कर्नल मनप्रीत सिंह कीर्ति चक्र (मरणोपरांत)
भारतीय सेना के उन अनगिनत शूरवीरों में से एक नाम है कर्नल मनप्रीत सिंह का, जिन्होंने अपनी जान की बाजी लगाकर राष्ट्र की रक्षा की। जम्मू-कश्मीर के अनंतनाग जिले में 13 सितंबर 2023 को आतंकवादियों के साथ मुठभेड़ में शहीद होने वाले कर्नल मनप्रीत सिंह की कहानी साहस, त्याग और देशभक्ति की जीवंत मिसाल है।
प्रारंभिक जीवन: एक सैन्य परिवार की परंपरा

कर्नल मनप्रीत सिंह का जन्म 1982 में पंजाब के अमृतसर में हुआ था। वे भरोन्जियां गांव के निवासी थे, जो मोहाली जिले के मुल्लांपुर के निकट स्थित है। उनके परिवार में सैन्य परंपरा गहरी जड़ें रखती थी। उनके पिता, स्वर्गीय नायक लाखमीर सिंह, भारतीय सेना में सेवा दे चुके थे। दादा शीतल सिंह और चाचा रंजीत सिंह भी सेना में रहे। यह पारिवारिक पृष्ठभूमि ही थी जिसने मनप्रीत को बचपन से ही अनुशासन, कर्तव्यनिष्ठा और देशप्रेम की सीख दी।
स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद, मनप्रीत ने भारतीय सेना में अधिकारी बनने का संकल्प लिया। 2006 में वे सिख लाइट इन्फैंट्री रेजिमेंट के 12वीं बटालियन में कमीशन हुए। मात्र 24 वर्ष की आयु में सेना में प्रवेश करने वाले मनप्रीत ने जल्द ही अपनी क्षमताओं से सबको प्रभावित किया। वे न केवल शारीरिक रूप से मजबूत थे, बल्कि रणनीतिक सोच और नेतृत्व के गुणों से भी सम्पन्न थे। उनके सहयोगियों के अनुसार, मनप्रीत हमेशा “लीड फ्रॉम द फ्रंट” के सिद्धांत पर चलते थे, यानी हमेशा आगे रहकर नेतृत्व करना।
सैन्य करियर: सम्मानों और चुनौतियों से भरा सफर

कर्नल मनप्रीत सिंह का सैन्य जीवन लगभग 17 वर्षों का रहा, जिसमें उन्होंने कई महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाईं। कमीशन के बाद वे राष्ट्रीय राइफल्स (राष्ट्रीय राइफल्स) की 19वीं बटालियन में डेपुटेड हुए, जो जम्मू-कश्मीर में काउंटर-इंसर्जेंसी ऑपरेशंस के लिए तैनात रहती है। 2019 से 2021 तक वे इस बटालियन के सेकंड-इन-कमांड (2IC) रहे, और बाद में कमांडिंग ऑफिसर (CO) बने।
इस दौरान उन्होंने दक्षिणी अनंतनाग, कोकरनाग, वेरिनाग-अचाबल और ऊंचाई वाले क्षेत्रों में आतंकवादियों के खिलाफ कई सफल अभियान चलाए। इन क्षेत्रों में विदेशी आतंकवादी सक्रिय रहते हैं, और चुनौतियां अत्यंत कठिन होती हैं—घने जंगल, ऊबड़-खाबड़ इलाके और लगातार घात लगाने का खतरा। मनप्रीत की रणनीतिक कुशलता और साहस ने उन्हें 2021 में सेना मेडल (गैलेंट्री) से सम्मानित कराया। यह पुरस्कार उनके एक अभियान के दौरान दिखाए गए असाधारण साहस के लिए दिया गया था।
2021 में प्रमोशन के बाद उन्हें शांतिपूर्ण पोस्टिंग का विकल्प दिया गया, लेकिन उन्होंने तुरंत “नो सर” कहकर इनकार कर दिया। वे जानते थे कि उनकी बटालियन को उनकी जरूरत है। इस निर्णय ने उनकी देशभक्ति की गहराई को दर्शाया।
| मुख्य उपलब्धियां | विवरण |
|---|---|
| कमीशन वर्ष | 2006, सिख लाइट इन्फैंट्री (12वीं बटालियन) |
| मुख्य पोस्टिंग | 19वीं राष्ट्रीय राइफल्स, जम्मू-कश्मीर |
| पहला सम्मान | सेना मेडल (गैलेंट्री), 2021 |
| अनुभव | 5 वर्षों में कई सफल ऑपरेशन, आतंकवाद विरोधी अभियान |
| नेतृत्व भूमिका | 2019-2021: सेकंड-इन-कमांड; बाद में कमांडिंग ऑफिसर |
शहादत की गाथा: अनंतनाग में अमर बलिदान

