—— शौर्य दिवस -शौर्यनमन—–
कैप्टन जसबीर सिंह रैना
अशोक चक्र
यूनिट – 10 गार्ड्स रेजिमेंट
ऑपरेशन ब्लू स्टार
कैप्टन जसबीर सिंह रैना का जन्म 5 जुलाई 1955 को, हिमाचल प्रदेश के शिमला नगर में एक सिख परिवार में ज्ञानी करतार सिंह के घर में हुआ था। यह परिवार बंटवारे के समय पाकिस्तान से आ कर शिमला में निवास करने लगा था। बाल्यकाल से ही वह भारतीय सशस्त्र बलों में सेवा की प्रबल अभिलाषा रखते थे।
10 सितंबर 1977 को उन्हें भारतीय सेना की ब्रिगेड ऑफ द गार्ड्स रेजिमेंट की 10 बटालियन में सैकिंड लेफ्टिनेंट के रूप में कमीशन प्राप्त हुआ था। 1 मई 1984 को, वह कैप्टन के पद पर पदोन्नत हुए थे और उसी वर्ष उनकी बटालियन ऑपरेशन ब्लू स्टार में भाग लेने अमृतसर चली गई।
—— ऑपरेशन ब्लू स्टार ——
“ऑपरेशन ब्लू स्टार” में, 3 जून 1984 को, 10 गार्ड्स बटालियन के कैप्टन जसबीर सिंह रैना को अमृतसर के स्वर्ण मंदिर परिसर में आतंकवादियों द्वारा किए गए रक्षण के विवरण का भेद लेने का कार्य सौंपा गया। यद्यपि यह एक संकटमय विशेष कार्य (MISSION) था, किंतु कैप्टन रैना ने इस कार्य को निष्पादित किया और वह सिख श्रद्धालु के रूप में साधारण वस्त्रों में परिसर के भीतर चले गए।
इस संपूर्ण कार्य में आतंकवादियों द्वारा उन पर दृष्टि होते हुए भी अपने जीवन को गंभीर संकट में डालकर , कैप्टन रैना ने इस विशेष कार्य को निष्पादित किया और परिसर के Layout के साथ-साथ इसके भीतर के रक्षण से संबंधित अति उपयोगी सूचनाएं ले कर आए।
पुनः 5/6 जून 1984 की रात्रि को, कैप्टन जसबीर सिंह रैना की कमान में ‘B’ कंपनी को स्वर्ण मंदिर परिसर से आतंकवादियों को निष्कासित करने का आदेश दिया गया। उनकी कंपनी परिसर में प्रवेश करने वाली सर्वप्रथम टुकड़ी थी और कैप्टन रैना सबसे आगे नेतृत्व कर रहे थे।
उनकी कंपनी के लक्ष्य में ऊपर से आतकंवादियों के वर्चस्व वाले तीन तल्ला भवन कुछ भूमिगत सुरंगें और तलघर सम्मिलित थे। जैसे ही अग्रणी प्लाटून ने मुख्य प्रवेश द्वार से परिसर में प्रवेश किया, वह परिसर के चारों ओर से हो रहे लाइट मशीनगनों और अन्य स्वचालित शस्त्रों की भयानक फायरिंग में घिर गई।
स्वचालित शस्त्रों की प्रचंड फायरिंग में अपनी व्यक्तिगत सुरक्षा पर आए संकट से अभीत, कैप्टन रैना आगे बढ़े और अनेकों हताहतों के होते हुए भी अपने सैनिकों को संचालन का वेग बनाए रखने के लिए प्रेरित किया। कैप्टन रैना दृढ़ संकल्प के साथ अपनी कंपनी को आतंकवादियों के वर्चस्व वाले एक-एक कक्षों को CLEAR करने के लिए प्रेरित करते रहे। ऐसा करते समय, कैप्टन रैना को घुटनों पर अति निकट से मशीन गन की अनेक गोलियां लगीं और वह गंभीर रूप से घायल हो गए।
गंभीर घावों के होते हुए भी वह अपनी कंपनी को संगठित करते रहे और अत्यधिक रक्त बहने से गिरने तक उन्होंने अपने सैनिकों का नेतृत्व किया। उस समय तक अंततः मिशन पूर्ण हो चुका था। इस स्थिति में भी कैप्टन रैना को उनकी इच्छा के विरुद्ध वहां से निकाला गया। अनेकों हताहतों के होते हुए भी, उनकी वीरता और प्रेरक नेतृत्व ने कंपनी के मिशन की सफलता में महत्वपूर्ण भूमिका निर्वहन की थी।
इस प्रकार कैप्टन जसबीर सिंह रैना ने अति विशिष्ट वीरता, प्रेरक नेतृत्व, शांत साहस और असाधारण उच्च कोटि की कर्तव्यपरायणता का परिचय दिया। उनके वीरतापूर्ण कार्य के लिए उन्हें “अशोक चक्र” से सम्मानित किया गया। चिकित्सकों को उपचार में उनके दोनों पैर घुटनों से नीचे काटने पड़े। वह अशोक चक्र सम्मान ग्रहण करने व्हील चेयर पर ही पहुंचे थे। 1 मई 1989 को वह मेजर के पद पर पदोन्नत हुए। 3 अप्रैल 2000 को कर्नल के रूप में वह सेवानिवृत्त हुए।
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