Maha Veer Chakra – shauryasaga.com https://shauryasaga.com shaurya saga Fri, 23 Jan 2026 11:54:39 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=6.9 https://i0.wp.com/shauryasaga.com/wp-content/uploads/2024/02/cropped-logo1.png?fit=32%2C32&ssl=1 Maha Veer Chakra – shauryasaga.com https://shauryasaga.com 32 32 230886147 Captain Anuj Nayyar: कैप्टन अनुज नय्यर 1 Brave Hero’s Fearless Sacrifice at Point 4875 https://shauryasaga.com/captain-anuj-nayyar-brave-hero-sacrifice/ https://shauryasaga.com/captain-anuj-nayyar-brave-hero-sacrifice/?noamp=mobile#respond Fri, 23 Jan 2026 11:54:39 +0000 https://shauryasaga.com/?p=6069

Captain Anuj Nayyar कैप्टन अनुज नय्यर की शौर्य गाथा : कारगिल का वो जांबाज, जिसने मौत को गले लगाकर तिरंगा फहराया

Captain Anuj Nayyar :- जब भी भारत के वीर सपूतों की बात होती है, तो 1999 के कारगिल युद्ध का नाम सबसे पहले आता है। यह एक ऐसा युद्ध था जिसने दुनिया को दिखाया कि भारतीय सेना के पास न केवल आधुनिक हथियार हैं, बल्कि ऐसे जिगरे वाले सिपाही भी हैं जो अपनी मातृभूमि के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। इन्हीं नायकों में से एक थे कैप्टन अनुज नय्यर। मात्र 24 साल की उम्र में उन्होंने जो वीरता दिखाई, उसने उन्हें इतिहास के पन्नों में अमर कर दिया।

विवरण जानकारी
पूरा नाम कैप्टन अनुज नय्यर Captain Anuj Nayyar
जन्म 28 अगस्त, 1975
जन्म स्थान दिल्ली, भारत
पिता का नाम प्रो. एस. के. नय्यर (दिल्ली मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन के पूर्व कार्यकारी निदेशक)
माता का नाम श्रीमती मीना नय्यर
रेजीमेंट 17 जाट (17 Jat Regiment)
सम्मान महावीर चक्र (मरणोपरांत)

बचपन और सेना में आने का अटूट सपना

Captain Anuj Nayyar
Captain Anuj Nayyar

28 अगस्त 1975 को दिल्ली के एक मध्यमवर्गीय परिवार में जन्मे Captain Anuj Nayyar बचपन से ही अन्य बच्चों से अलग थे। उनके पिता, प्रोफेसर एस.के. नय्यर, दिल्ली मेट्रो में कार्यरत थे। अनुज की शुरुआती शिक्षा दिल्ली के धौला कुआं स्थित आर्मी पब्लिक स्कूल से हुई।

सेना की वर्दी के प्रति Captain Anuj Nayyar का आकर्षण इतना गहरा था कि उन्होंने अपनी स्कूली शिक्षा पूरी करते ही नेशनल डिफेंस एकेडमी (NDA) की परीक्षा दी और सफल हुए। NDA के 90वें कोर्स से पास आउट होने के बाद, उन्होंने भारतीय सैन्य अकादमी (IMA) में प्रशिक्षण लिया। जून 1997 में वे भारतीय सेना की प्रतिष्ठित ’17 जाट रेजीमेंट’ में बतौर ऑफिसर शामिल हुए।

कारगिल युद्ध और मुश्कोह घाटी का मोर्चा

साल 1999 की गर्मियों में जब पाकिस्तान ने विश्वासघात करते हुए कारगिल की चोटियों पर कब्जा कर लिया, तब कैप्टन अनुज नय्यर को मोर्चे पर भेजा गया। उनकी टुकड़ी को मुश्कोह घाटी में स्थित पॉइंट 4875 को वापस जीतने का लक्ष्य दिया गया। यह रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण चोटी थी, क्योंकि यहाँ से दुश्मन भारतीय सेना के रसद मार्ग पर सीधी नज़र रख सकते थे।

6 जुलाई 1999 की वह रात इतिहास में दर्ज होने वाली थी। Captain Anuj Nayyar को अपनी कंपनी के ‘चार्ली’ ग्रुप का नेतृत्व करने की जिम्मेदारी दी गई। उनकी टुकड़ी को बिना किसी तोपखाने (Artillery) की मदद के ऊपर की ओर चढ़ना था, जबकि दुश्मन चोटी पर बंकर बनाकर बैठे थे और लगातार गोलियों की बौछार कर रहे थे।

अदम्य साहस: जब अकेले ही नष्ट किए चार बंकर

चढ़ाई के दौरान, Captain Anuj Nayyar और उनकी टीम पर भारी गोलीबारी हुई। लेकिन Captain Anuj Nayyar के इरादे चट्टान की तरह मजबूत थे। उन्होंने अपनी टीम को कवर दिया और खुद आगे बढ़कर दुश्मन के पहले बंकर पर ग्रेनेड से हमला किया। पहला बंकर तबाह हो गया। इसके बाद उन्होंने हार नहीं मानी और दूसरे तथा तीसरे बंकर को भी आमने-सामने की लड़ाई (Hand-to-Hand Combat) में नष्ट कर दिया।

अंतिम बंकर को नष्ट करते समय, एक दुश्मन का आरपीजी (RPG) सीधे अनुज को लगा। वे गंभीर रूप से घायल हो गए और खून से लथपथ थे। लेकिन मौत को सामने देखकर भी इस वीर योद्धा के कदम पीछे नहीं हटे। Captain Anuj Nayyar ने चौथे बंकर को भी नष्ट किया और यह सुनिश्चित किया कि उनके साथी चोटी पर कब्जा कर सकें। अंतिम सांस लेने से पहले उन्होंने अपनी टीम को लक्ष्य हासिल करते देखा।

मरणोपरांत सम्मान और अनमोल विरासत

महावीर चक्र MVC
महावीर चक्र MVC

Captain Anuj Nayyar  की इस शहादत ने न केवल उनके परिवार को, बल्कि पूरे देश को गर्व से भर दिया। उनकी असाधारण वीरता के लिए भारत सरकार ने उन्हें मरणोपरांत महावीर चक्र (MVC) से सम्मानित किया। जिस ‘पॉइंट 4875’ पर उन्होंने अपने प्राणों की आहुति दी, उसे आज सेना में सम्मान के साथ ‘नय्यर हिल’ के नाम से पुकारा जाता है।

