Site icon shauryasaga.com

Naik Chand Singh नायक चांद सिंह महावीर चक्र: साहस और बलिदान की कहानी

नायक चांद सिंह, पंजाब के एक वीर सपूत, ने 1947 के जम्मू और कश्मीर अभियान के दौरान अपने असाधारण साहस से भारतीय सैन्य इतिहास में अपना नाम स्वर्णिम अक्षरों में अंकित किया। 1922 में पंजाब के रामपुर फूल के जैद गांव में जन्मे नायक चांद सिंह को उनके अदम्य साहस के लिए मरणोपरांत महावीर चक्र, भारत का दूसरा सर्वोच्च वीरता पुरस्कार, प्रदान किया गया।

प्रारंभिक जीवन और सैन्य भर्ती

नायक चांद सिंह

नायक चांद सिंह का जन्म 1922 में पंजाब के रामपुर फूल के जैद गांव में एक साधारण परिवार में हुआ था। उनके पिता, श्री फुमान सिंह, ने उन्हें साहस और कर्तव्यनिष्ठा के मूल्यों से परिचित कराया।

सिख रेजीमेंट में भर्ती

Sikh_Regiment

21 मार्च, 1939 को, युवा चांद सिंह भारतीय सेना की प्रतिष्ठित सिख रेजीमेंट में भर्ती हुए। यह वह शुरुआत थी जिसने उन्हें एक वीर सैनिक के रूप में अमर कर दिया।

1947 का जम्मू और कश्मीर अभियान

Indian_soldiers_landing_at_Srinagar_airfield_during_the_1947–1948_war

1947 का वर्ष भारत के लिए अत्यंत चुनौतीपूर्ण था। नवस्वतंत्र भारत को जम्मू और कश्मीर में अपनी पहली बड़ी सैन्य चुनौती का सामना करना पड़ा। 13 नवंबर, 1947 को भारतीय सेना द्वारा उरी पर कब्जा करने के बाद श्रीनगर पर दुश्मन का खतरा समाप्त हो गया था। लेकिन उरी-पुंछ क्षेत्र में दुश्मन के निरंतर दबाव के कारण जम्मू क्षेत्र में स्थिति गंभीर बनी रही।

पिकेट पर हमला और नायक चांद सिंह की वीरता

22 नवंबर, 1947 को रात 22:15 बजे, लगभग 600 दुश्मनों के एक दल ने झेलम नदी के उस पार एक पहाड़ी पर स्थित भारतीय पिकेट पर हमला किया। यह पिकेट, जो सिख प्लाटून द्वारा रक्षित था, उरी क्षेत्र की रक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण थी। नायक चांद सिंह इस प्लाटून के एक सेक्शन का नेतृत्व कर रहे थे।

दुश्मन ने पिकेट से 750 मीटर दूर एक ऊंचे स्थान से भारी स्वचालित हथियारों से गोलीबारी शुरू की और तीन बार हमला किया। मुख्य हमला नायक चांद सिंह के सेक्शन की ओर से हुआ। उनके सेक्शन ने तब तक गोलीबारी शुरू नहीं की, जब तक दुश्मन की पहली लहर उनकी स्थिति से 25 मीटर की दूरी तक नहीं पहुंच गई। इसके बाद, लाइट मशीन गनों, राइफलों और हथगोलों से दुश्मन पर तीव्र प्रहार किया गया।

नायक चांद सिंह का साहस

नायक चांद सिंह

दुश्मन धोखा खाकर 20 मीटर पीछे हट गया और पत्थरों व झाड़ियों की आड़ में स्वचालित हथियारों से गोलीबारी शुरू कर दी। दोनों पक्षों में गाली-गलौज भी हुई। दुश्मन ने सिख सैनिकों को खुले में निकलने की चुनौती दी। नायक चांद सिंह ने निडर होकर तीन बार खाई से बाहर निकलकर हथगोले फेंके। तीसरी बार उनके बाएं हाथ के प्रकोष्ठ में गोली लगी। उनकी वीरता देख दुश्मन हताश होकर पीछे हट गया और उनके जमादार ने कहा, “जमादार साहब! दुश्मन बहुत मजबूत है, हम मारे गए।”

