—— बलिदान दिवस -शौर्यनमन—–
सैकिंड लेफ्टिनेंट पोलुर मुथुस्वामी रमन
04-12-1934 – 02-06-1956
अशोक चक्र (मरणोपरांत)
यूनिट – 3 सिख लाइट इंफेंट्री
आतंकवाद विरोधी अभियान
सैकिंड लेफ्टिनेंट पोलुर मुथुस्वामी रमन का जन्म ब्रिटिश भारत में, 4 दिसंबर 1934 को तमिलनाडु के उत्तर अरकोट जिले में मेजर मुथुस्वामी एवं श्रीमती सावित्री के परिवार में हुआ था। शिक्षा पूर्ण करने के पश्चात CDS परीक्षा के माध्यम से, उनका राष्ट्रीय रक्षा अकादमी (NDA) में चयन हुआ था। वर्ष 1955 में उन्हें भारतीय सेना की सिख लाइट इंफेंट्री रेजिमेंट की 3 बटालियन में सैकिंड लेफ्टिनेंट के रूप में कमीशन प्राप्त हुआ था। सैकिंड लेफ्टिनेंट रमन को उनकी प्रथम नियुक्ति में NEFA (नॉर्थ-इस्ट फ्रंटियर एजेंसी), वर्तमान पूर्वोत्तर भारत में तैनात किया गया था।
2 जून 1956 को, गोपनीय सूत्रों से, सैकिंड लेफ्टिनेंट रमन की बटालियन को नागालैंड के चेफेमा गांव में नागा उग्रवादियों की उपस्थिति से संबंधित विश्वसनीय सूचना प्राप्त हुई। स्थिति का आकलन करने के पश्चात, उन उग्रवादियों को शीघ्रातिशीघ्र बाधित के लिए त्वरित एक ऑपरेशन चलाने का निर्णय लिया गया। परिणामस्वरूप, 3 जून 1956 की प्रातः सैकिंड लेफ्टिनेंट रमन के नेतृत्व में एक आक्रमण दल ने योजनानुसार सक्रिय हुआ। सैकिंड लेफ्टिनेंट रमन और उनके सैनिक प्रातः लगभग 5 बजे संदिग्ध क्षेत्र में में पहुंचे। शीघ्र ही इस दल ने उग्रवादियों को देख लिया और चुनौती दिए जाने पर उग्रवादियों ने उन पर गोलियां चलानी आरंभ कर दी।
उग्रवादी उन्नत स्वचालित शस्त्रों से लैस थे और लाइट मशीन गन, स्टेन गन और राइफलों का प्रयोग कर रहे थे। चूंकि वहां कोहरा और अंधकार था, अतः उग्रवादियों की स्थिति सुनिश्चित करना कठिन था। किंतु आकस्मिक सैकिंड लेफ्टिनेंट रमन ने निकट की एक झोपड़ी में गतिविधि देखी और वे उसकी ओर दौड़ पड़े। इसके पश्चात उन्होंने शीघ्रता से और साहसी कार्रवाई करते हुए फायरिंग की और दो उग्रवादियों को मार दिया। इसी मध्य एक उग्रवादी ने उन पर हथगोला फेंका। सौभाग्य से वह समय रहते सुरक्षित रह गए, उन्हें क्षति नहीं हुई।
सैकिंड लेफ्टिनेंट रमन गोलियां चलाते रहे और इससे पूर्व की उग्रवादी उन्हें घेरते उन्होंने फायर कर एक अन्य अग्रवादी को और मार दिया। उन उग्रवादियों में से एक ने उनकी ओर एक और हथगोला फेंका, जो उनसे एक गज की दूरी पर विस्फोटित हुआ, जिससे उनका हेलमेट टूट गया और वे घायल हो गए। घायल होते हुए भी अविचलित वह निरंतर आक्रमण करते रहे, जिससे उग्रवादियों में भय व्याप्त हो गया। पराजय को भांपते हुए, कुछ उग्रवादी वहां से भागने लगे, किंतु सैकिंड लेफ्टिनेंट रमन उनके पीछे भागे और उन्होंने एक उग्रवादी को और मार दिया।
तत्क्षण, एक उग्रवादी अपने छिपने के स्थान से निकला और सैकिंड लेफ्टिनेंट रमन पर गोलियां चलाईं जिससे वह गंभीर रूप से घायल हो गए। इससे भी वह नहीं डिगे और उन्होंने एक अन्य उग्रवादी पर हथगोला फेंका, जिससे वह उग्रवादी मारा गया। अचेत हो कर गिरने तक वह अपने सैनिकों को आदेश देते रहे और फायर को निर्देशित करते रहे। अंततः वह वीरगति को प्राप्त हुए।
सैकिंड लेफ्टिनेंट रमन के निडर और साहसिक कार्यों ने उनके सैनिकों को प्रेरित किया। अंततः वे आतंकवादियों के ठिकाने को नष्ट करने और सौंपे गए कार्य को पूर्ण करने में सफल रहे। सैकिंड लेफ्टिनेंट रमन को उनके असाधारण साहस, अडिग नेतृत्व और सर्वोच्च बलिदान के लिए मरणोपरांत “अशोक चक्र” से सम्मानित किया गया।
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