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Kirti Chakra

Lieutenant Sushil Khajuria लेफ्टिनेंट सुशील खजूरिया कीर्ति चक्र

जम्मू-कश्मीर की ऊंचाइयों पर अमर बलिदान की गाथा

आज, 27 सितंबर 2025 को, हम फिर से एक ऐसे वीर सपूत को याद करते हैं, जिन्होंने अपनी जान की परवाह किए बिना मातृभूमि की रक्षा की। लेफ्टिनेंट सुशील खजूरिया, 18 ग्रेनेडियर्स के इस जांबाज़ सैनिक ने 27 सितंबर 2011 को जम्मू-कश्मीर के कुपवाड़ा जिले में पाकिस्तानी आतंकवादियों से लोहा लेते हुए अपना सर्वोच्च बलिदान दिया। उनकी उम्र उस वक्त महज 26 साल थी। यह कहानी न सिर्फ उनके साहस की है, बल्कि एक सच्चे सैनिक की निष्ठा, भाईचारे और त्याग की भी, जो आज भी हमें प्रेरित करती है।

सुशील का प्रारंभिक जीवन: साधारण से असाधारण तक का सफर

लेफ्टिनेंट सुशील खजूरिया का जन्म 28 अगस्त 1985 को जम्मू-कश्मीर के सांबा जिले के संग्रवाली गांव में एक साधारण परिवार में हुआ। उनके पिता एक छोटे से किसान थे, और माता गृहिणी थीं। सुशील अपने माता-पिता की दूसरी संतान थे, उनके एक बड़े भाई मेजर अनिल कुमार खजूरिया (जो बाद में सेना में शामिल हुए) और एक छोटी बहन भी थीं। पढ़ाई में तेज़ सुशील ने जम्मू के एक स्थानीय स्कूल से 12वीं तक शिक्षा प्राप्त की और फिर इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल की।

सुशील का सपना इंजीनियरिंग में करियर बनाने का था, लेकिन देश सेवा का जुनून उनके दिल में था। 2009 में उन्होंने सेना में शामिल होने का फैसला किया और चेन्नई स्थित ऑफिसर्स ट्रेनिंग अकादमी (OTA) में दाखिला लिया। 14 अप्रैल 2010 को वे आर्मी सर्विस कोर (ASC) में कमीशन हुए। हालांकि, जल्द ही उन्हें 18 ग्रेनेडियर्स यूनिट में डेपुटेशन पर भेजा गया, जो उस समय जम्मू-कश्मीर में आतंकवादियों से निपटने के लिए तैनात थी। यह यूनिट कारगिल युद्ध में परम वीर चक्र जीत चुकी थी, और सुशील इसके लिए गर्व महसूस करते थे।

शहादत का दिन: 27 सितंबर 2011


सुशील की शहादत की कहानी 26 सितंबर 2011 की रात से शुरू होती है। जम्मू-कश्मीर पुलिस को खुफिया जानकारी मिली कि 5-6 हथियारबंद पाकिस्तानी आतंकवादी नियंत्रण रेखा (LoC) पार कर घुसपैठ की कोशिश कर रहे हैं। यह इलाका कुपवाड़ा जिले के मिलियाल जंगलों में शमसबारी पर्वत श्रृंखला का हिस्सा था, जहां ऊंची चोटियां, घने जंगल और तेज ढलान हर मिशन को चुनौतीपूर्ण बनाते थे। 18 ग्रेनेडियर्स की एक टीम, जिसमें सुशील घाटक प्लाटून कमांडर के रूप में शामिल थे, को स्पेशल ऑपरेशंस ग्रुप (SOG) के पुलिसकर्मियों के साथ तैनात किया गया।

27 सितंबर की सुबह करीब 10:30 बजे, ऑपरेशन अपने चरम पर था। हवलदार रवि कुमार, जो अग्रिम पंक्ति में स्काउटिंग कर रहे थे, को आतंकवादियों ने अचानक गोली मार दी। वे गंभीर रूप से घायल हो गए और दुश्मन की भारी गोलीबारी के बीच फंस गए। आतंकवादी एक बड़े पत्थर के पीछे छिपे थे, जो उन्हें फायदा दे रहा था। सुशील ने तुरंत फैसला लिया। उन्होंने अपनी टीम को कवरिंग फायर देने का आदेश दिया और खुद घने झाड़ियों से रेंगते हुए दुश्मन की ओर बढ़े।