एक भावुक पहलू यह भी है कि युद्ध पर जाने से कुछ समय पहले ही उनकी सगाई हुई थी और कुछ ही महीनों बाद उनकी शादी होने वाली थी। उनके पिता आज भी उनकी यादों को संजोकर रखते हैं। वे अक्सर बताते हैं कि अनुज के जूतों को वे आज भी खुद पॉलिश करते हैं, मानो उनका बेटा अभी सरहद से लौटकर आएगा।

Captain Anuj Nayyar
Captain Anuj Nayyar

Captain Anuj Nayyar  की कहानी केवल युद्ध की कहानी नहीं है, बल्कि यह कहानी है उस जुनून की जो वतन की मिट्टी के लिए मर मिटने की प्रेरणा देता है। 24 साल की उम्र में जहाँ युवा अपने करियर की शुरुआत कर रहे होते हैं, अनुज ने देश के लिए सर्वोच्च बलिदान दे दिया। आज का युवा वर्ग उनसे नेतृत्व, साहस और अटूट कर्तव्यनिष्ठा की सीख ले सकता है।

Captain Anuj Nayyar जैसे नायकों के कारण ही आज हम चैन की नींद सो पाते हैं। उनके बलिदान को यह देश कभी नहीं भूलेगा।

जय हिंद, जय भारत!


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Captain Mahendra Nath Mulla (कैप्टन महेंद्र नाथ मुल्ला)- वह वीर जिसने अपने युद्धपोत के साथ अरब सागर को चुना जल समाधि के लिए https://shauryasaga.com/captain-mahendra-nath-mulla-ins-khukri-sacrifice/ https://shauryasaga.com/captain-mahendra-nath-mulla-ins-khukri-sacrifice/?noamp=mobile#respond Tue, 09 Dec 2025 09:56:19 +0000 https://shauryasaga.com/?p=6038

Captain Mahendra Nath Mulla (कैप्टन महेंद्र नाथ मुल्ला) – वह वीर जिसने अपने युद्धपोत के साथ अरब सागर को चुना जल समाधि के लिए

Captain Mahendra Nath Mulla
Captain Mahendra Nath Mulla

9 दिसंबर 1971 का दिन भारतीय नौसेना के इतिहास में शौर्य, बलिदान और नेतृत्व की एक अविस्मरणीय गाथा के रूप में दर्ज है। यह वह दिन था जब Captain Mahendra Nath Mulla(कैप्टन महेंद्र नाथ मुल्ला) ने अपने युद्धपोत आईएनएस खुखरी (INS Khukri) के साथ अरब सागर में जल समाधि ले ली। उनका यह असाधारण कार्य केवल वीरता नहीं था, बल्कि नौसेना नेतृत्व के सर्वोच्च सिद्धांत—“अपने साथियों को सबसे पहले”—को जीवन के अंतिम क्षणों तक निभाना था।


आईएनएस खुखरी: एक ऐतिहासिक त्रासदी

आईएनएस खुखरी
आईएनएस खुखरी

आईएनएस खुखरी भारतीय नौसेना का एक युद्धपोत था, जिसे 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान पश्चिमी मोर्चे पर तैनात किया गया था। 9 दिसंबर 1971 की रात, खुखरी गुजरात के दीव तट के पास गश्त पर थी, तभी पाकिस्तानी नौसेना की पनडुब्बी पीएनएस हंगोर (PNS Hangor) ने उस पर अचानक टॉरपीडो से हमला कर दिया।

हमला इतना तीव्र और घातक था कि युद्धपोत को संभलने का मौका नहीं मिला। टॉरपीडो के धमाकों से जहाज बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया और कुछ ही मिनटों में पानी में डूबने लगा। यह भारतीय नौसेना के इतिहास में एकमात्र युद्धपोत है जिसे युद्ध के दौरान दुश्मन ने डुबो दिया था।


Captain Mahendra Nath Mulla का असाधारण नेतृत्व

Captain Mahendra Nath Mulla
Captain Mahendra Nath Mulla

जब युद्धपोत जल रहा था और डूबने की कगार पर था, तब Captain Mahendra Nath Mulla ने जो निर्णय लिया, वह उन्हें एक सामान्य कप्तान से एक महान नायक के रूप में प्रतिष्ठित करता है।

समय को हाथ से निकलता देख, Captain Mahendra Nath Mulla ने जहाज को बचाने के असंभव प्रयास में ऊर्जा बर्बाद करने के बजाय, अपने 18 अधिकारियों और 176 नाविकों को बचाने को प्राथमिकता दी।

  • निजी सुरक्षा पर साथियों की जान: Captain Mahendra Nath Mulla जानते थे कि उनके कई साथी जहाज के निचले डेक में फंसे हुए थे। अपनी चोटों की परवाह न करते हुए, उन्होंने खुद आगे बढ़कर उन सभी सैनिकों को बाहर निकालना शुरू कर दिया जिन्हें वे बचा सकते थे।

  • लाइफ जैकेट का त्याग: Captain Mahendra Nath Mulla के पास स्वयं को बचाने का हर मौका था, लेकिन उन्होंने अपनी लाइफ जैकेट अपने एक जूनियर अधिकारी को सौंप दी। उन्होंने उसे और अन्य साथियों को जहाज से तुरंत उतरने का आदेश दिया।

  • अंतिम क्षण की छवि: जिन सैनिकों को Captain Mahendra Nath Mulla ने बचाया था, उन्होंने बताया कि उनके अंतिम क्षणों में भी इस असाधारण लीडर का धैर्य अद्भुत था। जलते हुए पोत पर, Captain Mahendra Nath Mulla जहाज की रेलिंग पकड़े खड़े थे और उनके हाथ में जलती हुई सिगरेट थी, जो उनके शांत और अदम्य साहस को दर्शाता है।

इस महान व्यक्ति ने अपनी आखिरी साँस तक अपने साथियों को बचाने में अपना जीवन लगा दिया।


सर्वोच्च बलिदान और सम्मान

महावीर चक्र MVC
महावीर चक्र MVC

आईएनएस खुखरी ने अपने 18 अधिकारियों, 176 नाविकों और एक बहादुर कप्तान के साथ अरब सागर में जल समाधि ले ली।

देश के सम्मान और अपने साथियों के प्रति इस अतुलनीय नेतृत्व और सर्वोच्च बलिदान के लिए, Captain Mahendra Nath Mulla को मरणोपरांत भारत के दूसरे सर्वोच्च सैन्य सम्मान महावीर चक्र (Maha Vir Chakra) से सम्मानित किया गया।

