Lance Naik Shanghara Singh लांस नायक शंघारा सिंह, महावीर चक्र (मरणोपरांत):
शौर्य गाथा
लांस नायक शंघारा सिंह भारतीय सेना के उन वीर सपूतों में से एक हैं, जिनका बलिदान आज भी हर भारतीय को देश के प्रति समर्पण की प्रेरणा देता है। 1971 के भारत-पाक युद्ध में, उन्होंने अदम्य साहस और अद्वितीय कर्तव्यपरायणता का प्रदर्शन करते हुए, अपनी जान न्योछावर कर दी, जिसके लिए उन्हें मरणोपरांत भारत के दूसरे सबसे बड़े सैन्य अलंकरण महावीर चक्र से सम्मानित किया गया।

प्रारंभिक जीवन और सैन्य यात्रा
लांस नायक शंघारा सिंह का जन्म 14 जनवरी, 1945 को पंजाब के अमृतसर जिले के चोला साहिब गांव में हुआ था। उनके पिता का नाम श्री नारंग सिंह था। अपनी जन्म तिथि के ठीक 18 साल बाद, यानी 14 जनवरी, 1963 को, उन्होंने भारतीय सेना की प्रतिष्ठित 2 सिक्ख रेजीमेंट में कदम रखा। उन्होंने अपनी शुरुआती सेवा में ही एक निष्ठावान और बहादुर सैनिक के रूप में अपनी पहचान बना ली थी।
1971 का भारत-पाक युद्ध और पुलकंजरी की लड़ाई

1971 में, जब भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध छिड़ा, तब 2 सिक्ख रेजीमेंट को पश्चिमी मोर्चे के अमृतसर सेक्टर में तैनात किया गया था। युद्ध शुरू होने से पहले ही, पाकिस्तानी सेना ने अंतर्राष्ट्रीय सीमा के पास स्थित सामरिक रूप से महत्वपूर्ण भारतीय गांव पुलकंजरी पर कब्जा कर लिया था। इस फीचर पर पुनः अधिकार करना भारतीय सेना के लिए अत्यंत आवश्यक था।
2 सिक्ख रेजीमेंट को इस महत्वपूर्ण लक्ष्य को हासिल करने का आदेश मिला। दुश्मन ने इस गांव को एक दुर्जेय गढ़ में बदल दिया था—गांव के चारों ओर टैंकरोधी और नररोधी सुरंगें बिछा दी गई थीं, और उनकी सुरक्षा को मशीन गन की भारी गोलाबारी से मजबूत कर दिया गया था। 17 दिसंबर, 1971 को आखिरकार आक्रमण का निर्णय लिया गया।
वीरता की पराकाष्ठा: अकेले ही दुश्मन को चुनौती

आक्रमण के समय, लांस नायक शंघारा सिंह बाएँ पक्ष में स्थित सेक्शन के द्वितीय कमान अफसर थे। जैसे ही उनका सेक्शन लक्ष्य की ओर बढ़ा, वे दुश्मन की दो मशीनगनों की घातक गोलाबारी की चपेट में आ गए और उनका आगे बढ़ना रुक गया। इस नाजुक क्षण में, शंघारा सिंह ने वह निर्णय लिया जिसने उन्हें अमर कर दिया।
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पहले बंकर पर हमला: उन्होंने अपनी जान की परवाह न करते हुए, सुरंग क्षेत्र की बाधा को पार किया और सीधे दुश्मन की पहली मशीन गन चौकी की ओर दौड़े। उन्होंने बंकर के अंदर एक हथगोला फेंककर उस मशीन गन को तुरंत नष्ट कर दिया।
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दूसरी मशीन गन पर कब्जा: इसके बाद, वे तुरंत दूसरी मशीन गन की ओर झपटे। उन्होंने लूपहोल पर से कूदकर दुश्मन पर काबू पाया और तोप छीन ली।
इसी साहसिक कार्य के दौरान, उनके पेट में दुश्मन की गोली की बौछार लगी, जिससे उन्हें गंभीर चोट आई। खून से लथपथ होने के बावजूद, उन्होंने मशीन गन पर अपनी पकड़ नहीं छोड़ी। उनका यह अप्रत्याशित और निर्भीक आक्रमण दुश्मन के लिए इतना हतोत्साहित करने वाला था कि वे आतंकित होकर भाग खड़े हुए।
इस एकल-व्यक्ति आक्रमण में, लांस नायक शंघारा सिंह ने आठ शत्रुओं को मार गिराया। उनके सर्वोच्च बलिदान ने सिक्ख सैनिकों को आगे बढ़ने और दुश्मन की चौकी को पूरी तरह से रौंद डालने का मार्ग प्रशस्त किया।
मरणोपरांत महावीर चक्र

लांस नायक शंघारा सिंह ने अपनी जान देकर भी अपनी रेजीमेंट की विजय सुनिश्चित की। उनका बलिदान व्यर्थ नहीं गया; यह उत्कृष्ट वीरता, असाधारण नेतृत्व और कर्तव्यपरायणता का वह प्रतीक बन गया, जिसके लिए उन्हें मरणोपरांत महावीर चक्र से अलंकृत किया गया।
उनकी कहानी हमें सिखाती है कि सच्चा साहस केवल लड़ना नहीं, बल्कि सबसे कठिन समय में, व्यक्तिगत सुरक्षा की परवाह किए बिना, अपने साथियों और देश के लिए आगे बढ़ना है। लांस नायक शंघारा सिंह का नाम भारतीय सेना के इतिहास में वीरता की एक सुनहरी दास्तान के रूप में सदैव दर्ज रहेगा।
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