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Veer Chakra

वीर चक्र लांस नायक बल बहादुर थापा

—— बलिदान दिवस -शौर्यनमन—–
लांस नायक बल बहादुर थापा
5748878H
24-07-1959 – 19-06-1989
वीर चक्र (मरणोपरांत)
यूनिट – 7/8 गोरखा राइफल्स
ऑपरेशन पवन (श्रीलंका)
लांस नायक बल बहादुर थापा का जन्म 24 जुलाई 1959 को नेपाल के लुम्बिनी जिले के भटुके गाँव में श्री हेमन सिंह थापा के घर में हुआ था। शिक्षा पूर्ण करने के पश्चात 15 जून 1979 को वह भारतीय सेना की 8 गोरखा राइफल्स रेजिमेंट में रंगरूट के रूप में भर्ती हुए थे। प्रारंभिक प्रशिक्षण के पश्चात उन्हें 7/8 गोरखा बटालियन में नियुक्त किया गया था। अपनी बटालियन में उन्होंने विभिन्न परिचालन परिस्थितियों और क्षेत्रों में सेवाएं दी और अनेक अभियानों में भाग लिया। वर्ष 1988-89 में, उनकी बटालियन को भारतीय शांति सेना के एक भाग के रूप में ऑपरेशन पवन में श्रीलंका भेजा गया था।
लांस नायक बल बहादुर थापा ने श्रीलंका में सेवा करते हुए स्वेच्छा से एक गश्ती दल के स्काउट के रूप में कार्य किया। 19 जून 1989 को रासा वीथी पर गश्त के समय उन्होंने तीन युवकों को संदिग्ध ढ़ंग से एक बाड़ लांघते हुए देखा। सदैव सतर्क रहने वाले लांस नायक थापा ने उन्हें पकड़ने के लिए उनका पीछा करना आरंभ कर दिया। यह देखकर कि उन्हें देख लिया गया है, संदिग्ध उग्रवादी बाड़ को पार कर गए और भिन्न-भिन्न दिशाओं में भागने लगे।
उग्रवादियों को पकड़ने के लिए दृढ़ संकल्पित, लांस नायक थापा ने उनमें से एक का तीव्रता से पीछा किया। लांस नायक थापा को निकट से पीछा करते देखकर, उस उग्रवादी ने हथगोला फेंक कर रक्षण का प्रयास किया और वह हथगोला लांस नायक थापा के समक्ष फट गया। हथगोले के विस्फोट से अभीत लांस नायक थापा उस उग्रवादी का पीछा करते रहे। वह उग्रवादी अब एक अन्य उग्रवादी से जुड़ गया था। उग्रवादियों ने एके-47 राइफलों से लांस नायक थापा पर आक्रमण किया और प्रचंड स्वचालित फायरिंग की।
उग्रवादियों की फायरिंग से अविचलित, लांस नायक थापा ने अपने राइफल फायर से प्रत्युत्तर दिया और तत्क्षण एक उग्रवादी को मार दिया। किंतु, प्रत्युत्तर की फायरिंग में लांस नायक थापा गंभीर रूप से घायल हो गए और अंततः वीरगति को प्राप्त हुए। मृत लिट्टे उग्रवादी से दो साइनाइड कैप्सूल, आपत्तिजनक सामग्री वाले दो माइक्रो कैसेट और श्रीलंकाई मुद्रा में 3,14,663 रुपए प्राप्त हुए।
इस प्रकार, लांस नायक बल बहादुर थापा ने अपनी व्यक्तिगत सुरक्षा की पूर्ण रूप से अवहेलना करते हुए लिट्टे उग्रवादियों के समक्ष विशिष्ट साहस, शौर्य और वीरता का परिचय दिया। 26 जनवरी 1991 को उन्हें मरणोपरांत “वीर चक्र” से सम्मानित किया गया।

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