नौसेना का त्वरित प्रतिशोध

Captain Mahendra Nath Mulla और उनके साथियों का बलिदान व्यर्थ नहीं गया। भारतीय नौसेना ने 48 घंटों के भीतर ही कराची की बंदरगाह पर कब्जा कर लिया और इस त्रासदी का तुरंत बदला लिया। भारतीय नौसेना के इस त्वरित और निर्णायक एक्शन ने युद्ध का रुख मोड़ दिया।


दीव में स्मारक

इन सभी बहादुर योद्धाओं की शहादत को अमर बनाने के लिए दीव (Diu) में एक प्रेरणादायक स्मारक स्थापित किया गया है।

  • स्थान: यह स्मारक समुद्र के सामने एक पहाड़ी की चोटी पर स्थित है।

  • डिज़ाइन: स्मारक के पास ही कांच के चैंबर में आईएनएस खुखरी का एक छोटा मॉडल रखा गया है, जो इस वीरगाथा की याद दिलाता है।

  • उद्घाटन: इसका उद्घाटन 15 दिसंबर 1999 को तत्कालीन कमांडिंग-इन-चीफ फ्लैग ऑफिसर, वाइस एडमिरल माधवेन्द्र सिंह ने किया था।

Captain Mahendra Nath Mulla की गाथा भारतीय सेना और नौसेना के प्रत्येक सदस्य के लिए एक पाठ है कि सच्चा नेतृत्व निजी सुरक्षा से ऊपर कर्तव्य और साथी सैनिकों के जीवन को रखता है। उनके बलिदान को राष्ट्र हमेशा याद रखेगा।

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Major Vivek Gupta MVC मेजर विवेक गुप्ता :कारगिल युद्ध के नायक ,महावीर चक्र  https://shauryasaga.com/major-vivek-gupta-kargil-hero-mahavir-chakra/ https://shauryasaga.com/major-vivek-gupta-kargil-hero-mahavir-chakra/?noamp=mobile#respond Wed, 03 Dec 2025 10:33:14 +0000 https://shauryasaga.com/?p=6009

टोलोलिंग चोटी पर भारतीय तिरंगा फहराने वाला सूरमा

Major Vivek Gupta MVC मेजर विवेक गुप्ता (2 जनवरी 1970 – 13 जून 1999) भारतीय सेना के एक अत्यंत वीर अधिकारी थे, जिन्हें 1999 के कारगिल युद्ध (ऑपरेशन विजय) में उनके अदम्य साहस और नेतृत्व के लिए मरणोपरांत भारत के दूसरे सर्वोच्च युद्धकालीन सैन्य सम्मान महावीर चक्र (MVC) से सम्मानित किया गया था। वह 2 राजपूताना राइफल्स (2 Raj Rif) बटालियन का हिस्सा थे।

प्रारंभिक जीवन और सैन्य यात्रा

Major Vivek Gupta MVC
Major Vivek Gupta MVC
  • जन्म और परिवार: मेजर विवेक गुप्ता का जन्म 2 जनवरी 1970 को देहरादून, उत्तराखंड में हुआ था। उनके पिता भी सेना में लेफ्टिनेंट कर्नल बीआरएस गुप्ता थे।

  • शिक्षा और कमीशन: उन्होंने नेशनल डिफेंस एकेडमी (NDA) और इंडियन मिलिट्री एकेडमी (IMA) से प्रशिक्षण प्राप्त किया। 13 जून 1992 को, उन्हें अपने शौर्य के लिए प्रसिद्ध इन्फैंट्री रेजिमेंट राजपूताना राइफल्स में कमीशन मिला।

  • विवाह और सेवा: 1997 में, उन्होंने सेना अधिकारी कैप्टन राजश्री बिष्ट से विवाह किया। उन्हें उनकी असाधारण क्षमताओं के लिए चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ (COAS) कमेंडेशन कार्ड से भी नवाजा गया था और वह महू के इन्फैंट्री स्कूल में एक हथियार प्रशिक्षक के रूप में नियुक्त किए गए थे।

कारगिल युद्ध में वीरता (जून 1999)

operatin vijay
operatin vijay

जब भारतीय सेना के पास घुसपैठ की सीमा के बारे में पर्याप्त जानकारी नहीं थी, तब 2 राजपूताना राइफल्स को युद्ध में उतारा गया। Major Vivek Gupta मेजर विवेक गुप्ता और उनकी चार्ली कंपनी को द्रास सेक्टर में टोलोलिंग चोटी (Point 4590) पर स्थित शत्रु चौकियों पर फिर से कब्जा करने का महत्वपूर्ण और खतरनाक मिशन सौंपा गया।

यह मिशन बहुत कठिन था क्योंकि दुश्मन एक ऊँचे और सुरक्षित स्थान पर डटा हुआ था, जिससे वे नीचे की ओर चढ़ने वाले भारतीय सैनिकों पर आसानी से हमला कर सकते थे।

टोलोलिंग पर निर्णायक हमला

tololing
tololing

13 जून 1999 को, जब 2 राजपूताना राइफल्स ने टोलोलिंग टॉप पर बटालियन हमला शुरू किया, मेजर विवेक गुप्ता अग्रणी चार्ली कंपनी की कमान संभाल रहे थे।

  1. भारी गोलीबारी का सामना: भारी तोपखाने और स्वचालित हथियारों की गोलीबारी के बावजूद, मेजर गुप्ता के नेतृत्व में कंपनी दुश्मन के करीब पहुँचने में सफल रही।

  2. तीव्र जवाबी हमला: जैसे ही कंपनी खुले में आई, उन पर कई दिशाओं से तीव्र गोलीबारी हुई, जिससे कंपनी के तीन जवान घायल हो गए और हमला अस्थायी रूप से रुक गया।

  3. साहसी नेतृत्व: Major Vivek Gupta को पता था कि खुले में रुकना अधिक नुकसानदायक होगा। उन्होंने तुरंत प्रतिक्रिया व्यक्त की और दुश्मन की चौकी पर रॉकेट लॉन्चर से फायर किया।

  4. आमने-सामने की भीषण लड़ाई: इससे पहले कि स्तब्ध दुश्मन संभल पाता, Major Vivek Gupta ने दुश्मन की चौकी की ओर दौड़ लगा दी। इस दौरान, उन्हें दो गोलियाँ लगीं, लेकिन उन्होंने आगे बढ़ना जारी रखा। चौकी पर पहुँचकर, उन्होंने अपनी चोटों के बावजूद दुश्मन के साथ भयंकर आमने-सामने की लड़ाई की और तीन शत्रु सैनिकों को मार गिराया।

