वह दृढ़ निश्चय से संघर्ष करते रहे और उन्होंने शत्रु के दो सैनिकों को मार दिया। अंततः 31 मई 1999 को अपने घातक घावों से वह वीरगति को प्राप्त हो गए।
हवलदार सेवांग रिगज़िन ने कर्तव्य के प्रति असीम समर्पण प्रदर्शित किया और नियंत्रण रेखा पार की घुसपैठ को अवरूद्ध करने और शत्रु का आधिपत्य समाप्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका निर्वहन की। इस कार्रवाई में उनके असाधारण साहस, अदम्य भावना एवं सर्वोच्च बलिदान के लिए 15 अगस्त 1999 को उन्हें मरणोपरांत “वीर चक्र” से सम्मानित किया गया।
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