मोहम्मद इम्तियाज mohammad imtiyaz
बिहार के सरन जिले के छोटे से गांव नारायणपुर में 12 मई 2025 का दिन गम और गर्व लेकर आया। सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) के सब-इंस्पेक्टर मोहम्मद इम्तियाज , जो इस गांव के सपूत थे, की पार्थिव देह जब उनके पैतृक गांव पहुंची, तो हजारों लोगों की आंखें नम थीं, और दिलों में उनके प्रति सम्मान की लौ जल रही थी। जम्मू-कश्मीर के आरएस पुरा सेक्टर में पाकिस्तान की ओर से की गई गोलीबारी में शहीद हुए इम्तियाज ने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान अपनी जान की बाजी लगाकर देश की रक्षा की। उनकी यह शहादत न केवल उनके परिवार और गांव के लिए, बल्कि पूरे देश के लिए एक ऐसी कहानी है, जो साहस, बलिदान और देशभक्ति की मिसाल बन गई।
मोहम्मद इम्तियाज mohammad imtiyaz
56 वर्षीय मोहम्मद इम्तियाज का जन्म सरन जिले के गड़खा थाना क्षेत्र के नारायणपुर गांव में हुआ था। एक साधारण परिवार से ताल्लुक रखने वाले इम्तियाज का जीवन देशसेवा के प्रति समर्पण का जीता-जागता उदाहरण था। बचपन से ही उनके मन में देश की रक्षा करने का जज्बा था। गांव के लोग बताते हैं कि इम्तियाज न केवल एक मेहनती और अनुशासित व्यक्ति थे, बल्कि एक प्रेरणास्रोत भी थे, जिन्होंने गांव के कई युवाओं को सेना और अर्धसैनिक बलों में शामिल होने के लिए प्रोत्साहित किया।
mohammad-imtiyaz का छोटा भाई, मोहम्मद असलम, जो स्वयं बीएसएफ में सब-इंस्पेक्टर है, उनके साथ कई बार सीमा पर तैनात रहा। दोनों भाइयों ने बांग्लादेश और मेघालय जैसे संवेदनशील सीमावर्ती क्षेत्रों में एक साथ सेवा की। इम्तियाज की मेहनत और लगन ने उन्हें बीएसएफ में एक सम्मानित स्थान दिलाया। उनकी वर्दी उनके लिए सिर्फ एक कपड़ा नहीं, बल्कि उनके कर्तव्य और देश के प्रति उनकी प्रतिबद्धता का प्रतीक थी।
नारायणपुर में उनका घर, जिसे उन्होंने और उनके भाई असलम ने मिलकर बनाया और ‘सीमा प्रहरी निवास’ का नाम दिया, आज भी उनकी देशभक्ति की कहानी कहता है। हर साल ईद और अन्य त्योहारों पर इम्तियाज अपने गांव लौटते थे। मार्च 2025 में अपनी आखिरी छुट्टी के दौरान, जब वे ईद मनाने घर आए थे, तब भी उन्होंने गांव के बच्चों और युवाओं के साथ समय बिताया, उन्हें पढ़ाई और देशसेवा के लिए प्रेरित किया। उस समय किसी को नहीं पता था कि यह उनकी आखिरी मुलाकात होगी।
ऑपरेशन सिंदूर
ऑपरेशन सिंदूर भारत की सीमाओं को सुरक्षित रखने और घुसपैठ को रोकने के लिए शुरू किया गया एक महत्वपूर्ण अभियान था। जम्मू-कश्मीर का आरएस पुरा सेक्टर, जहां मोहम्मद इम्तियाज तैनात थे, अंतरराष्ट्रीय सीमा पर स्थित एक अत्यंत संवेदनशील क्षेत्र है। यह इलाका अक्सर सीमा पार से गोलीबारी और तनाव का गवाह बनता है। इम्तियाज और उनकी बीएसएफ की टुकड़ी इस क्षेत्र में न केवल सीमा की सुरक्षा कर रही थी, बल्कि स्थानीय लोगों के लिए भी एक ढाल की तरह थी।