  5. चोटी पर कब्जा: अपने अधिकारी के वीरतापूर्ण कार्य से प्रेरणा लेकर, कंपनी के बाकी सैनिकों ने दुश्मन की चौकी पर हमला कर दिया और उस पर कब्जा कर लिया

सर्वोच्च बलिदान: हालांकि, इस भीषण मुकाबले के दौरान, मेजर विवेक गुप्ता को दुश्मन की एक और गोली लगी और वह अंततः अपनी चोटों के कारण शहीद हो गए। यह ठीक उसी दिन हुआ जब उन्होंने आठ साल पहले राजपूताना राइफल्स में कमीशन प्राप्त किया था।

Major Vivek Gupta MVC मेजर विवेक गुप्ता का यह असाधारण पराक्रम और प्रेरणादायक नेतृत्व ही टोलोलिंग चोटी पर कब्जा करने का मुख्य कारण बना।

महावीर चक्र से सम्मान

महावीर चक्र MVC
महावीर चक्र MVC

राष्ट्र के प्रति उनके सर्वोच्च बलिदान और विशिष्ट वीरता के लिए, उन्हें 15 अगस्त 2000 को तत्कालीन राष्ट्रपति के. आर. नारायणन द्वारा मरणोपरांत महावीर चक्र से सम्मानित किया गया।

Major Vivek Gupta मेजर विवेक गुप्ता की कहानी भारतीय सेना के ‘सर्वप्रथम कर्तव्य’ की भावना का प्रतीक है और वह हमेशा देश की युवा पीढ़ियों के लिए प्रेरणा स्रोत बने रहेंगे।

Major Vivek Gupta MVC
Major Vivek Gupta MVC

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राम कृष्ण वधवा Assistant Commandant Ram Krishna Wadhwa: 1971 war अदम्य साहस की प्रतिमूर्ति,राजा माहतम की ऐतिहासिक विजय https://shauryasaga.com/assistant-commandant-ram-krishna-wadhwa/ https://shauryasaga.com/assistant-commandant-ram-krishna-wadhwa/?noamp=mobile#respond Fri, 21 Nov 2025 09:44:36 +0000 https://shauryasaga.com/?p=5970

सहायक कमांडेंट राम कृष्ण वधवा: अदम्य साहस की प्रतिमूर्ति,राजा माहतम की ऐतिहासिक विजय

भारतीय सैन्य इतिहास के पन्नों में 1971 का भारत-पाक युद्ध स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है। यह वह युद्ध था जिसने न केवल विश्व का भूगोल बदला, बल्कि वीरता की ऐसी कहानियां भी दीं, जो आज भी हमारी धमनियों में राष्ट्रभक्ति का संचार करती हैं। जब हम इस युद्ध की बात करते हैं, तो अक्सर नियमित सेना (Indian Army) की चर्चा होती है, लेकिन सीमा सुरक्षा बल (BSF) के प्रहरियों ने जो शौर्य इस युद्ध में दिखाया, वह अद्वितीय है।

आज हम एक ऐसे ही महानायक, सहायक कमांडेंट राम कृष्ण वधवा की कहानी जानेंगे, जिन्होंने पश्चिमी मोर्चे पर ‘राजा माहतम’ की चौकी को वापस पाने और उसकी रक्षा करने के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी। उन्हें मरणोपरांत महावीर चक्र (Maha Vir Chakra) से सम्मानित किया गया।

राम कृष्ण वधवा
राम कृष्ण वधवा

एक योद्धा का जन्म और प्रारंभिक सफर

राम कृष्ण वधवा का जन्म 10 नवम्बर, 1940 को वीरों की धरती पंजाब के जालंधर में हुआ था। उनके पिता श्री डी.सी. वधवा ने उन्हें बचपन से ही अनुशासन और देशप्रेम के संस्कार दिए थे। युवा राम कृष्ण का सपना वर्दी पहनकर देश की सेवा करना था। यह सपना 02 फरवरी, 1964 को पूरा हुआ जब उन्हें ‘रेजीमेंट ऑफ आर्टिलरी’ (तोपखाना) में कमीशन मिला।

सेना में अपनी सेवाएं देने के बाद, वर्दी के प्रति उनका मोह कम नहीं हुआ। 1968 में सेना से सेवानिवृत्त होने के तुरंत बाद, वे सीमा सुरक्षा बल (BSF) में शामिल हो गए। नियति ने उन्हें देश की रक्षा की पहली पंक्ति यानी BSF में एक बड़ी भूमिका निभाने के लिए चुना था।

1971 का युद्ध और राजा माहतम की चुनौती

दिसंबर 1971 में जब युद्ध का बिगुल बजा, तब सहायक कमांडेंट वधवा की यूनिट पश्चिमी मोर्चे पर तैनात थी। पंजाब के फिरोजपुर सेक्टर में सतलुज नदी के पास स्थित राजा माहतम (Raja Mahtam) क्षेत्र रणनीतिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण था।

युद्ध की शुरुआत में ही भारत को एक बड़ा झटका लगा। 05 दिसम्बर, 1971 को दुश्मन ने भारी संख्याबल और गोलाबारी के दम पर BSF की राजा माहतम पिकेट (चौकी) पर कब्जा कर लिया। यह क्षेत्र सामरिक दृष्टि से संवेदनशील था, इसलिए इसे किसी भी कीमत पर वापस लेना अनिवार्य था। यह “असंभव” सा दिखने वाला कार्य सहायक कमांडेंट वधवा को सौंपा गया।

5 दिसम्बर: विजय का शंखनाद

दुश्मन ने चौकी पर कब्जा करने के बाद वहां अपनी स्थिति बहुत मजबूत कर ली थी। उन्होंने पिकेट के चारों ओर मशीन गन पोस्ट बना ली थीं और संख्या में वे भारतीय टुकड़ी से कई गुना अधिक थे।

लेकिन वधवा हार मानने वालों में से नहीं थे। 5 दिसम्बर को उन्होंने अपनी दो प्लाटूनों के साथ दुश्मन पर धावा बोल दिया। दुश्मन ने उन पर मशीन गनों से गोलियों की बौछार कर दी। स्थिति यह थी कि आगे बढ़ने का मतलब था सीधे मौत के मुंह में जाना, क्योंकि रास्ता बारूदी सुरंगों (Minefields) से भरा था।