दुश्मन का दूसरा हमला और मोर्टार पर हमला

रात 22:30 बजे, दुश्मन ने एक और हमला बोला, इस बार और तेज कवर फायर के साथ। उन्होंने 3 इंच मोर्टार का उपयोग शुरू किया, जिससे भारतीय कमांडर चिंतित हो गए, क्योंकि यह मार्टर उरी क्षेत्र पर भारी नुकसान पहुंचा सकता था।

मोर्टार नष्ट करने का मिशन

यह निर्णय लिया गया कि मोर्टार को नष्ट करना आवश्यक है। नायक चांद सिंह ने इस खतरनाक मिशन का नेतृत्व किया। अपने दो साथियों के साथ, वे छिपते-छिपाते मोर्टार स्थिति के कुछ मीटर करीब पहुंच गए। नायक चांद सिंह ने मोर्टार पर हथगोले फेंके और “सत श्री अकाल” का जयघोष करते हुए संगीनों के साथ दुश्मन की स्थिति पर टूट पड़े। उन्होंने एक दुश्मन को अपनी संगीन से मार गिराया, जबकि दूसरा भाग निकला। मोर्टार को निष्क्रिय करने के बाद, वे अपनी स्थिति पर लौट आए।

अंतिम बलिदान

लौटने पर नायक चांद सिंह ने देखा कि दुश्मन ने उनके बाएं पक्ष में मोर्चा संभाल लिया था। वे फिर से खाई से बाहर निकले और दुश्मन को खदेड़ने के लिए हथगोले फेंके। इस दौरान, दुश्मन की लाइट मशीन गन की बौछार में वे शहीद हो गए।

पिकेट की रक्षा

नायक चांद सिंह द्वारा मोर्टार को नष्ट करने से दुश्मन का मनोबल पूरी तरह टूट गया। भारी गोलाबारी की आड़ में, दुश्मन अपने हताहतों को लेकर भाग खड़ा हुआ। इस प्रकार, एक महत्वपूर्ण पिकेट को बचाया गया।

महावीर चक्र और विरासत मरणोपरांत सम्मान

महावीर चक्र MVC

दुश्मन के सामने अपनी अद्वितीय वीरता और नेतृत्व के लिए नायक चांद सिंह को मरणोपरांत महावीर चक्र से सम्मानित किया गया। उनकी वीर गाथा सिख रेजीमेंट और भारतीय सेना के लिए गर्व का विषय है।

प्रेरणा का स्रोत

नायक चांद सिंह

नायक चांद सिंह का बलिदान हमें सिखाता है कि साहस, दृढ़ता और कर्तव्यनिष्ठा के साथ कोई भी चुनौती असंभव नहीं है। उनकी कहानी देशभक्ति और बलिदान की भावना को जीवित रखती है।

नायक चांद सिंह की कहानी न केवल एक सैनिक की वीरता की कहानी है, बल्कि यह एक प्रेरणा है जो हमें देश के लिए सर्वोच्च बलिदान देने की भावना को जीवित रखती है। उनका साहस और बलिदान हमें हमेशा याद दिलाएगा कि स्वतंत्रता और सम्मान की रक्षा के लिए कितना बड़ा मूल्य चुकाना पड़ता है।

जय हिन्द !

also read:-कैप्टन प्रदीप कुमार गौड़ शौर्य की पराकाष्ठा महावीर चक्र विजेता 1971 The Pinnacle of Valor: The Unforgettable Saga of Captain Pradeep Kumar Gaur

follow us on:-शौर्य गाथा Shaurya Saga | Facebook

Exit mobile version