कैप्टन अंशुमान सिंह: वीरता और बलिदान की अमर गाथा
कैप्टन अंशुमान सिंह भारतीय सेना के एक ऐसे बहादुर अधिकारी थे, जिन्होंने मात्र 26 वर्ष की आयु में अपने प्राणों की बाजी लगाकर न केवल अपने साथियों की जान बचाई, बल्कि राष्ट्र की सेवा में सर्वोच्च बलिदान दिया। वे आर्मी मेडिकल कोर के रेजिमेंटल मेडिकल ऑफिसर थे और सियाचिन ग्लेशियर की कठोर परिस्थितियों में तैनात थे। उनकी वीरता के लिए उन्हें मरणोपरांत भारत के द्वितीय सर्वोच्च शांतिकालीन वीरता पुरस्कार कीर्ति चक्र से सम्मानित किया गया। उनकी कहानी न केवल सैनिकों के लिए प्रेरणा है, बल्कि पूरे राष्ट्र के लिए एक उदाहरण है कि कर्तव्य और समर्पण क्या होता है।
प्रारंभिक जीवन और पारिवारिक पृष्ठभूमि

कैप्टन अंशुमान सिंह का जन्म 1997 में उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले के बरडीहा दलपत गांव में हुआ था। वे तीन भाई-बहनों में सबसे छोटे थे—उनका एक बड़ा भाई और एक बड़ी बहन थी। उनके पिता सुबेदार रवि प्रताप सिंह (रिटायर्ड) एक सेना के अधिकारी थे, जिनकी सेवा ने अंशुमान को बचपन से ही सैन्य जीवन की प्रेरणा दी। मां मंजू सिंह ने परिवार को मजबूती प्रदान की। परिवार मूल रूप से देवरिया का रहने वाला था, लेकिन वर्तमान में वे लखनऊ में रहते हैं। अंशुमान का बचपन सादगी और अनुशासन से भरा था।
शिक्षा और प्रारंभिक विकास
अंशुमान ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा राष्ट्रीय सैनिक स्कूल, चैल (हिमाचल प्रदेश) से प्राप्त की, जो एक आवासीय सैन्य स्कूल है।स्कूल के दौरान ही वे सेना में शामिल होने का सपना देखने लगे। स्कूली शिक्षा के बाद, उन्होंने आर्म्ड फोर्सेस मेडिकल कॉलेज (AFMC), पुणे में चयन प्राप्त किया, जहां से उन्होंने चिकित्सा में स्नातक (MBBS) की डिग्री हासिल की। AFMC में उनके प्रदर्शन ने उन्हें सेना के मेडिकल कोर के लिए एक आदर्श उम्मीदवार बना दिया। शिक्षा के दौरान ही उन्होंने नेतृत्व क्षमता और करुणा का प्रदर्शन किया, जो बाद में उनके सैन्य जीवन में झलका।
वैवाहिक जीवन और व्यक्तिगत पक्ष

कैप्टन अंशुमान सिंह का व्यक्तिगत जीवन भी उनकी रोमांटिक और समर्पित प्रकृति का प्रतीक था। उन्होंने अपनी भावी पत्नी स्मृति सिंह (एक इंजीनियर) से पहली मुलाकात इंजीनियरिंग कॉलेज के पहले दिन की थी। AFMC में चयन के कारण दोनों एक-दूसरे से दूर हो गए, लेकिन आठ वर्षों तक दूरी बनाए रखने के बावजूद उनका प्रेम अटूट रहा। आखिरकार, 10 फरवरी 2023 को दोनों ने विवाह बंधन में बंध गए। शादी के ठीक बाद ही अंशुमान की सियाचिन में पोस्टिंग हो गई।
सैन्य सेवा और करियर

