हर राष्ट्र की अस्मिता और सरहदों की रक्षा उन करोड़ों पैरों की गूँज पर बनी है जो चुपचाप, बिना शोर मचाए रात में अपने ड्यूटी के लिए निकलते हैं। Subedar Major Pawan Kumar Jariyal की कहानी भी एक ऐसी ही कहानी है — हिम्मत, जिम्मेदारी, और अंतिम बलिदान की।
एक सैनिक परिवार की नींव
हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले के शाहपुर कस्बे में, जहां पहाड़ों की गोद में छोटे-छोटे गांव बसे हैं, वहां की एक साधारण-सी गली में एक ऐसा परिवार रहता था जो सेना की वर्दी से सजा हुआ था। वॉर्ड नंबर 4 के निवासी सूबेदार मेजर पवन कुमार जारियाल का जन्म 1977 में हुआ था। वह 48 साल के थे जब उन्होंने अपना सर्वोच्च बलिदान दिया। उनके पिता, गराज सिंह जारियाल, भी भारतीय सेना के रिटायर्ड हवलदार थे और उसी 25 पंजाब रेजिमेंट में सेवा दे चुके थे। यह परिवार सैन्य परंपरा का जीता-जागता उदाहरण था — जहां पिता की कहानियां बेटे को प्रेरित करती थीं, और बेटा उन कहानियों को खुद की जिंदगी से साकार कर गया। गराज सिंह आज भी कहते हैं कि बेटे का बलिदान दर्द तो देता है, लेकिन गर्व भी जगाता है।

Subedar Major Pawan Kumar Jariyal की जिंदगी शुरू से ही अनुशासन और कर्तव्य की मिसाल थी। शाहपुर के सामान्य स्कूलों से पढ़ाई पूरी करने के बाद, उन्होंने युवावस्था में ही भारतीय सेना जॉइन कर ली। 25 पंजाब रेजिमेंट में उनकी सेवा लंबी और समर्पित रही। वह न सिर्फ एक कुशल सैनिक थे, बल्कि साथियों के लिए बड़ा भाई जैसे थे। परिवार के मुताबिक, Subedar Major Pawan Kumar Jariyal हमेशा घर से दूर रहते हुए भी रोज फोन पर संपर्क में रहते। फरवरी 2025 में वे एक महीने के लिए घर आए थे — शायद आखिरी बार। रिटायरमेंट अगस्त 2025 में होने वाला था, तीन महीने ही बाकी थे। फिर भी, जब स्टेशन चुनने का मौका मिला, तो उन्होंने पूंछ सेक्टर को चुना — जहां खतरा सबसे ज्यादा था। “ड्यूटी पहले,” यही उनका मंत्र था।
पवन का परिवार उनका सबसे बड़ा सहारा था। पत्नी सुष्मा देवी, जो एक गृहिणी हैं, ने हमेशा उनका साथ दिया।
ड्यूटी पहले: पूंछ का फैसला
Subedar Major Pawan Kumar Jariyal का रिटायरमेंट अगस्त 2025 में होने वाला था। बस तीन महीने बाकी थे। सेना ने उन्हें स्टेशन चुनने का मौका दिया, लेकिन Subedar Major Pawan Kumar Jariyal ने पूंछ सेक्टर चुना — जम्मू-कश्मीर का वह इलाका, जहां तनाव और खतरा हमेशा मंडराता रहता है। उनके लिए देश की सुरक्षा पहले थी। परिवार के मुताबिक, पवन कहते थे, “जब तक मैं हूं, सरहद सुरक्षित रहेगी।”
10 मई 2025: बलिदान का दिन
10 मई 2025 की सुबह, जब पूरे देश में सामान्य दिन की शुरुआत हो रही थी, वैसे ही जम्मू-कश्मीर के पूंछ सेक्टर में सब कुछ बदल गया। सुबह करीब 7:30 बजे, पाकिस्तानी सेना की तरफ से भारी गोलीबारी शुरू हो गई। यह क्रॉस-बॉर्डर शेलिंग का हिस्सा था, जो राजौरी-पुंछ क्षेत्र में तनाव को भड़का रही थी। Subedar Major Pawan Kumar Jariyal अपनी पोस्ट पर ड्यूटी निभा रहे थे। दुश्मन की गोलाबारी में वे गंभीर रूप से घायल हो गए और शहीद हो गए। यह घटना ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान हुई, जब भारतीय सेना सीमा की रक्षा में मुस्तैद थी।Subedar Major Pawan Kumar Jariyal का बलिदान न सिर्फ उनकी रेजिमेंट के लिए, बल्कि पूरे देश के लिए एक झटका था।
शाहपुर में सन्नाटा और गर्व

शहीद की खबर जैसे ही शाहपुर पहुंची, पूरा कस्बा सन्नाटे में डूब गया। गराज सिंह के घर पर सन्नाटा छा गया, लेकिन परिवार ने हिम्मत नहीं हारी। Subedar Major Pawan Kumar Jariyal का पार्थिव शरीर जम्मू से शाहपुर लाया गया, और 11 मई 2025 को पूर्ण राज्य सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया गया। बेटे अभिषेक ने चिता को मुखाग्नि दी। नारे गूंजे — “सूबेदार मेजर पवन कुमार अमर रहे!” और “पाकिस्तान मुर्दाबाद!”
Subedar Major Pawan Kumar Jariyal की कहानी सिर्फ एक शहीद की नहीं, बल्कि उन लाखों सैनिकों की है जो बिना शिकायत के सीमा पर खड़े रहते हैं। कांगड़ा जिला, जो मेजर सोमनाथ शर्मा जैसे परम वीर चक्र विजेता का गढ़ रहा है, अब Subedar Major Pawan Kumar Jariyal जैसे वीरों से और मजबूत हो गया है। उनका बलिदान हमें याद दिलाता है कि आजादी मुफ्त नहीं मिली — यह उन पैरों की गूंज पर टिकी है जो रात के अंधेरे में भी जागते रहते हैं।
Subedar Major Pawan Kumar Jariyal
वीर पवन कुमार जारियाल अमर रहें। जय हिंद!

