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रानी चेनम्मा
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रानी चेनम्मा जयंती 2025: कर्नाटक की वीरांगना की अमर वीरता की कहानी

रानी चेनम्मा जयंती 2025

आज ही के दिन, 23 अक्टूबर 1778 को कर्नाटक के बेलगावी जिले के छोटे से गांव ककाती में एक ऐसी वीरांगना का जन्म हुआ, जिसने ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ हथियार उठा लिए। जी हां, हम बात कर रहे हैं रानी चेनम्मा की, जिन्हें ‘कर्नाटक की लक्ष्मीबाई’ भी कहा जाता है। उनकी जन्म जयंती पर पूरे देश में, खासकर कर्नाटक में, उन्हें श्रद्धांजलि दी जा रही है। रानी चेनम्मा का साहस और वीरता न सिर्फ कित्तूर की रियासत को बचाने की कोशिश थी, बल्कि पूरे भारत की स्वतंत्रता की पहली चिंगारी भी।

रानी चेनम्मा का प्रारंभिक जीवन

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रानी चेनम्मा का जन्म 1778 में ककाती गांव में एक सामान्य परिवार में हुआ था। बचपन से ही वे घुड़सवारी, तलवारबाजी और शस्त्र प्रशिक्षण में माहिर हो गईं। उनकी शादी कित्तूर रियासत के राजा मल्लासारजा से हुई, जो देसाई वंश के थे। शादी के बाद वे कित्तूर की रानी बन गईं। कित्तूर आज भी कर्नाटक का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जो अपनी समृद्ध संस्कृति और इतिहास के लिए जाना जाता है।

रानी चेनम्मा को एक पुत्र प्राप्त हुआ, लेकिन दुख की बात यह है कि 1824 में उनका इकलौता बेटा चल बसा। एक मां के रूप में यह दर्द सहना आसान नहीं था, लेकिन रानी ने हार नहीं मानी। उन्होंने शिवलिंगप्पा नामक एक अन्य बालक को गोद लिया और उसे अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया। यह फैसला कित्तूर की परंपराओं के अनुरूप था, लेकिन यहीं से ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी का हस्तक्षेप शुरू हो गया।

ब्रिटिश ‘हड़प नीति’ का शिकार: कित्तूर पर संकट का बादल

रानी चेनम्मा
रानी चेनम्मा

19वीं शताब्दी की शुरुआत में भारत के कई शासक ब्रिटिशों की चालाकी को समझ नहीं पा रहे थे। लेकिन रानी चेनम्मा ने साफ देख लिया था कि कंपनी की नजर कित्तूर के खजाने पर है। ब्रिटिशों ने अपनी कुख्यात डॉक्ट्रिन ऑफ लैप्स (हड़प नीति) के तहत गोद लिए गए शिवलिंगप्पा को वारिस मानने से इनकार कर दिया। हालांकि यह नीति औपचारिक रूप से बाद में लागू हुई, लेकिन 1824 में ही कंपनी ने कित्तूर पर कब्जे की कोशिश शुरू कर दी।

रानी ने ब्रिटिश बॉम्बे प्रेसिडेंसी के लेफ्टिनेंट गवर्नर लॉर्ड एलफिंस्टन को पत्र लिखकर अपील की कि हड़प नीति न लागू की जाए। लेकिन अंग्रेजों ने उनकी गुहार को ठुकरा दिया। नतीजा? कित्तूर का खजाना, जो करीब 15 लाख रुपये का था, लूटने की साजिश रच ली गई। शिवलिंगप्पा को निर्वासित करने का आदेश भी जारी हो गया। रानी चेनम्मा ने साफ कह दिया – “हम झुकेंगे नहीं!”

कित्तूर युद्ध: रानी चेनम्मा की बहादुरी की पहली झलक

रानी चेनम्मा
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अक्टूबर 1824 में ब्रिटिशों ने 20,000 सिपाहियों और 400 तोपों के साथ कित्तूर पर हमला बोल दिया। संख्या में भारी पड़ने के बावजूद रानी चेनम्मा ने अपनी छोटी लेकिन निडर सेना के साथ डटकर मुकाबला किया। पहली लड़ाई में ही ब्रिटिशों को करारी हार मिली।

– कलेक्टर सेंट जॉन ठाकरे की मौत: रानी के वफादार सहयोगी अमातूर बेलप्पा ने ठाकरे को मार गिराया।
– दो ब्रिटिश अधिकारी बंधक ,सर वॉल्टर एलियट और स्टीवेंसन को कैद कर लिया गया।
– ब्रिटिश सेना को भारी नुकसान: कई सैनिक मारे गए, और कित्तूर की सेना ने दुश्मन को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया।

अंग्रेजों ने संधि का वादा किया कि अब युद्ध नहीं होगा। रानी ने विश्वास जताया और बंधकों को रिहा कर दिया। लेकिन धोखेबाज ब्रिटिशों ने फिर से हमला कर दिया! इस बार चैपलिन के नेतृत्व में और मजबूत सेना आई। सर थॉमस मुनरो का भतीजा और सोलापुर का सब-कलेक्टर मुनरो भी मारा गया।

रानी चेनम्मा ने अपने साहसी साथियों संगोल्ली रयन्ना और गुरुसिदप्पा के साथ कंधे से कंधा मिलाकर लड़ीं। लेकिन संख्या के आधिक्य के कारण अंत में हार हुई। रानी को बेलहोंगल किले में कैद कर लिया गया, जहां 21 फरवरी 1829 को उन्होंने अंतिम सांस ली।

रानी चेनम्मा की विरासत: स्वतंत्रता संग्राम की पहली शहीद

रानी चेनम्मा
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हालांकि आखिरी जंग में हार मिली, लेकिन रानी चेनम्मा की वीरता आज भी प्रेरणा स्रोत है। वे भारत की पहली शासिका थीं जिन्होंने ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ सशस्त्र विद्रोह किया। उनकी कहानी झांसी की रानी लक्ष्मीबाई से मिलती-जुलती है, इसलिए उन्हें ‘कर्नाटक की लक्ष्मीबाई‘ कहा जाता है।

कित्तूर का पतन चाटुकारों की दोस्ती और शिवलिंग रुद्रसर्ज की गलत सलाह से शुरू हुआ था, लेकिन रानी ने इसे रोकने की पूरी कोशिश की। आज कर्नाटक सरकार उनकी समाधि की देखभाल करती है, जो एक शांतिपूर्ण पार्क में स्थित है। हर साल 22 से 24 अक्टूबर तक कित्तूर उत्सव मनाया जाता है, जहां उनकी पहली जीत का जश्न होता है। यह उत्सव न सिर्फ इतिहास को जीवंत करता है, बल्कि युवाओं को देशभक्ति की सीख भी देता है।

रानी चेनम्मा को कोटि-कोटि नमन

रानी चेनम्मा जयंती पर हम उनकी बहादुरी को सलाम करते हैं। वे साबित करती हैं कि साहस की कोई सीमा नहीं होती। अगर आप कर्नाटक घूमने जा रहे हैं, तो कित्तूर जरूर जाएं – वहां की हवा में आज भी वीरता की खुशबू है। रानी चेनम्मा जयंती 2025 हमें याद दिलाती है कि स्वतंत्रता की लड़ाई में महिलाओं का योगदान कितना महत्वपूर्ण था।

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