“वधवा किसी प्रकार की असफलता के लिए तैयार नहीं थे।”

अपनी जान की परवाह किए बिना, वधवा ने नेतृत्व की एक नई मिसाल कायम की। वे खुद सबसे आगे रहे और अपने जवानों को बारूदी सुरंगों वाले क्षेत्र से सुरक्षित निकालते हुए दुश्मन के बेहद करीब ले गए। अपने कमांडर को मौत की आंखों में आंखें डालते देख, जवानों का खून खौल उठा। उन्होंने दुश्मन पर भीषण आक्रमण किया। संख्या में कम होने के बावजूद, वधवा के नेतृत्व में BSF ने दुश्मन को खदेड़ दिया और राजा माहतम चौकी पर पुनः तिरंगा लहरा दिया।

10 दिसम्बर: सर्वोच्च बलिदान

सहायक कमांडेंट राम कृष्ण वधवा
सहायक कमांडेंट राम कृष्ण वधवा

पराजित शत्रु अपमान की आग में जल रहा था। चौकी वापस पाने के लिए दुश्मन ने 10 दिसम्बर को तोपखाने और मोर्टार की भीषण गोलाबारी की आड़ में एक विशाल जवाबी हमला (Counter-attack) किया।

इस समय वधवा ने जो धैर्य और साहस दिखाया, वह रोंगटे खड़े कर देने वाला था। भारी बमबारी के बीच, जब सिर उठाना भी मुश्किल था, वधवा एक बंकर में सुरक्षित बैठने के बजाय बाहर निकल आए। वे एक खाई (Trench) से दूसरी खाई में दौड़-दौड़कर अपने साथियों का हौसला बढ़ाते रहे और उन्हें दुश्मन को मुहंतोड़ जवाब देने के लिए प्रेरित करते रहे।

उनकी उपस्थिति मात्र से ही घायल सैनिकों में भी लड़ने की शक्ति आ गई। BSF के जवानों ने दुश्मन को भारी नुकसान पहुँचाया और उन्हें आगे नहीं बढ़ने दिया। लेकिन, इसी दौरान अपने साथियों की सुरक्षा सुनिश्चित करते हुए, वधवा दुश्मन की गोलाबारी की चपेट में आ गए। उन्हें घातक चोटें आईं और वे रणभूमि में ही वीरगति को प्राप्त हुए।

मरणोपरांत महावीर चक्र

महावीर चक्र MVC
महावीर चक्र MVC

सहायक कमांडेंट राम कृष्ण वधवा का बलिदान व्यर्थ नहीं गया। उनके नेतृत्व के कारण ही राजा माहतम की वह महत्वपूर्ण चौकी भारत के कब्जे में रही। उनके अदम्य साहस, असाधारण नेतृत्व और कर्तव्यनिष्ठा के लिए उन्हें भारत सरकार द्वारा मरणोपरांत महावीर चक्र से अलंकृत किया गया।

राम कृष्ण वधवा की कहानी हमें याद दिलाती है कि देश की सीमाएं कंक्रीट की दीवारों से नहीं, बल्कि ऐसे वीरों के फौलादी इरादों से सुरक्षित रहती हैं। उनका जीवन हम सभी के लिए प्रेरणा का एक अनंत स्रोत है।

जय हिन्द!


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Captain Shankar Shankhapan Walkar कैप्टन शंकर शंखपण वाल्कर – महावीर चक्र विजेता https://shauryasaga.com/captain-shankar-shankhapan-walkar-maha-vir-chakra/ https://shauryasaga.com/captain-shankar-shankhapan-walkar-maha-vir-chakra/?noamp=mobile#respond Tue, 18 Nov 2025 08:50:29 +0000 https://shauryasaga.com/?p=5948

कैप्टन शंकर शंखपण वाल्कर – महावीर चक्र विजेता

इतिहास में कुछ नाम ऐसे होते हैं जो केवल रिकॉर्ड का हिस्सा नहीं होते, बल्कि वे निस्वार्थ सेवा, अदम्य साहस और सर्वोच्च बलिदान की अमर गाथा बन जाते हैं। भारतीय सेना के जांबाज कैप्टन शंकर शंखपण वाल्कर (आईसी 23473), ऐसे ही एक वीर योद्धा थे, जिन्होंने 1971 के भारत-पाक युद्ध में अपनी असाधारण बहादुरी से देश की रक्षा करते हुए वीरगति प्राप्त की। उनकी अद्वितीय वीरता के लिए उन्हें मरणोपरांत भारत के दूसरे सबसे बड़े सैन्य अलंकरण महावीर चक्र से सम्मानित किया गया।

प्रारंभिक जीवन और सैन्य यात्रा

कैप्टन शंकर शंखपण वाल्कर
कैप्टन शंकर शंखपण वाल्कर

कैप्टन शंकर शंखपण वाल्कर का जन्म 08 मार्च, 1943 को महाराष्ट्र के कडगांव में हुआ था। उनके पिता श्री शखाराम खैरु वाल्कर थे। बचपन से ही देश सेवा का भाव रखने वाले कैप्टन शंकर शंखपण वाल्कर ने 15 जून, 1969 को भारतीय सेना की प्रतिष्ठित मद्रास रेजीमेंट में कमीशन प्राप्त किया। अपनी कमीशनिंग के मात्र दो वर्षों के भीतर, उन्हें राष्ट्र की रक्षा में अपना कौशल दिखाने का अवसर मिला, जो भारतीय सैन्य इतिहास में हमेशा के लिए दर्ज हो गया।

1971 के रणक्षेत्र में कर्तव्यनिष्ठा

1971 war
1971 का भारत-पाक युद्ध

जब 1971 का भारत-पाक युद्ध छिड़ा, तब कैप्टन शंकर शंखपण वाल्कर राजस्थान सेक्टर में 18 मद्रास बटालियन के साथ मोर्टार अफसर (Mortar Officer) के रूप में तैनात थे। उनकी बटालियन को गदरा-छाचरो अक्ष पर आगे बढ़ने का महत्वपूर्ण कार्य सौंपा गया था।

बटालियन ने दुश्मन के कड़े प्रतिरोध और सारे अवरोधों को सफलतापूर्वक पार करते हुए, 04 दिसम्बर को गदरा नगर पर कब्जा कर लिया। उनकी अग्रिम कार्रवाई 16 दिसम्बर को हिंगोर तार तक पहुँची, जहाँ दुश्मन ने एक अत्यंत मजबूत रक्षात्मक मोर्चा बना रखा था। भारतीय सैनिकों को भीषण गोलाबारी का सामना करना पड़ा, और इस चुनौती से निपटने का जिम्मा कैप्टन वाल्कर के कंधों पर था।