AFMC से स्नातक होने के बाद, कैप्टन अंशुमान सिंह को आर्मी मेडिकल कोर में कमीशन प्राप्त हुआ (सेवा संख्या: MS-20323K)। आर्मी मेडिकल कोर भारतीय सेना को शांति और युद्धकाल में चिकित्सा सेवाएं प्रदान करता है। उन्होंने 26 पंजाब रेजिमेंट की 403 फील्ड हॉस्पिटल में रेजिमेंटल मेडिकल ऑफिसर के रूप में सेवा की, जो 26 मद्रास से संलग्न थी। जुलाई 2023 में वे सियाचिन ग्लेशियर में तैनात थे, जहां वे सैनिकों की चिकित्सा देखभाल के लिए जिम्मेदार थे। सियाचिन की ऊंचाई (19,000 फीट से अधिक) और चरम मौसम की चुनौतियों के बावजूद, वे हमेशा आगे रहते थे।
सियाचिन में बलिदान: वीरता की कहानी

19 जुलाई 2023 को सुबह करीब 3 बजे, सियाचिन ग्लेशियर के चंदन ड्रॉपिंग जोन में गोला-बारूद के भंडारण में शॉर्ट सर्किट से आग लग गई। तेज हवाओं के कारण आग तेजी से फैल गई और कई फाइबर ग्लास हट्स (टेंट) धुंए से भर गए। कई सैनिक फंस गए थे। कैप्टन अंशुमान सिंह ने आग की सूचना पाते ही अपने हट से बाहर निकलकर प्रभावित क्षेत्र में पहुंचे। अपनी जान की परवाह किए बिना, उन्होंने धुंए से भरे हट से चार से पांच सैनिकों को शांत स्वर और स्पष्ट निर्देशों से सुरक्षित बाहर निकाला।
फिर, उन्होंने अपने हट से मेडिकल जांच कक्ष में लगी आग देखी और जीवन रक्षक दवाइयों व उपकरणों को बचाने का प्रयास किया। लेकिन हवाओं ने आग को और भयावह बना दिया, जिससे उनका हट भी लपटों में घिर गया। साथियों के बार-बार प्रयासों के बावजूद उन्हें बचाया नहीं जा सका। वे बुरी तरह झुलस गए और एयरलिफ्ट कर चंडीगढ़ ले जाए गए, जहां जुलाई 2023 में वे शहीद हो गए। इस घटना में उन्होंने न केवल सैनिकों की जान बचाई, बल्कि महत्वपूर्ण चिकित्सा सामग्री को भी सुरक्षित रखने की कोशिश की। सियाचिन में तैनाती से मात्र 15 दिन पहले ही वे वहां पहुंचे थे।
सम्मान और पुरस्कार – मरणोपरांत कीर्ति चक्र

कैप्टन अंशुमान सिंह की वीरता को मान्यता देते हुए, भारत सरकार ने उन्हें मरणोपरांत कीर्ति चक्र से नवाजा। यह पुरस्कार 5 जुलाई 2024 को राष्ट्रपति भवन में आयोजित रक्षा अलंकरण समारोह में प्रदान किया गया। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने यह सम्मान उनकी पत्नी स्मृति सिंह और मां मंजू सिंह को सौंपा। समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह भी उपस्थित थे। स्मृति ने सम्मान ग्रहण करते हुए अंशुमान की वीरता और उनकी आखिरी बातचीत का जिक्र किया, जो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। यह पुरस्कार उनकी असाधारण साहस, कर्तव्यनिष्ठा और सर्वोच्च बलिदान का प्रतीक है।
विरासत
कैप्टन अंशुमान सिंह के बलिदान ने लाखों लोगों को प्रेरित किया है। वे अपने पिता सुबेदार रवि प्रताप सिंह (रिटायर्ड), मां मंजू सिंह और पत्नी स्मृति सिंह के साथ-साथ पूरे राष्ट्र के लिए अमर हो गए। हाल ही में, उनके परिवार ने सेना के कुछ नियमों (जैसे नेक्स्ट ऑफ किन – NOK – संबंधी पेंशन वितरण) पर सवाल उठाए, जिससे राष्ट्रीय चर्चा हुई, लेकिन यह उनकी वीरता को कम नहीं कर सकता। अंशुमान की डायरी और पत्र स्मृति के पास सुरक्षित हैं, जो उनके प्रेम और समर्पण की गवाही देते हैं। वे एक ऐसे सैनिक थे जो आगे बढ़कर नेतृत्व करते थे—डॉक्टर होने के नाते चिकित्सा सेवा में उत्कृष्ट, और योद्धा के रूप में अटल।
जय हिंद!
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