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Ashok Chakra

अशोक चक्र कैप्टन उम्मेद सिंह मेहरा

——-शौर्यनमन——-
कैप्टन उम्मेद सिंह मेहरा (आई सी 17696) का जन्म 21 जनवरी, 1942 को गांव जनकंडे, डाकखाना खेतीखान, जिला अल्मोड़ा, उत्तर प्रदेश में हुआ था। उनके पिता का नाम श्री कुंवर सिंह था। उन्हें 11 जून, 1967 को राजपूताना राइफल्स में कमीशन मिला।

4 जुलाई, 1971 को कैप्टन मेहरा नगालैंड के एक

गांव में तैनात थे। उन्होंने गांव के पास के घने जंगल में

पड़ाव डाले विद्रोहियों को राशन इत्यादि पहुंचाने के संदेह में एक व्यक्ति को पकड़ लिया। संदिग्ध व्यक्ति सैनिकों को विद्रोहियों के पड़ाव तक ले जाने के लिए तैयार हो गया। कैप्टन मेहरा ने बटालियन मुख्यालय को इसकी सूचना दी और विद्रोहियों के पड़ाव पर छापा मारने वाली सैनिक टुकड़ी के साथ जाने के लिए अपनी सेवाएं अर्पित कीं। विद्रोही दल की अनुमानित संख्या लगभग 30 थी और वह लाइट मशीनगन और राइफलों से लैस थे।

5 जुलाई, 1971 को 17:30 बजे सेकंड-इन-कमांड मेहरा ने 60 सैनिकों के एक दस्ते के साथ विद्रोहियों के कैम्प की तरफ कूच किया। दस्ता दुर्गम पहाड़ी क्षेत्र में 12 घंटे तक चला और बीच में लगातार होने वाली वर्षा के कारण बाढ़ ग्रस्त दो नालों को भी पार किया। 6 जुलाई को करीब 5:45 बजे विद्रोही कैम्प से 500 मीटर की दूरी पर सैनिक दस्ते को तीन टुकड़ियों में बांट दिया गया। एक टुकड़ी को रिजर्व में रखा गया तथा दो को अलग-अलग दिशाओं से एक साथ आक्रमण करने के लिए कहा गया। कैप्टन मेहरा के नेतृत्व वाली टुकड़ी जब विद्रोही खेमे से 30 मीटर की दूरी पर पहुंची तब विद्रोहियों ने उन पर गोलीबारी शुरू कर दी। कैप्टन मेहरा ने भी अपने सैनिकों को गोलीबारी का आदेश दिया और स्वयं भी स्टेन मशीन कार्बाइन से गोलाबारी करते हुए विद्रोही खेमे पर धावा बोल दिया। उन्होंने विद्रोही संतरी गोली से मार गिराया परन्तु इस हमले में स्वयं उन्हें पेट और दाहिने हाथ में गंभीर चोटें आईं। बहुत खून बहने के बावजूद वे अपने सैनिकों को विद्रोही खेमे पर धावा बोलने के लिए प्रोत्साहित करते रहे। इसी बीच दस्ते की दूसरी टुकड़ी भी विद्रोही कैंप पर आ पहुंची। दोनों टुकड़ियों की तिर्यक फायर के बीच में फंस जाने के कारण मृतकों, हथियारों, गोली बारूद और कुछ महत्वपूर्ण कागजातों को छोड़कर विद्रोही भाग खड़े हुए। गहरे जख्मों के कारण कैप्टन मेहरा वीरगति को प्राप्त हुए।

इस मुठभेड़ में कैप्टन उम्मेद सिंह मेहरा ने उत्कृष्ट वीरता और नेतृत्व का परिचय दिया। उन्हें मरणोपरांत अशोक चक्र से सम्मानित किया गया। इससे पहले उन्हें नागा हिल्स क्लास्प के साथ जनरल सर्विस मैडल 1947 मिला था।

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