घावों की उपेक्षा कर नेतृत्व

भयंकर गोलाबारी के बीच, कैप्टन शंकर शंखपण वाल्कर ने अपनी सुरक्षा को पूरी तरह से नजरअंदाज करते हुए, रक्षात्मक गोलाबारी के कार्य को प्रभावी ढंग से समन्वयित करने के लिए हर कंपनी के ठिकाने का दौरा किया। वे लगातार आगे की चौकियों पर जाकर स्थिति का जायजा लेते रहे और सैनिकों का हौसला बढ़ाते रहे।

इसी दौरान, दुश्मन की गोलाबारी में उन्हें दो बार किर्चे (स्पलिंटर्स) लगीं और वे गंभीर रूप से घायल हो गए। युद्ध के नियम के अनुसार, उन्हें चिकित्सा के लिए युद्ध भूमि से निकाला जाना चाहिए था, लेकिन इस बहादुर अधिकारी ने निकासी के लिए स्पष्ट असहमति प्रकट की। उनके लिए, अपने व्यक्तिगत घावों से ज्यादा महत्वपूर्ण बटालियन का मिशन और उनके साथी सैनिकों की सुरक्षा थी। वह अपने घायल शरीर के साथ भी मोर्चे पर डटे रहे।

मोर्टार प्लाटून का अंतिम संघर्ष

रात भर गोलाबारी जारी रहने के बाद, सुबह दुश्मन ने “ए” और “डी” कंपनियों के ठिकानों पर भयानक हमला कर दिया। आक्रमण इतना भीषण था कि ये दोनों कंपनियाँ पीछे हटने को मजबूर हो गईं, जिससे बटालियन मुख्यालय और कैप्टन शंकर शंखपण वाल्कर की मोर्टार प्लाटून दुश्मन के सामने अरक्षित हो गई। स्थिति अत्यंत खतरनाक थी, क्योंकि उन्हें भारतीय तोपखाने से कोई सहायता भी उपलब्ध नहीं थी।

संकट की इस घड़ी में, घायल कैप्टन शंकर शंखपण वाल्कर का नेतृत्व अद्भुत और प्रेरणादायक साबित हुआ। उन्होंने अपनी मोर्टार प्लाटून को प्रेरित किया और व्यक्तिगत रूप से मार्टर फायर का निर्देशन करना जारी रखा। उनके सटीक निर्देशन और अदम्य साहस ने दुश्मन को भारी नुकसान पहुँचाया। इस रक्षात्मक झड़प के दौरान, कैप्टन शंकर शंखपण वाल्कर ने खुद भी अपनी राइफल से कम से कम चार शत्रुओं को मार गिराया

इस भयंकर और असमान संघर्ष में, देश की रक्षा करते हुए, बहादुर कैप्टन शंकर शंखपण वाल्कर को घातक चोटें आईं और उन्होंने वहीं वीरगति प्राप्त की। इस लड़ाई में बटालियन के 2 जेसीओ और 18 अन्य सैनिक भी शहीद हुए, जबकि 3 अफसर, 2 जेसीओ और 8 अन्य लापता रहे या मारे गए।

महावीर चक्र

महावीर चक्र MVC
महावीर चक्र MVC

कैप्टन शंकर शंखपण वाल्कर ने न केवल अपने दायित्व का निर्वहन किया, बल्कि उन्होंने व्यक्तिगत खतरे और गंभीर चोट के बावजूद, अंतिम क्षण तक लड़कर सैन्य नेतृत्व का एक अभूतपूर्व मानक स्थापित किया। उनकी उत्कृष्ट वीरता, प्रेरक नेतृत्व और अनुकरणीय कर्तव्यनिष्ठा के लिए, राष्ट्र ने उन्हें मरणोपरांत महावीर चक्र से सम्मानित किया।

कैप्टन शंकर शंखपण वाल्कर की कहानी हमें याद दिलाती है कि हमारे देश की स्वतंत्रता उन वीरों के सर्वोच्च बलिदान पर टिकी है, जो ‘पहले मैं नहीं, बल्कि तुम’ के सिद्धांत पर जीते और मरते हैं।

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]]> https://shauryasaga.com/captain-shankar-shankhapan-walkar-maha-vir-chakra/feed/ 0 5948 Lance Naik Shanghara Singh लांस नायक शंघारा सिंह, महावीर चक्र (मरणोपरांत): शौर्य गाथा https://shauryasaga.com/%e0%a4%b2%e0%a4%be%e0%a4%82%e0%a4%b8-%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%af%e0%a4%95-%e0%a4%b6%e0%a4%82%e0%a4%98%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%be-%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%82%e0%a4%b9-lance-naik-shanghara-singh/ https://shauryasaga.com/%e0%a4%b2%e0%a4%be%e0%a4%82%e0%a4%b8-%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%af%e0%a4%95-%e0%a4%b6%e0%a4%82%e0%a4%98%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%be-%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%82%e0%a4%b9-lance-naik-shanghara-singh/?noamp=mobile#respond Mon, 17 Nov 2025 08:15:43 +0000 https://shauryasaga.com/?p=5937

Lance Naik Shanghara Singh लांस नायक शंघारा सिंह, महावीर चक्र (मरणोपरांत):

शौर्य गाथा

लांस नायक शंघारा सिंह भारतीय सेना के उन वीर सपूतों में से एक हैं, जिनका बलिदान आज भी हर भारतीय को देश के प्रति समर्पण की प्रेरणा देता है। 1971 के भारत-पाक युद्ध में, उन्होंने अदम्य साहस और अद्वितीय कर्तव्यपरायणता का प्रदर्शन करते हुए, अपनी जान न्योछावर कर दी, जिसके लिए उन्हें मरणोपरांत भारत के दूसरे सबसे बड़े सैन्य अलंकरण महावीर चक्र से सम्मानित किया गया।

