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Ashok Chakra

अशोक चक्र नायब सूबेदार चुन्नी लाल

—— बलिदान दिवस -शौर्यनमन—–
नायब सूबेदार चुन्नी लाल
JC593527F
06-03-1968 – 24-06-2007
अशोक चक्र (मरणोपरांत) , वीर चक्र, सेना मेडल
वीरांगना – श्रीमती चिन्ता देवी
यूनिट – 8 JAKLI (सियाचिन)
आतंकवाद विरोधी अभियान
नायब सूबेदार चुन्नी लाल का जन्म 6 मार्च 1968 को जम्मू कश्मीर के डोडा जिले के भद्रवाह के भारा गांव में श्री शंकर दास एवं श्रीमती शकुंतला देवी के परिवार में हुआ था। शिक्षा पूर्ण करने के पश्चात वह भारतीय सेना की जम्मू एंड कश्मीर लाइट इंफेट्री रेजिमेंट रेजिमेंट में रंगरूट के रूप में भर्ती हुए थे। प्रारंभिक प्रशिक्षण के पश्चात उन्हें 8 जेएके एलआई बटालियन में राइफलमैन के पद पर नियुक्त किया गया था।
सेना मेडल (वीरता) ऑपरेशन राजीव 1987
जून 1987 में 8 जेएके एलआई बटालियन को ऑपरेशन मेघदूत में सियाचिन ग्लेशियर क्षेत्र में तैनात किया गया था। पाकिस्तान ने उस क्षेत्र में 6500 मीटर ऊंचाई की सर्वाधिक ऊंची चोटी पर घुसपैठ कर बलपूर्वक अधिकार कर लिया था। वहां से उन्हें निष्कासित अत्यंत कठिन किंतु अत्यावश्यक भी था। इस मिशन के लिए एक विशेष TASK FORCE का गठन किया गया। चुन्नी लाल और यूनिट के अन्य सैनिकों ने स्वेच्छा से इस मिशन में भाग लिया।
इस चोटी से घुसपैठिए भारतीय सेना पर आक्रमण करते थे। क्योंकि इस ऊंचाई से उन्हें संपूर्ण साल्टोरो रेंज और सियाचिन ग्लेशियर स्पष्ट दिखता था। शत्रु ने पाकिस्तान के संस्थापक कायद-ए-आज़म मोहम्मद अली जिन्ना के नाम पर इस पोस्ट को ‘कायद पोस्ट’ नाम दिया था।
शत्रु की यह पोस्ट दोनों ओर 457 मीटर ऊंची बर्फ की भीतों के ग्लेशियर के एक गढ़ सी थी। 26 जून 1987 को नायब सूबेदार बाना सिंह ने चुन्नी लाल और अन्य सैनिकों का अति कठिन और संकटमय मार्ग पर नेतृत्व किया। इस ऑपरेशन को इसी मिशन में 29 मई 1987 को बलिदान हुए सैकिंड लेफ्टिनेंट राजीव पांडेय (वीर चक्र) के नाम पर ऑपरेशन राजीव नाम दिया गया था। यह सभी सैनिक रस्सों से रेंगते हुए उस कठिन चढ़ाई की पोस्ट पर चढ़े और बंकरों में हथगोले फेंक कर व संगीनों से पाकिस्तानियों को मारकर वहां अधिकार कर लिया। चुन्नी लाल को इस ऑपरेशन में सेना मेडल (वीरता) से सम्मानित किया गया था।
वीर चक्र, कारगिल युद्ध
वर्ष 1999 में ऑपरेशन विजय में जम्मू और कश्मीर के पुंछ सेक्टर में पाक सेना ने घुसपैठ का प्रयास किया, उस समय चुन्नी लाल ने 12 घुसपैठियों को मारने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और शत्रु का अधिपत्य नहीं होने दिया। इस वीरता के लिए उन्हें “वीर चक्र” से सम्मानित किया गया था।
