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परम वीर चक्र, इंजीनियर कोर सेकंड लेफ्टिनेंट राम राघोबा राणे    

 सेकंड लेफ्टिनेंट राम राघोबा राणे

    परम वीर चक्र, इंजीनियर कोर

सेकंड लेफ्टिनेंट राम राघोबा राणे (आई सी 7244) का जन्म 26 जून, 1918 को गांव चेंदिया, उत्तरी कनारा, महाराष्ट्र में हुआ था। उनके पिता का नाम श्री आर. पी. राणे था। उन्हें 15 दिसंबर, 1947 को इंजीनियर कोर में कमीशन मिला और वे 1968 में मेजर पद से सेवानिवृत्त हुए। भारतीय सेना में 21 वर्ष की सेवा के दौरान उनके नाम का 5 बार डिस्पैचेज में उल्लेख किया गया।

18 मार्च, 1948 को भारतीय सेना ने जम्मू-कश्मीर युद्ध के दौरान दिसंबर 1947 में शत्रुओं से हारे हुए झंगर पर फिर से कब्जा कर लिया। इसके बाद उसने कबायलियों के बर्बर अत्याचारों से लोगों को बचाने के लिए नौशेरा से राजौरी की ओर बढ़ने का फैसला किया। रास्ते में चिंगास पड़ता था जो कश्मीर जाने के पुराने मुगल मार्ग पर था।

8 अप्रैल को 4 डोगरा ने राजौरी का रास्ता पकड़ा। उसने नौशेरा से 10 किलोमीटर उत्तर में बारवाली पहाड़ी पर धावा बोलकर दुश्मन को उसके मजबूत ठिकानों से खदेड़ दिया और उस पर कब्जा कर लिया। परंतु सड़क बाधाओं और सुरंगों की बहुतायत के कारण बटालियन का बारवाली से आगे बढ़ना मुश्किल हो गया। यहां तक कि बख्तरबंद गाड़ियां भी इन अवरोधों को पार न कर सकीं। इस विषम परिस्थिति में सेकंड लेफ्टिनेंट राणे के नेतृत्व में 4 डोगरा के साथ सेवारत 37 एसाल्ट फील्ड कंपनी के एक सेक्शन ने बहुत महत्वपूर्ण काम किया। 8 अप्रैल को जैसे ही सेक्शन ने सुरंग क्षेत्र को साफ करने का काम शुरू किया वैसे ही दुश्मन की मोर्टार फायर से दो खंदक खोदने वाले मारे गए और राणे समेत पांच अन्य घायल हो गए। फिर भी राणे और उनके साथियों ने शाम होने तक अपना काम पूरा कर लिया तथा रास्ते को टैंकों के आगे बढ़ने लायक बना दिया। लेकिन अभी शत्रु को इस क्षेत्र से साफ नहीं किया गया था अंतः सड़क पर आगे बढ़ना खतरनाक था। सेकंड लेफ्टिनेंट राणे ने टैंकों के लिए सुरक्षित रास्ता बनाने के लिए रात में भी काम किया। 9 अप्रैल को भी उनका इंजीनियर दल निरंतर 12 घंटे काम करता रहा और सुरंगों व मार्ग अवरोधों को हटाने में लगा रहा। जहां पर मार्ग पार करना संभव न था वहां पर उन्होंने दिक्परिवर्तन कर टैंकों के लिए दूसरा रास्ता बना दिया। सेकंड लेफ्टिनेंट राणे ने दुश्मन की तोप और मोर्टार की गोलीबारी के सामने भी अपना काम जारी रखा।

10 अप्रैल को वे प्रातः जल्दी उठकर उस मार्ग पर अवरोध को साफ करने में लग गए जिसे पिछली रात को साफ नहीं कर पाए थे। उन्होंने दो घंटों में ही पांच विशाल चीड़ के पेड़ों से अवरूद्ध, सुरंगों से घिरे और मशीन गन फायर से आवृत इस बड़े अवरोध को साफ कर दिया।

भारतीय सेना ने उस दिन 13 किलोमीटर की दूरी तय कर ली। तब उसे फिर एक दूसरा बड़ा मार्ग अवरोध मिला। इस मार्ग अवरोध की ओर आने वाले आस-पास की सभी पहाड़ी रास्तों पर शत्रु पिकेट बनाकर बैठा था तथा उस मार्ग अवरोध की ओर आने वालों की निगरानी कर रहा था। राणे एक टैंक पर सवार होकर अवरोध तक पहुंच गए और उसके नीचे बैठकर सुरंग लगाकर अवरोध को उड़ा दिया। इस प्रकार उन्होंने रात होने से पहले सड़क को साफ कर दिया। 11 अप्रैल को उन्होंने 17 घंटे लगातार काम करके चिंगास और उससे आगे का रास्ता भी खोल दिया और इस प्रकार भारतीय सेना के राजौरी मार्च को सुसाध्य करने में अहम भूमिका निभाई। इस प्रयास के कारण दुश्मन के करीब 500 सैनिक मारे गए और बहुत सारे जख्मी हुए। चिंगास और राजौरी में बेकसूर लोगों की जान बचाने में भी उन्होंने मदद की। निस्सन्देह सेकंड लेफ्टिनेंट राणे के दृढ़ संकल्प एवं अथक प्रयास के बिना भारतीय सैनिक दस्ता चिंगास के महत्वपूर्ण ठिकानों तक नहीं पहुंच सकता था। यहीं से आगे बढ़ने का रास्ता सुगम हो जाता है।

राजौरी अभियान के दौरान साहसिक प्रयास के लिए सेकंड लेफ्टिनेंट राणे को परम वीर चक्र से सम्मानित किया गया।

 

जय हिन्द जय भारत

(साभार – गूगल , पराक्रम गाथा सूचना और प्रसारण मंत्रालय भारत सरकार, विजय सोहनी, पेन टुडे, #shauryanamanfoundation)

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