10 मई 2025 की देर शाम, पाकिस्तान की ओर से अचानक भारी गोलीबारी शुरू हुई। यह हमला इतना तीव्र था कि बीएसएफ की चौकियों पर तैनात जवानों को तुरंत मोर्चा संभालना पड़ा। मोहम्मद इम्तियाज, जो अपनी चौकी पर पूरी मुस्तैदी के साथ डटे थे, ने इस हमले का डटकर मुकाबला किया। लेकिन इस गोलीबारी में वे गंभीर रूप से घायल हो गए। उनकी हालत नाजुक थी, और तमाम कोशिशों के बावजूद उन्हें बचाया नहीं जा सका। mohammad-imtiyaz ने अपनी अंतिम सांस तक अपने कर्तव्य का पालन किया और देश के लिए शहादत दी।
शहादत की खबर: गांव में मातम, देश में गर्व

जब मोहम्मद इम्तियाज की शहादत की खबर नारायणपुर पहुंची, तो पूरे गांव में सन्नाटा छा गया। उनके परिवार, जिसमें उनकी पत्नी, दो बेटे, और बेटियां शामिल हैं, के लिए यह एक असहनीय क्षति थी। उनके भाई असलम, जो स्वयं बीएसएफ में हैं, ने इस दुख को सहन करने की हिम्मत दिखाई। उन्होंने कहा, “मेरे भाई ने देश के लिए अपनी जान दी। हमें दुख है, लेकिन गर्व भी है कि उनकी शहादत व्यर्थ नहीं जाएगी।”
12 मई 2025 को जब इम्तियाज की पार्थिव देह उनके गांव लाई गई, तो हजारों लोग उन्हें अंतिम विदाई देने के लिए उमड़ पड़े। गांव के बुजुर्गों ने उनकी सादगी और देशभक्ति की मिसाल दी, जबकि युवाओं ने उनके जीवन से प्रेरणा लेने की बात कही। स्थानीय प्रशासन और बीएसएफ के अधिकारियों ने भी उनके बलिदान को सलाम किया। उनके अंतिम संस्कार में शामिल हर व्यक्ति की आंखों में आंसू थे, लेकिन दिल में यह गर्व भी था कि उनका सपूत देश के लिए शहीद हुआ।
एक शहीद की अमर कहानी

मोहम्मद इम्तियाज की शहादत केवल उनके परिवार या नारायणपुर गांव की कहानी नहीं है। यह हर उस भारतीय की कहानी है, जो अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति देता है। उनकी वीरता हमें याद दिलाती है कि हमारी आजादी और सुरक्षा उन अनगिनत सैनिकों के बलिदान का परिणाम है, जो दिन-रात सीमाओं पर हमारी हिफाजत के लिए खड़े रहते हैं।
इम्तियाज की जिंदगी और उनकी शहादत नारायणपुर के युवाओं के लिए एक प्रेरणा है। उनका ‘सीमा प्रहरी निवास’ अब केवल एक घर नहीं, बल्कि देशभक्ति और बलिदान का प्रतीक है। उनकी स्मृति में हमें यह संकल्प लेना चाहिए कि हम उनके बलिदान को कभी नहीं भूलेंगे। हमें उनके जैसे वीरों के सपनों को साकार करने के लिए अपने देश की सेवा और सम्मान में योगदान देना होगा।
देश के लिए एक संदेश
मोहम्मद इम्तियाज की शहादत हमें यह सिखाती है कि देश की रक्षा केवल सैनिकों का कर्तव्य नहीं है। हम सभी को अपने स्तर पर देश के लिए कुछ न कुछ करना होगा। चाहे वह समाज में एकता को बढ़ावा देना हो, युवाओं को प्रेरित करना हो, या देश की प्रगति में योगदान देना हो। इम्तियाज जैसे शहीदों की कहानियां हमें यह सिखाती हैं कि देशभक्ति केवल शब्दों में नहीं, बल्कि कर्मों में होनी चाहिए।
शहीद मोहम्मद इम्तियाज अमर रहें! उनकी शहादत हमें हमेशा प्रेरित करती रहेगी।