उन्होंने संयुक्त राष्ट्र शांति सेना में सोमालिया और सूडान में दो कार्यकाल पूरे किए थे। सूडान में उनके दल द्वारा अनुकरणीय साहस का प्रदर्शन करने पर वीरता के लिए UN Citation दिया गया था।
अशोक चक्र (मरणोपरांत) आतंकवाद विरोधी अभियान
24 जून 2007 को, नायब सूबेदार चुन्नी लाल जम्मू कश्मीर के कुपवाड़ा में एक पोस्ट के प्रभारी थे। यह पोस्ट 14,000 फीट की ऊंचाई पर थी जहां उस रात्रि बादलों के कारण दृश्यता सिर्फ 5 मीटर थी और तापमान माइनस 5 डिग्री था। भोर में लगभग 3:30 बजे उन्होंने नियंत्रण रेखा पर तारों की बाड़ के पार कुछ संदिग्ध गतिविधि देखी व इसका अभिज्ञान करने का निर्णय लिया। उन्होंने नियंत्रण रेखा पर अपने सैनिकों को तैनात किया। इस मध्य वहां दोनों ओर से भीषण फायरिंग आरंभ हो गई, जो एक घंटे तक चलती रही।
नायब सूबेदार चुन्नी लाल और उनके सैनिकों ने पूरे क्षेत्र को घेर लिया व भोर तक घुसपैठियों का अन्वेषण करते रहे। अंत में, नायब सूबेदार चुन्नी लाल और उनका दल जैसै ही एक घने झाड़ीदार स्थान का अन्वेषण करने पहुंचे, आकस्मिक उनपर फायरिंग हुई।
उनके सैनिक उस क्षेत्र को घेरते रहे, जहां घुसपैठिए छिपे हुए थे और उनमें से दो घुसपैठियों को वहीं पर ही मार दिया गया। इस भीषण फायरिंग मे दो सैनिक गंभीर रूप से घायल हो गए और जहां घुसपैठिए छिपे हुए थे वहीं गिर गए। अपनी व्यक्तिगत सुरक्षा की घोर उपेक्षा करते हुए नायब सूबेदार चुन्नी लाल रेंगते हुए अपने घायल सैनिकों तक पहुंचे व उन्हें खींच कर सुरक्षित स्थान पर ले आए व उनके जीवन की रक्षा की।
उनका अनुमान था कि अभी भी वहां अन्य घुसपैठिए छिपे हुए हैं, अतः उस क्षेत्र का अन्वेषण चलता रहा। उनका अनुमान सही था नायब सूबेदार चुन्नी लाल ने तीसरे घुसपैठिए को भागते देखा और उसको भी मार दिया।
दुर्भाग्य से, उस समय दोनों ओर से हुई भीषण फायरिंग में, नायब सूबेदार चुन्नीलाल को पेट पर गोलियां लगीं , जिससे उनका पेट फट गया और अत्यधिक रक्त बहने लगा। उन्होंने एक चट्टान के पीछे आड़ ले ली और फायरिंग करते हुए शेष घुसपैठियों को भागने का अवसर नहीं दिया। उनके नेतृत्व में दल के सैनिकों ने शेष दो घुसपैठियों को भी मार दिया।
नायब सूबेदार चुन्नी लाल का अत्यधिक रक्त बह चुका था। उन्हें हेलीकॉप्टर से निकटतम सैन्य चिकित्सालय पहुंचाने के प्रयास हो रहे थे, किंतु वह वीरगति को प्राप्त हो गए।
इस कार्रवाई में उन्होंने अत्यधिक वीरता व युद्ध क्षेत्र में असाधारण नेतृत्व का प्रदर्शन किया और राष्ट्र की एकता व अखंडता की रक्षा में सर्वोच्च बलिदान दिया। 15 अगस्त 2007 को उनके अदम्य साहस, वीरता एवं सौहार्द की भावना के लिए उन्हें मरणोपरांत “अशोक चक्र” से सम्मानित किया गया।
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