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कारगिल का वो शेर: नायक दीपचंद – गोला-बारूद की भूख और देश की रक्षा का जुनून

हरियाणा की मिट्टी में जन्मा एक ऐसा योद्धा, जिसने 1999 के कारगिल युद्ध में अपने दोनों पैर और एक हाथ खो दिए, लेकिन हौसला? वो आज भी आसमान छूता है। हिसार के पाबड़ा गांव के नायक दीपचंद की शौर्यगाथा ऐसी है कि इसे सुनते ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं और सीना गर्व से चौड़ा। कारगिल विजय दिवस के मौके पर जब देश अपने शहीदों को याद करता है, तब दीपचंद जैसे जिंदा जांबाजों की कहानी हमें बताती है कि वीरता सिर्फ किताबों में नहीं, बल्कि हमारे बीच सांस लेती है।

जंग का मैदान और दीपचंद का जज्बा

1999 की सर्दियां, कारगिल की बर्फीली चोटियां, और दुश्मन की गोलियां। भारत-पाकिस्तान के बीच छिड़ी उस जंग में दीपचंद मिसाइल रेजिमेंट के एक गनर थे। वो बताते हैं, “जब हमें युद्ध के लिए मूव करने का ऑर्डर मिला, हमारी खुशी का ठिकाना नहीं था। पहला गोला मेरी गन चार्ली-2 से निकला और वो सीधे निशाने पर लगा।” उस एक पल में शुरू हुई उनकी बटालियन की वो कहानी, जिसमें 10 हजार राउंड फायर किए गए और 8 बार गन पोजीशन बदली गई। कंधों पर तोप उठाकर चलते थे ये जांबाज, ठंड में कपड़ों की परवाह नहीं, बस एक ही मकसद – दुश्मन को उसकी औकात दिखाना।

दीपचंद की आवाज में आज भी वही जोश झलकता है जब वो कहते हैं, “हम सप्लाई वालों से कहते थे – खाना मिले न मिले, गोला-बारूद ज्यादा चाहिए। दुश्मन ने हमारी जमीन पर कब्जा किया था, उसे खदेड़ना था।” उनकी बटालियन को 12 गैलेंट्री अवॉर्ड्स मिले और कारगिल की जीत का तमगा उनके सीने पर चमकता है।

वो हादसा जिसने सब कुछ बदल दिया

लेकिन जंग का मैदान सिर्फ जीत की कहानियां नहीं लिखता, वो बलिदान भी मांगता है। ऑपरेशन पराक्रम के दौरान जब दीपचंद और उनके साथी वापसी की तैयारी कर रहे थे, तभी एक तोप का गोला फट गया। वो पल दीपचंद की जिंदगी का सबसे काला पल बन गया। धमाके में उनके दोनों पैर और एक हाथ बुरी तरह जख्मी हो गए। दो और सैनिक भी घायल हुए। खून इतना बहा कि डॉक्टरों ने उन्हें बचाने के लिए 17 बोतल खून चढ़ाया। जिंदा रखने की जद्दोजहद में उनकी दोनों टांगें घुटनों तक और एक हाथ काटना पड़ा।

कोई और होता तो शायद टूट जाता, लेकिन दीपचंद हरियाणा के उस मिट्टी से बने थे, जो हार नहीं मानती। आज उनके घुटनों तक नकली पैर हैं, फिर भी वो फौजी सलामी देते हैं – दाहिने बाजू से, सीना तानकर।

“हम सामने नहीं लड़े, पर सपोर्ट से दुश्मन हारा”

दीपचंद कहते हैं, “मैं दुश्मन के आमने-सामने तो कभी नहीं हुआ, लेकिन हमारी आर्टिलरी फायरिंग ने इन्फेंट्री को आगे बढ़ने की ताकत दी।” युद्ध में आर्टिलरी सपोर्ट की अहमियत को वो बखूबी समझते हैं। उनकी गन की गूंज ने दुश्मन के छक्के छुड़ा दिए थे।

आज भी जिंदा है वो फौजी

1989 में सेना में भर्ती हुए दीपचंद कश्मीर के कई जोखिम भरे ऑपरेशन्स का हिस्सा रहे। कारगिल के बाद भी वो सोशल मीडिया पर एक्टिव हैं, अपनी कहानियां सुनाते हैं। जो भी उनसे मिलता है, उनकी जंग की दास्तां सुने बिना रह नहीं पाता। कारगिल विजय दिवस पर उन्हें देशभर में सम्मानित किया जाता है, लेकिन उनकी असली पहचान वो भावुक आंखें हैं, जो जंग के दिनों को याद करते हुए चमक उठती हैं।

शौर्य का सबक

नायक दीपचंद की कहानी सिर्फ एक सैनिक की नहीं, बल्कि उस जज्बे की है जो कहता है – शरीर टूट सकता है, पर हौसला नहीं। कारगिल की बर्फीली चोटियों पर लिखी उनकी गाथा आज भी हमें प्रेरित करती है कि देश के लिए कुछ भी कुर्बान करने का मतलब क्या होता है। वो कहते हैं, “हमें जीत का सौभाग्य मिला, और यही मेरी जिंदगी का सबसे बड़ा मेडल है।”

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