—— बलिदान दिवस -शौर्यनमन—–
ग्रेनेडियर गजराज सिंह निर्वाण
2691488W
05-01-1980 – 29-07-2000
यूनिट – 14 ग्रेनेडियर्स रेजिमेंट
आतंकवाद विरोधी अभियान
ग्रेनेडियर गजराज सिंह का जन्म 5 जनवरी 1980 को राजस्थान के झुंझुनूं जिले की अलसीसर तहसील के मलसीसर कस्बे में पूर्व सैनिक जय सिंह निर्वाण एवं श्रीमती सुरेश कंवर के परिवार में हुआ था। शिक्षा पूर्ण करने के पश्चात पिता के पद चिन्हों पर चलते हुए 25 अगस्त 1997 को वह भारतीय सेना की ग्रेनेडियर्स रेजिमेंट में रंगरूट के रूप में भर्ती हुए थे।
ग्रेनेडियर्स रेजिमेंटल सेंटर जबलपुर से प्रशिक्षण प्राप्त करने के पश्चात उन्हें 14 ग्रेनेडियर्स बटालियन में ग्रेनेडियर के पद पर नियुक्त किया गया था। वह अचूक लक्ष्यभेदक थे जिसके लिये उन्हें “सर्वोत्तम लक्ष्यभेदक” के प्रमाण पत्र दिया गया था।
ग्रेनेडियर गजराज अत्यंत साहसी सैनिक थे। उनकी बटालियन को पाकिस्तानी क्षेत्र में उग्रवादियों के ठिकानों का अभिज्ञान करने का कार्य दिया गया था। ग्रेनेडियर गजराज सिंह स्वेच्छा से इस कार्य के लिए आगे आए। अपने तीन साथियों के साथ उन्होंने इस संकटमय कार्य को निष्पादित किया तथा शत्रु के ठिकानों की वीडियोग्राफी करके ले आए , जिस पर बटालियन द्वारा उन्हें सम्मानित किया गया था।
वर्ष 2000 में राजौरी सेक्टर में आतंकी गतिविधियां बढ़ गईं थी। ग्रेनेडियर गजराज सिंह की बटालियन को राजौरी सेक्टर में तैनात किया गया। वहां इन्हें पीर पंजाल की पहाड़ियों से आतंकवादियों को खदेड़ने का कार्य सौंपा गया था। पीर पंजाल क्षेत्र सामान्य से अधिक ऊँचा है। जहां या तो हिमपात होता रहता है या घना कोहरा छाया रहता है।
29 जुलाई 2000 को वे पहाड़ियों पर आतंकवादियों का अन्वेषण कर रहे थे। दो-दो सैनिक साथ होकर अन्वेषण कर रहे थे, किंतु हाथ को हाथ नहीं सूझ रहा था। आकस्मिक वायु के झोंके से तनिक कोहरा छंटा तो ग्रेनेडियर गजराज सिंह की दृष्टि दो आतंकवादियों पर पड़ी। पलक झपकते उनकी राइफल गरजी और एक आतंकवादी वहीं ढेर हो गया। द्वितीय आतंकवादी भाग गया। ग्रेनेडियर गजराज सिंह अपने सहकर्मियों का आह्वान करते हुए एकाकी ही उस आतंकवादी का पीछे भागे। वह आतंवादी भागते हुए पलट-पलट कर फायर कर रहा था।
आकस्मिक, ग्रेनेडियर गजराज सिंह की छाती में एक गोली लग गई, तो भी वह आतंकवादी का पीछा करते रहे। सटीक लक्ष्य साध कर उन्होंने द्वितीय आतंकवादी को भी मार दिया। उस समय तक उनके साथी भी वहां आ गए और उनकी सुध लेकर प्राथमिक चिकित्सा की। कुछ मिनट पश्चात ही अपने साथियों को जय हिंद कह कर वह वीरगति को प्राप्त हो गए।
31 जुलाई 2000 को उनका पार्थिव शरीर उनके पैतृक गांव मलसीसर लाया गया था। 1 अगस्त 2000 को पूर्ण सैन्य व राजकीय सम्मान से उनका अंतिम संस्कार किया गया था। इनके पिता श्री जयसिंह ने पुत्र के बलिदान पर कहा कि जो कार्य वे अपने 16 वर्ष की सैन्य सेवा में नहीं कर सके, उनके पुत्र ने दो वर्ष में ही वह कार्य कर दिखाया।
राजपूत समाज की मारवाड़ी लोकोक्ति के
साथ वे गर्व के साथ कहते हैं…
सुत मरयो हित देश रै, हरख्यो बंधु समाज।
माँ नहीं हरखी जलमदिन, जितरी हरखी आज!!
जननी जणे तो ऐसो जण, के दाता के शूर।
नहीं तो रहजे बांझड़ी, मति गंवा जे नूर!!
परिजनों ने राज्य सरकार द्वारा झुंझुनूं-मलसीसर रोड़ पर तहसील कार्यालय के समक्ष प्रदान की गई भूमि पर भव्य स्मारक निर्माण करवाया है। 12 फरवरी 2004 को महामहिम उपराष्ट्रपति श्री भैरों सिंह शेखावत द्वारा इनकी प्रतिमा का अनावरण किया गया था। राज्य सरकार द्वारा इनकी स्मृति में कस्बे के राजकीय विद्यालय का नामकरण “शहीद गजराज सिंह राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय, मलसीसर” किया गया है । 


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