13 सितंबर 2023 को अनंतनाग जिले के गडोल (कोकरनाग क्षेत्र) में एक संयुक्त अभियान के दौरान कर्नल मनप्रीत सिंह की शहादत हुई। खुफिया जानकारी के आधार पर सेना और जम्मू-कश्मीर पुलिस की संयुक्त टीम ने घने जंगलों में छिपे आतंकवादियों की तलाश शुरू की। कर्नल मनप्रीत अपनी 19वीं राष्ट्रीय राइफल्स बटालियन का नेतृत्व कर रहे थे।
जैसे ही टीम एक इमारत के ऊपर चढ़ी, छिपे हुए आतंकवादियों ने अंधाधुंध गोलीबारी शुरू कर दी। कर्नल मनप्रीत ने तुरंत जवाबी कार्रवाई की और एक आतंकवादी को मार गिराया। बावजूद इसके कि वे जानते थे कि बाकी आतंकवादी भागने की कोशिश कर रहे हैं, उन्होंने अपनी टीम को फौरन पुनर्गठित किया। उन्होंने सभी संभावित भागने के रास्तों को ब्लॉक करने के निर्देश दिए और खुद आगे रहकर गोलीबारी का नेतृत्व किया।
इस दौरान उन्हें माथे पर गंभीर गोली लगी। बावजूद घाव के, उन्होंने अंतिम क्षण तक अपनी टीम को निर्देशित किया। दुर्भाग्य से, वे मौके पर ही शहीद हो गए।
कीर्ति चक्र उद्धरण (आधिकारिक)

अपनी सुरक्षा की परवाह न करते हुए, कर्नल मनप्रीत सिंह, सेना मेडल ने भागते हुए आतंकवादियों पर गोली चलाई और एक को मार गिराया। असाधारण नेतृत्व दिखाते हुए उन्होंने टीम को पुनर्गठित किया और भागने के रास्तों को रोका। गोलीबारी में उन्हें माथे पर गोली लगी, लेकिन उन्होंने अंत तक लड़ाई जारी रखी। उनके साहस, नेतृत्व और साथीभाव के लिए उन्हें कीर्ति चक्र (मरणोपरांत) प्रदान किया जाता है।
यह घटना न केवल आतंकवाद के खिलाफ सेना की दृढ़ता दिखाती है, बल्कि कर्नल मनप्रीत के व्यक्तिगत साहस को भी उजागर करती है।
कीर्ति चक्र: शांति काल का सर्वोच्च सम्मान
कीर्ति चक्र भारत का दूसरा सबसे बड़ा शांति कालीन वीरता पुरस्कार है, जो महावीर चक्र का शांति कालीन समकक्ष है। यह 4 जनवरी 1952 को स्थापित किया गया था। स्वतंत्रता दिवस 2024 पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा अनुमोदित 103 वीरता पुरस्कारों में कर्नल मनप्रीत को यह सम्मान मरणोपरांत दिया गया।
यह पुरस्कार कर्नल मनप्रीत के 17 वर्षों के समर्पण का प्रमाण है। उनकी शहादत ने साबित किया कि सच्चा सैनिक कभी पीछे नहीं हटता।
व्यक्तिगत जीवन: परिवार और मूल्य
कर्नल मनप्रीत सिंह का व्यक्तिगत जीवन भी प्रेरणादायक था। वे अपनी पत्नी जगमीत कौर (जो एक स्कूल शिक्षिका हैं) और दो बच्चों—6 वर्षीय पुत्र कबीर सिंह तथा 2 वर्षीय पुत्री वाणी—के साथ नई चंडीगढ़ में रहते थे। उनकी मां, स्मत। मंजीत कौर, उनके पिता के निधन के बाद परिवार का सहारा बनीं। मनप्रीत परिवार के प्रति समर्पित थे।
विरासत
कर्नल मनप्रीत सिंह की शहादत ने न केवल जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा को मजबूत किया, बल्कि पूरे राष्ट्र को एकजुट किया। उनकी कहानी युवाओं को सेना जॉइन करने और देश सेवा के लिए प्रेरित करती है। अनंतनाग जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में सेना के अभियान जारी हैं, और मनप्रीत जैसे वीरों की याद हमें दृढ़ बनाती है।
जय हिंद! जय भारत!
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