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Captain Pradeep Kumar Gaur शौर्य की पराकाष्ठा: कैप्टन प्रदीप कुमार गौड़ की अविस्मरणीय गाथा, महावीर चक्र विजेता

कैप्टन प्रदीप कुमार गौड़

कैप्टन प्रदीप कुमार गौड़

कैप्टन प्रदीप कुमार गौड़ भारतीय सेना के उन वीर सपूतों में से एक हैं जिनका अदम्य साहस और सर्वोच्च बलिदान 1971 के भारत-पाक युद्ध के इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में अंकित है। उन्हें मरणोपरांत देश के दूसरे सबसे बड़े युद्धकालीन वीरता पुरस्कार महावीर चक्र से सम्मानित किया गया, जो उनकी असाधारण वीरता और कर्तव्यनिष्ठा का प्रमाण है।

कैप्टन प्रदीप कुमार गौड़
कैप्टन प्रदीप कुमार गौड़

प्रारंभिक जीवन और सैन्य करियर

  • जन्म: कैप्टन गौड़ का जन्म 15 अप्रैल, 1945 को शिमला, हिमाचल प्रदेश में हुआ था।
  • परिवार: उनके पिता का नाम श्री माता प्रसाद गौड़ था। उनका परिवार लंबे समय से भारतीय सेना में सेवारत था, जिससे उनमें भी देशप्रेम और शौर्य की भावना कूट-कूट कर भरी थी।
  • प्रशंसकों का नाम: अपने मिलनसार और आकर्षक व्यक्तित्व के कारण प्रशंसक उन्हें प्यार से “बिल्लू राजा” कहकर पुकारते थे।
  • कमीशन: उन्हें 02 अगस्त, 1964 को रेजीमेंट ऑफ आर्टिलरी में कमीशन मिला।
  • युद्ध अनुभव: उन्होंने 1965 के भारत-पाक युद्ध के दौरान कश्मीर के कारगिल क्षेत्र में भी लड़ाई लड़ी थी।
  • 660 एयर ओ पी स्क्वाड्रन: दिसंबर 1969 में, वह 660 एयर ओ पी (ऑब्जर्वेशन पोस्ट) स्क्वाड्रन में शामिल हो गए, जो हवाई टोही और तोपखाने की गोलाबारी को निर्देशित करने का महत्वपूर्ण कार्य करता है।

1971 का युद्ध: शकरगढ़ क्षेत्र में अदम्य साहस

1971 का भारत-पाक युद्ध

1971 के भारत-पाक युद्ध के दौरान, कैप्टन गौड़ की नियुक्ति शकरगढ़ क्षेत्र में कार्यरत 36 आर्टिलरी ब्रिगेड में हुई थी। उनका मुख्य कार्य एक हवाई प्रेक्षक पायलट (Air O P Pilot) के रूप में दुश्मन के ठिकानों को चिन्हित करना और फिर उन पर भारतीय तोपखाने से प्रभावी गोलाबारी निर्देशित करना था।

दिसंबर 4 से 14: निर्भीक उड़ानें

4 से 14 दिसंबर, 1971 के बीच, कैप्टन गौड़ ने दुश्मन की जबरदस्त गोलाबारी और छोटे हथियारों के खतरे की परवाह किए बिना, पाकिस्तानी इलाके के अंदर तक कई खतरनाक उड़ानें भरीं। इन उड़ानों ने भारतीय सेना के लिए महत्वपूर्ण खुफिया जानकारी एकत्र की।

11 दिसंबर: टैंकों का विध्वंस

1971 का भारत-पाक युद्ध

11 दिसंबर, 1971 को, कैप्टन गौड़ ने हवाई टोही के दौरान एक अत्यंत महत्वपूर्ण अवलोकन किया। उन्होंने देखा कि शत्रु के लगभग 12 टैंकों का एक बड़ा दस्ता मलिकपुर स्थित भारतीय चौकियों को घेरने के उद्देश्य से आगे बढ़ रहा है।

  • तत्काल चेतावनी: उन्होंने तुरंत अपनी थल सेना को शत्रु की दिशा, शक्ति और संभावित लक्ष्य के बारे में सावधान किया।
  • अचूक गोलाबारी निर्देशन: अपने छोटे, निहत्थे विमान को दुश्मनों की एंटी-एयरक्राफ्ट गोलाबारी से बचाते हुए, उन्होंने भारतीय तोपखाने की गोलाबारी को ऐसे अचूक ढंग से निर्देशित किया कि:
    • दुश्मन के 8 टैंक मौके पर ही नष्ट हो गए।
    • 2 टैंक बुरी तरह से क्षतिग्रस्त हो गए।

यह कार्रवाई भारतीय सेना के लिए एक बड़ी सामरिक जीत थी और इसने मलिकपुर चौकियों को गिरने से बचाया।

सर्वोच्च बलिदान: 14 दिसंबर, 1971

कैप्टन प्रदीप कुमार गौड़

14 दिसंबर की रात, शकरगढ़ के पूर्वी प्रवेश मार्ग की रक्षा कर रही बीन नदी को पार करने के लिए भारतीय सेना ने एक बड़ी योजना बनाई। इस योजना की सफलता के लिए दुश्मन के ठिकानों की सटीक जानकारी आवश्यक थी।

  • पहला मिशन (सुबह): कैप्टन गौड़ ने सुबह अपनी थल सेना को महत्वपूर्ण सूचना देने के लिए तीन घंटे तक उड़ान भरी।
  • अंतिम मिशन (शाम): उन्होंने दुश्मन के इलाके में दूर अंदर तक ठिकानों का पता लगाने के लिए 1615 बजे (4:15 PM) फिर से उड़ान भरी।
  • शत्रु का हमला: उनकी पहचान हो गई, और 1655 बजे (4:55 PM) शत्रु ने उनका पीछा करने के लिए सैबर जेट विमान लगा दिए।
  • कर्तव्य पर अडिग: चेतावनी मिलने के बावजूद, कैप्टन गौड़ ने अपना कार्य नहीं छोड़ा और सूचना एकत्र करने में लगे रहे। शीघ्र ही शत्रु के तीन सैबर जेट उन्हें घेरने आ गए।
  • वीरगति: उन्होंने दुश्मन के विमानों से बचने का हर संभव प्रयास किया, लेकिन अंत में, उनका छोटा विमान घेर लिया गया और वह शत्रु की गोलीबारी का शिकार हो गया। कैप्टन प्रदीप कुमार गौड़ ने वीरगति प्राप्त की, लेकिन उन्होंने सुनिश्चित किया कि थल सेना को उनके आगे बढ़ने के लिए महत्वपूर्ण खुफिया जानकारी मिल जाए।

महावीर चक्र (मरणोपरांत)

महावीर चक्र MVC

कैप्टन प्रदीप कुमार गौड़ का बलिदान भारतीय सेना के लिए प्रेरणा का स्रोत है। उनकी उत्कृष्ट वीरता, असाधारण कर्तव्यनिष्ठा, और युद्ध में असाधारण नेतृत्व के लिए, उन्हें देश के दूसरे सबसे बड़े युद्धकालीन वीरता पुरस्कार महावीर चक्र से मरणोपरांत सम्मानित किया गया।

उनका जीवन यह सिखाता है कि युद्ध के मैदान में सबसे बड़े हथियार टैंक या तोप नहीं, बल्कि एक सैनिक का साहस और अटल समर्पण होता है। कैप्टन गौड़ ने एक निहत्थे विमान से भी दुश्मन की सबसे ताकतवर इकाइयों को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया।

जय हिन्द !

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