लांस नायक शंघारा सिंह
लांस नायक शंघारा सिंह

प्रारंभिक जीवन और सैन्य यात्रा

लांस नायक शंघारा सिंह का जन्म 14 जनवरी, 1945 को पंजाब के अमृतसर जिले के चोला साहिब गांव में हुआ था। उनके पिता का नाम श्री नारंग सिंह था। अपनी जन्म तिथि के ठीक 18 साल बाद, यानी 14 जनवरी, 1963 को, उन्होंने भारतीय सेना की प्रतिष्ठित 2 सिक्ख रेजीमेंट में कदम रखा। उन्होंने अपनी शुरुआती सेवा में ही एक निष्ठावान और बहादुर सैनिक के रूप में अपनी पहचान बना ली थी।

1971 का भारत-पाक युद्ध और पुलकंजरी की लड़ाई

1971 war
1971 का भारत-पाक युद्ध

1971 में, जब भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध छिड़ा, तब 2 सिक्ख रेजीमेंट को पश्चिमी मोर्चे के अमृतसर सेक्टर में तैनात किया गया था। युद्ध शुरू होने से पहले ही, पाकिस्तानी सेना ने अंतर्राष्ट्रीय सीमा के पास स्थित सामरिक रूप से महत्वपूर्ण भारतीय गांव पुलकंजरी पर कब्जा कर लिया था। इस फीचर पर पुनः अधिकार करना भारतीय सेना के लिए अत्यंत आवश्यक था।

2 सिक्ख रेजीमेंट को इस महत्वपूर्ण लक्ष्य को हासिल करने का आदेश मिला। दुश्मन ने इस गांव को एक दुर्जेय गढ़ में बदल दिया था—गांव के चारों ओर टैंकरोधी और नररोधी सुरंगें बिछा दी गई थीं, और उनकी सुरक्षा को मशीन गन की भारी गोलाबारी से मजबूत कर दिया गया था। 17 दिसंबर, 1971 को आखिरकार आक्रमण का निर्णय लिया गया।

वीरता की पराकाष्ठा: अकेले ही दुश्मन को चुनौती

लांस नायक शंघारा सिंह
लांस नायक शंघारा सिंह

आक्रमण के समय, लांस नायक शंघारा सिंह बाएँ पक्ष में स्थित सेक्शन के द्वितीय कमान अफसर थे। जैसे ही उनका सेक्शन लक्ष्य की ओर बढ़ा, वे दुश्मन की दो मशीनगनों की घातक गोलाबारी की चपेट में आ गए और उनका आगे बढ़ना रुक गया। इस नाजुक क्षण में, शंघारा सिंह ने वह निर्णय लिया जिसने उन्हें अमर कर दिया।

  1. पहले बंकर पर हमला: उन्होंने अपनी जान की परवाह न करते हुए, सुरंग क्षेत्र की बाधा को पार किया और सीधे दुश्मन की पहली मशीन गन चौकी की ओर दौड़े। उन्होंने बंकर के अंदर एक हथगोला फेंककर उस मशीन गन को तुरंत नष्ट कर दिया।

  2. दूसरी मशीन गन पर कब्जा: इसके बाद, वे तुरंत दूसरी मशीन गन की ओर झपटे। उन्होंने लूपहोल पर से कूदकर दुश्मन पर काबू पाया और तोप छीन ली।

इसी साहसिक कार्य के दौरान, उनके पेट में दुश्मन की गोली की बौछार लगी, जिससे उन्हें गंभीर चोट आई। खून से लथपथ होने के बावजूद, उन्होंने मशीन गन पर अपनी पकड़ नहीं छोड़ी। उनका यह अप्रत्याशित और निर्भीक आक्रमण दुश्मन के लिए इतना हतोत्साहित करने वाला था कि वे आतंकित होकर भाग खड़े हुए।

इस एकल-व्यक्ति आक्रमण में, लांस नायक शंघारा सिंह ने आठ शत्रुओं को मार गिराया। उनके सर्वोच्च बलिदान ने सिक्ख सैनिकों को आगे बढ़ने और दुश्मन की चौकी को पूरी तरह से रौंद डालने का मार्ग प्रशस्त किया।

मरणोपरांत महावीर चक्र

महावीर चक्र MVC
महावीर चक्र MVC

लांस नायक शंघारा सिंह ने अपनी जान देकर भी अपनी रेजीमेंट की विजय सुनिश्चित की। उनका बलिदान व्यर्थ नहीं गया; यह उत्कृष्ट वीरता, असाधारण नेतृत्व और कर्तव्यपरायणता का वह प्रतीक बन गया, जिसके लिए उन्हें मरणोपरांत महावीर चक्र से अलंकृत किया गया।

उनकी कहानी हमें सिखाती है कि सच्चा साहस केवल लड़ना नहीं, बल्कि सबसे कठिन समय में, व्यक्तिगत सुरक्षा की परवाह किए बिना, अपने साथियों और देश के लिए आगे बढ़ना है। लांस नायक शंघारा सिंह का नाम भारतीय सेना के इतिहास में वीरता की एक सुनहरी दास्तान के रूप में सदैव दर्ज रहेगा।

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एस एस 22826
महावीर चक्र (मरणोपरांत)

आज हम बात करेंगे एक ऐसे वीर सिपाही की, जिन्होंने अपनी जान की परवाह न करते हुए देश की रक्षा के लिए सर्वस्व न्योछावर कर दिया। सेकंड लेफ्टिनेंट शमशेर सिंह सामरा – पंजाब की मिट्टी से निकले एक जांबाज़, जिनका बलिदान 1971 के भारत-पाक युद्ध में हिली के मैदान में अमर हो गया।

शमशेर सिंह सामरा
शमशेर सिंह सामरा

प्रारंभिक जीवन: पंजाब की धरती से निकला सूरमा

सेकंड लेफ्टिनेंट शमशेर सिंह सामरा का जन्म 10 जून 1945 को पंजाब के अमृतसर जिले के छोटे से गांव परवोकी में हुआ था। यह गांव पंजाब की हरियाली और सिख संस्कृति की जीवंतता का प्रतीक है, जहां खेतों की महक और मेहनतकश लोगों की कहानियां हवा में घुली रहती हैं।

उनके पिता, श्री जी.एस. सामरा, एक साधारण लेकिन गर्वीले परिवार के मुखिया थे, जिन्होंने अपने बेटे में देशभक्ति और अनुशासन की भावना बचपन से ही डाली।

शमशेर सिंह सामरा का बचपन गांव की मिट्टी में खेलते-कूदते बीता। वे पढ़ाई में होशियार थे और खेलकूद में आगे। लेकिन उनकी आंखों में हमेशा एक चमक थी – सेना में जाने की। 1960 के दशक में भारत-पाक तनाव बढ़ रहा था, और युवा शमशेर ने भारतीय थल सेना को अपना करियर चुना। 15 मार्च 1970 को उन्हें 8 गोरखा राइफल्स (8 गोरखा राइफल्स बटालियन) में कमीशन मिला।

