शौर्य को नमन
आई सी 11212 – मेजर बलजीत सिंह रंधावा, महावीर चक्र (मरणोपरांत)
11 नवंबर, 1934 को पंजाब के अमृतसर जिले के गांव ईसापुर में जन्मे मेजर बलजीत सिंह रंधावा एक सच्चे वीर थे। उनके पिता सरदार श्री आर.एस. रंधावा ने उन्हें देश सेवा की भावना दी, जो उनके जीवन का आधार बनी। कॉलेज के दिनों में वे एनसीसी के बेहतरीन कैडेट रहे और 14 दिसंबर, 1958 को राजपूत रेजिमेंट में कमीशन प्राप्त किया। मेजर रंधावा ने 1960 में मिस्र में ऑपरेशन ‘शांति’ और 1961 में गोवा में ऑपरेशन ‘विजय’ में हिस्सा लिया, जहां उनकी बहादुरी की पहचान होने लगी।
मई 1965 में 4 राजपूत को जम्मू-कश्मीर के कारगिल सेक्टर में तैनात किया गया। एक सुबह पाकिस्तानी छापामारों ने सेना के समर्थन से अचानक हमला बोलकर एक भारतीय चौकी पर कब्जा कर लिया। भारत ने इसे चुनौती के रूप में लिया। 4 राजपूत को न केवल अपनी चौकी वापस लेने, बल्कि उस क्षेत्र की सभी पाकिस्तानी चौकियों पर कब्जा करने का आदेश मिला, ताकि दुश्मन दोबारा ऐसा दुस्साहस न कर सके। ये चौकियाँ पहाड़ियों की चोटियों पर थीं, जहां से कारगिल घाटी और भारतीय रक्षा चौकियों पर नजर रखी जाती थी। दुश्मन के पास मशीन गन, 3 इंच के मोर्टार और बड़ी संख्या में सैनिक थे। वहां तक पहुंचना आसान नहीं था – खड़ी चढ़ाइयाँ, प्रपाती ढलानें और उबड़-खाबड़ रास्ते हर कदम पर चुनौती खड़ी करते थे।
17 मई, 1965 की सुबह 2 बजे, शून्य से नीचे तापमान और तेज हवाओं के बीच 4 राजपूत ने दोतरफा हमला शुरू किया। मेजर रंधावा ने अपनी कंपनी के साथ एक ओर से आक्रमण का नेतृत्व किया। दुश्मन ने ऊंचाई से मोर्टार, लाइट मशीन गन और छोटे हथियारों से भारी गोलीबारी शुरू की। लेकिन मेजर रंधावा ने अपनी जान की परवाह नहीं की। वे अपनी कंपनी को आगे बढ़ाते रहे और आखिरकार कुछ चुनिंदा सैनिकों के साथ दुश्मन के एक ठिकाने को नेस्तनाबूद कर महत्वपूर्ण चोटी पर कब्जा कर लिया।
लेकिन लड़ाई यहीं खत्म नहीं हुई। एक लाइट मशीन गन चौकी ने उनकी कंपनी को आगे बढ़ने से रोका। मेजर रंधावा ने खुद उस चौकी पर हमले की कमान संभाली। इस दौरान उन्हें गोली लगी और वे घायल हो गए। फिर भी, उन्होंने हार नहीं मानी। जमीन पर गिरे हुए भी वे अपने सैनिकों को आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करते रहे। उन्होंने अपने जवानों को रुकने नहीं दिया, ताकि मिशन में देरी न हो। अंततः, अपने लक्ष्य को पूरा करते हुए उन्होंने देश के लिए अपनी जान न्यौछावर कर दी।
अपने अदम्य साहस, दृढ़ संकल्प और असाधारण नेतृत्व के लिए मेजर बलजीत सिंह रंधावा को मरणोपरांत महावीर चक्र से सम्मानित किया गया। उनकी शहादत हर भारतीय के लिए प्रेरणा है।
जय हिंद!
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