उन्होंने एक फ्लैंकिंग पोजीशन लेते हुए दो आतंकवादियों को निशाना बनाया और उन्हें मार गिराया। फिर, अपनी जान की परवाह किए बिना, वे घायल हवलदार रवि कुमार को बचाने के लिए दौड़े। उन्होंने रवि को कंधे पर लादा और सुरक्षित स्थान की ओर बढ़े, लेकिन तीसरे आतंकी की गोली उनके सीने में लगी। सुशील ने अंतिम सांस तक लड़ाई लड़ी, लेकिन वे शहीद हो गए। इस ऑपरेशन में कुल तीन आतंकवादी मारे गए, और घुसपैठ की कोशिश नाकाम हुई। यह पांच दिनों तक चली मुठभेड़ का हिस्सा था, जिसमें सुशील का बलिदान निर्णायक साबित हुआ।

परिवार और समाज पर असर

सुशील की शहादत ने उनके परिवार को गहरा आघात पहुंचाया। उनकी मां ने बताया कि उनकी शादी अगले साल तय थी, और वे घर आने की बात कर रहे थे। उनके बड़े भाई मेजर अनिल कुमार खजूरिया ने सेना में शामिल होकर भाई की विरासत को आगे बढ़ाया। परिवार को सरकार की ओर से आर्थिक सहायता और नौकरी दी गई, लेकिन सुशील का नुकसान कभी पूरा नहीं हो सकता।

संग्रवाली गांव में उनके सम्मान में **लेफ्टिनेंट सुशील खजूरिया मेमोरियल पार्क** बनाया गया, जहां स्थानीय लोग उनकी याद में इकट्ठा होते हैं। 2021 में उनकी 10वीं शहादत वर्षगांठ पर एक स्थानीय स्कूल का नाम उनके नाम पर रखा गया। उनके भाई-बहन ने एक अनोखी पहल की – उन्होंने एक कस्टम जावा पेराक मोटरसाइकिल बनवाई, जिस पर सुशील की तस्वीरें और उनकी शहादत की कहानी उकेरी गई। यह न सिर्फ एक स्मारक है, बल्कि उनकी याद को जीवित रखने का प्रयास भी।

सम्मान: कीर्ति चक्र से अमर नाम


सुशील की वीरता को देश ने सिर झुकाकर स्वीकार किया। 26 जनवरी 2012 को उन्हें मरणोपरांत **कीर्ति चक्र** से सम्मानित किया गया, जो शांति काल में दूसरा सबसे बड़ा वीरता पुरस्कार है। यह पुरस्कार उनके परिवार को राष्ट्रपति द्वारा प्रदान किया गया। 18 ग्रेनेडियर्स यूनिट आज भी सुशील को अपनी शान मानती है, और उनकी कहानी नई पीढ़ी के सैनिकों को प्रेरित करती है।

आज का महत्व

27 सितंबर 2025 को, जब हम सुशील को याद करते हैं, यह सिर्फ एक तारीख नहीं, बल्कि एक संकल्प है। आज भी जम्मू-कश्मीर और अन्य सीमावर्ती इलाकों में हमारे जवान हर दिन अपनी जान जोखिम में डालते हैं। सुशील की कहानी हमें सिखाती है कि सच्ची वीरता स्वार्थ से ऊपर होती है। उन्होंने अपने साथी की जान बचाने के लिए अपनी जान दी, और यह बलिदान हर भारतीय के लिए गर्व का विषय है।

जय हिंद! जय भारत! लेफ्टिनेंट सुशील खजूरिया को कोटि-कोटि नमन। उनकी आत्मा को शांति मिले। आप भी उनके बलिदान को नमन करें और कमेंट में अपनी भावनाएं साझा करें। क्या हम अपने शहीदों के लिए और बेहतर कर सकते हैं?

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