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Maha Veer Chakra

महावीर चक्र हवलदार चूनाराम फगेड़िया

—— शौर्य दिवस -शौर्यनमन—–
हवलदार चूनाराम फगेड़िया
29-12-1923 – 30-05-1995
महावीर चक्र
यूनिट – 2 राजपुताना राइफल्स
भारत-पाक युद्ध 1947-48
हवलदार चूनाराम का जन्म ब्रिटिश भारत में 29 दिसंबर 1923 को वर्तमान राजस्थान के सीकर जिले की लक्षमणगढ़ तहसील के डालमास की ढाणी गांव में श्री बीरूराम फगेड़िया एवं श्रीमती किसनी देवी के परिवार में हुआ था। बाल्यकाल से ही वह मल्लयुद्ध में रूचि रखते थे। 29 दिसंबर 1940 को वह ब्रिटिश-भारतीय सेना की राजपुताना राइफल्स रेजिमेंट में रंगरूट के रूप में भर्ती हुए थे। प्रारंभिक प्रशिक्षण के पश्चात उन्हें 2 राजरिफ बटालियन में राइफलमैन के पद पर नियुक्त किया गया था।
स्वतंत्रता के पश्चात कश्मीर पर पाकिस्तान के कबाइली आक्रमण में भारतीय सेनाएं पुंछ-राजौरी की ओर बढ़ रही थी। कुछ पहाड़ियोंं पर शत्रु का अधिकार था और इन पहाड़ियों से राजौरी-थाना मंडी सड़क का अवलोकन किया जा सकता था। शत्रु वहां से प्रभावी गोला वृष्टि कर रहा था। 15 जून 1948 को 2 राजपुताना राइफल्स की एक रिजर्व कंपनी को उन पहाड़ियों से शत्रु को निष्कासित करने का आदेश दिया गया।
कंपनी के एक प्लाटून के कमांडर हवलदार चूनाराम को पॉइंट 5460 से फायरिंग कर रही शत्रु की मशीनगन पोस्ट को शांत करने का कार्य दिया गया। हवलदार चूनाराम अपनी प्लाटून के दो सेक्शन के साथ आगे बढ़े। जब वे अपने लक्ष्य के निकट पहुंचे, तो शत्रु ने उन पर हथगोले फेंके व अंधाधुंध गोलियां चलाईं, किंतु, यह विस्फोट भी अभीत हवलदार चूनाराम का मार्ग नहीं रोक पाए।
“राजा रामचंद्र की जय” का सिंहनाद करते हुए उन्होंने स्टेन गन से शत्रु की मशीन गन पोस्ट पर प्रचंड आक्रमण किया। उन्होंने दो शत्रु सैनिकों को मार दिया, तीन को घायल कर दिया व भयानक फायरिंग कर रही शत्रु की मशीनगन को शांत कर दिया। इस साहसिक कार्रवाई में हवलदार चूनाराम गंभीर रूप से घायल हो गए। उनके घावों से अत्यधिक रक्त बह रहा था। वह अचेत हो कर वहीं गिर गए। अंतत: उनकी प्लाटून ने उस पोस्ट पर अधिकार कर लिया। उन्हें उपचार के लिए भेजा गया। सौभाग्य से उनका जीवन सुरक्षित रह गया।
हवलदार चूनाराम को शत्रु के समक्ष अति उच्च कोटि के नेतृत्व, अदम्य साहस और वीरता प्रदर्शन के लिए “महावीर चक्र” से सम्मानित किया गया।
29 दिसंबर 1968 को सूबेदार के रूप में वह सेवानिवृत्त हुए थे। सेना के रिकॉर्ड में उन्हें “अजेय चूनाराम” लिखा गया। 30 मई 1995 को गांव में उनका निधन हुआ था।
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