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Kargil storySena Medal

कारगिल युद्ध 15 जून 1999 मेजर अजय सिंह जसरोटिया

—— बलिदान दिवस -शौर्यनमन—–
मेजर अजय सिंह जसरोटिया
SS36635K
31-03-1972 – 15-6-1999
सेना मेडल (मरणोपरांत)
यूनिट – 13 जेएके राइफल्स
पॉइट 5140 का संग्राम
ऑपरेशन विजय
कारगिल युद्ध 1999
मेजर अजय सिंह का जन्म 31 मार्च 1972 को को जम्मू कश्मीर के जम्मू नगर में सीमा सुरक्षा बल के डीआईजी श्री अर्जुन सिंह जसरोटिया एवं श्रीमती बीना देवी के परिवार में हुआ था। परिवार की सैन्य परंपरा के रूप में वर्ष 1996 में, CDS परीक्षा के माध्यम से उन्हें भारतीय सेना की जम्मू एंड कश्मीर राइफल्स रेजिमेंट की 13 बटालियन में में कमीशन प्राप्त हुआ था।
वर्ष 1999 में, 13 JAK राइफल्स जम्मू-कश्मीर के सोपोर जिले में तैनात थी, किंतु कारगिल युद्ध आरंभ होने पर जून 1999 में बटालियन को 56 माउंटेन ब्रिगेड की कमान में कारगिल जिले के द्रास सेक्टर में तैनात किया गया था। 13 जून की भोर में तोलोलिंग शिखर से पीछे हटने के पश्चात शत्रु तोलोलिंग रिजलाइन के पॉइंट 5140 पर केन्द्रित हो गया था। 13 JAK राइफल्स बटालियन को पॉइंट 5140 को पुनः प्राप्त करने का कार्य दिया गया।
तोलोलिंग रिज लाइन पर यह सबसे बड़ी स्थिति थी जिसपर पाकिस्तानी सेना ने नियंत्रण कर रखा था। 56 माउंटेन ब्रिगेड के भाग के रूप में 13 जेएके राइफल्स, 18 गढ़वाल राइफल्स और 1 नागा रजिमेंट को तीन भिन्न भिन्न दिशाओं से आक्रमण के लिए भेजा गया। 13 जेएके राइफल्स टुकड़ी की कमान मेजर अजय सिंह नियंत्रित कर रहे थे।
15 जून 1999 को, मेजर अजय सिंह अपनी टुकड़ी का नेतृत्व करते हुए आगे बढ़ रहे थे कि आकस्मिक शत्रु ने तोपों से प्रचंड गोला वृष्टि आरंभ कर दी। प्रथम गोला के विस्फोट से उनके 6 सैनिक घायल हो गए थे। सैनिकों ने आड़ लेने के लिए इधर-उधर भागना आरंभ कर दिया। मेजर जसरोटिया ने स्थिति को नियंत्रित करते हुए सभी को प्रशासनिक आधार में कवर लेने का आदेश दिया।
शत्रु की भीषण गोला वृष्टि में वह अपने घायल सैनिकों को सुरक्षित निकाल कर लाने का कार्य करते रहे। उसी समय, एक गोला मेजर अजय सिंह के अति निकट आकर गिरा। उसके भयानक विस्फोट में छर्रे (SPLINTERS) लगने से वह गंभीर रूप से घायल हो गए। किंतु घायल होते हुए भी उन्होंने युद्धस्थल नहीं छोड़ा और अंततः वीरगति को प्राप्त हो गए। वह 6 सैनिकों को जीवनदान दे गए। मेजर अजय सिंह को उनके नेतृत्व, सौहार्द की भावना एवं सर्वोच्च बलिदान के लिए मरणोपरांत “सेना मेडल” से सम्मानित किया गया।

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