कानाईलाल दत्त: बंगाल का निर्भीक ‘शेर’ जिसने फांसी को हंसते-हंसते गले लगाया
आज बलिदान दिवस है। ठीक 117 साल पहले, 10 नवंबर 1908 को कलकत्ता की अलीपुर जेल में एक 20 साल का नौजवान फांसी के तख्ते पर चढ़ा। उसकी आँखों में डर नहीं, मुस्कान थी। होंठों पर कोई शिकन नहीं, सिर्फ दृढ़ता। नाम था कानाईलाल दत्त – बंगाल का वो शेर, जिसने हँसते-हँसते फाँसी का फंदा चूमा और माँ भारती को आजाद करने का सपना पूरा करने के लिए अपना खून बहा दिया।
फांसी देने वाले ब्रिटिश वार्डन ने खुद कबूल किया: “मैं पापी हूं जो कानाईलाल को फांसी चढ़ते देखता रहा। अगर उसके जैसे 100 क्रांतिकारी हों, तो भारत को आजाद करने में देर नहीं लगेगी!”

जन्म से क्रांति तक का सफर
30 अगस्त 1888 को हुगली जिले के एक साधारण बंगाली परिवार में जन्म। पिता चुन्नीलाल दत्त ब्रिटिश सरकार में नौकरी करते थे, बॉम्बे में। पाँच साल की उम्र में कानाई पिता के पास बॉम्बे पहुँचे। यहीं स्कूल की पढ़ाई शुरू हुई। बाद में चंद्रनगर लौटे और हुगली कॉलेज से स्नातक की परीक्षा पास की। लेकिन डिग्री हाथ नहीं लगी – कारण? क्रांतिकारी गतिविधियाँ। ब्रिटिश सरकार ने उनकी डिग्री रोक दी।
कानाई अनुशीलन समिति के सबसे निर्भीक सदस्य थे। जिमनास्टिक, लाठी चलाना, बंदूक चलाना – सब सीखा। स्वदेशी आंदोलन में सक्रिय। बंग-भंग आंदोलन (1905) ने उन्हें पूरी तरह क्रांति की राह पर ला खड़ा किया।
क्रांतिकारी यात्रा और अनुशीलन समिति
कानाईलाल अनुशीलन समिति के सक्रिय सदस्य बने। यह संगठन बंगाल में स्वदेशी आंदोलन और सशस्त्र क्रांति का केंद्र था। वे खुदीराम बोस से मात्र 1 वर्ष 3 महीने बड़े थे (खुदीराम का जन्म दिसंबर 1889)। खुदीराम ने 11 अगस्त 1908 को मुजफ्फरपुर में फांसी चढ़ी, जबकि कानाईलाल ने ठीक 3 महीने बाद (10 नवंबर 1908) अपना बलिदान दिया।
अलिपुर बम कांड और जेल में हत्या

30 अप्रैल 1908। खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी ने कलकत्ता में किंग्सफोर्ड (चीफ प्रेसीडेंसी मजिस्ट्रेट) को निशाना बनाया। बम गलती से मिसेज कैनेडी और उनकी बेटी पर गिरा। दोनों मारी गईं। क्रांतिकारियों ने इसे स्वीकार किया। धरपकड़ शुरू हुई। कानाईलाल सहित कई युवा गिरफ्तार।
जेल में एक गद्दार था – नरेंद्र गोस्वामी। उसने पुलिस को साथियों के नाम बताए। 26 अगस्त 1908 को कानाईलाल और सत्येंद्रनाथ बोस ने जेल अस्पताल में पुलिस की मौजूदगी में गोस्वामी को गोली मार दी। यह भारत के स्वतंत्रता संग्राम में जेल के अंदर पहली राजनीतिक हत्या थी।
फाँसी का दिन: 10 नवंबर 1908
दोनों को फाँसी की सजा। सत्येंद्रनाथ को 21 नवंबर को, कानाईलाल को 10 नवंबर को। फाँसी से एक दिन पहले कानाईलाल ने साथियों से कहा:
“मैं मरने नहीं जा रहा, अमर हो रहा हूँ।”सुबह 6 बजे फाँसी। तख्ते पर चढ़ते वक्त कानाईलाल मुस्कुराए। वार्डन ने बाद में लिखा:“मैं पापी हूँ जो कानाईलाल को फाँसी चढ़ते देखता रहा। उसके जैसे 100 क्रांतिकारी हों, तो भारत एक साल में आजाद!”
शवयात्रा: जनता का अपूर्व प्रेम
अर्थी सस्ती थी। पैसे नहीं थे। लेकिन कलकत्ता की सड़कों पर हजारों लोग। नारे गूंजे – “जय कानाई! जय कानाई!” मोतीलाल राय ने 1923 में लिखा:
“कफन हटाया तो क्या देखा – लंबे बाल माथे पर बिखरे, आँखें आधी बंद जैसे सो रहे हों, होंठ दृढ़, मुट्ठियाँ बंद। मृत्यु की कोई पीड़ा नहीं। जैसे कोई तपस्वी अमृत निद्रा में लीन हो।”

अंतिम संस्कार के बाद उनकी अस्थियाँ एक समर्थक ने 5 रुपये में खरीदीं – इतना था सम्मान!
तुलनात्मक समयरेखा
| घटना | खुदीराम बोस | कानाईलाल दत्त |
|---|---|---|
| जन्म | दिसंबर 1889 | 30 अगस्त 1888 |
| प्रमुख कार्रवाई | मुजफ्फरपुर बम कांड | गोस्वामी हत्या (जेल में) |
| फांसी की तारीख | 11 अगस्त 1908 | 10 नवंबर 1908 |
| उम्र (शहादत के समय) | 18 वर्ष 8 महीने | 20 वर्ष 2 महीने |
आज भी प्रेरणा
कानाईलाल दत्त कोई नाम नहीं, एक जज्बा हैं। 20 साल की उम्र में देश के लिए जान दे दी। न डर, न पछतावा। सिर्फ माँ भारती की आजादी। बलिदान दिवस पर उन्हें सलाम। अगर आज हम साँस ले रहे हैं स्वतंत्र हवा में, तो इसलिए कि कानाईलाल जैसे शेरों ने फाँसी को गले लगाया ।
“वंदे मातरम्!”
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