गोरखा रेजिमेंट – नेपाली और भारतीय गोरखाओं की बहादुरी की मिसाल – में शामिल होना अपने आप में गर्व की बात थी। मात्र 25 वर्ष की उम्र में वे सेकंड लेफ्टिनेंट बन गए, और उनकी यूनिट को जल्द ही युद्ध के मोर्चे पर भेजा जाने वाला था।

1971 का युद्ध: पूर्वी मोर्चे पर हिली का किला

1971 का भारत-पाक युद्ध न केवल दो देशों का संघर्ष था, बल्कि बांग्लादेश की स्वतंत्रता की लड़ाई भी। पूर्वी मोर्चे पर पाकिस्तानी सेना ने अपनी पोजीशनें इतनी मजबूत बना ली थीं कि उन्हें तोड़ना असंभव लगता था।

हिली क्षेत्र (अब बांग्लादेश में) पाकिस्तान की रक्षा की कुंजी था। यहां की हर इमारत को किलेबंदी दी गई थी – प्रत्येक घर एक किला बन चुका था। हर टीले को खोदकर सेलप्रूफ पिलबॉक्स (गोला-प्रूफ बंकर) बना दिए गए थे। दुश्मन के पास स्वचालित हथियार, मशीन गनें और क्रॉसफायर की पूरी व्यवस्था थी।

8 गोरखा राइफल्स को इसी हिली कॉम्प्लेक्स पर कब्जा करने का जिम्मा सौंपा गया। यह यूनिट अपनी बहादुरी के लिए मशहूर थी – “कायर गोरखा मरे, बहादुर गोरखा जिए” उनका नारा था। लेकिन हिली में कई रक्तरंजित लड़ाइयां लड़ी गईं। पाकिस्तानी सैनिकों की भारी गोलाबारी ने कई हमलों को रोक दिया। हजारों गोले बरस रहे थे, और भारतीय सैनिकों की जान पर बन आई थी।

संकट की घड़ी: प्लाटून का नेतृत्व और अदम्य साहस

शमशेर सिंह सामरा एक निर्णायक हमले में दुश्मन की लाइट मशीन गनों (LMG) की क्रॉसफायर ने 8 गोरखा को रोक दिया। कंपनी की बाईं धावामार प्लाटून का नेतृत्व कर रहे सेकंड लेफ्टिनेंट शमशेर सिंह सामरा ने इस संकट में अपनी असली परीक्षा दी। वे जानते थे कि रुकना मतलब हार है। सैनिकों को प्रेरित करते हुए उन्होंने ललकारा: “आगे बढ़ो! देश के लिए!”

दुश्मन की दो LMG की क्रॉसफायर की परवाह न करते हुए, वे प्लाटून को दुश्मन की पोजीशन से मात्र 25 मीटर की दूरी तक ले गए। यह दूरी मौत की दहलीज थी। अचानक, एक LMG का गोला उनके सीने के दाहिने तरफ लगा।

खून बहने लगा, लेकिन शमशेर रुके नहीं। चोट की पीड़ा को नजरअंदाज कर उन्होंने नजदीकी मीडियम मशीन गन (MMG) बंकर पर हैंड ग्रेनेड फेंका और उसे उड़ा दिया। बंकर में धमाका हुआ, दुश्मन के सैनिक मारे गए।

अब वे दूसरे बंकर की ओर दौड़े। ग्रेनेड फेंकने ही वाले थे कि LMG की दूसरी बौछार उनके सीने में लगी। यह घाव घातक था। फिर भी, वे लड़खड़ाते हुए बंकर को एक हाथ से पकड़े रहे और दूसरे हाथ में ग्रेनेड थामे जमीन पर गिर पड़े। उनकी आंखें बंद हो गईं, लेकिन चेहरे पर धैर्य और दृढ़ निश्चय की झलक साफ झलक रही थी – मानो कह रहे हों, “मिशन पूरा हुआ!”

बलिदान का फल: हिली पर विजय और महावीर चक्र

शमशेर सिंह सामरा का बलिदान व्यर्थ नहीं गया। उनके साहस से प्रेरित होकर प्लाटून ने बंकरों को नेस्तनाबूद कर दिया, और 8 गोरखा राइफल्स ने हिली कॉम्प्लेक्स पर कब्जा कर लिया। यह जीत पूर्वी मोर्चे पर भारत की बढ़त का महत्वपूर्ण कदम थी। लेकिन कीमत थी एक युवा अधिकारी की जान।

उनकी अत्यंत वीरता, नेतृत्व और दृढ़ता के लिए भारत सरकार ने उन्हें महावीर चक्र (मरणोपरांत) से सम्मानित किया। महावीर चक्र भारत का दूसरा सर्वोच्च युद्धकालीन वीरता पुरस्कार है, जो केवल असाधारण साहस के लिए दिया जाता है। उनकी साइटेशन में लिखा है: “मृत्यु के बाद भी उनके चेहरे पर धैर्य और दृढ़ निश्चय की झलक नजर आ रही थी।”

विरासत: आज भी प्रेरणा का स्रोत

सेकंड लेफ्टिनेंट शमशेर सिंह सामरा की कहानी भारतीय सेना की किताबों में दर्ज है। अमृतसर के उनके गांव परवोकी में उनकी स्मृति में एक स्मारक है। हर साल 16 दिसंबर (विजय दिवस) पर उनकी याद की जाती है। वे हमें सिखाते हैं कि सच्ची देशभक्ति शब्दों में नहीं, बल्कि बलिदान में होती है।

जय हिंद! जय भारत!

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Sepoy Pandurang Salunke सिपाही पांडुरंग साळुंखे: महावीर चक्र विजेता का अमर बलिदान https://shauryasaga.com/sepoy-pandurang-salunke-1971-war-mahavir-chakra/ https://shauryasaga.com/sepoy-pandurang-salunke-1971-war-mahavir-chakra/?noamp=mobile#respond Tue, 11 Nov 2025 05:57:59 +0000 https://shauryasaga.com/?p=5905 सिपाही पांडुरंग साळुंखे: महावीर चक्र विजेता का अमर बलिदान

भारत की स्वतंत्रता और संप्रभुता की रक्षा में अनगिनत वीरों ने अपना सर्वस्व न्योछावर किया है। आज हम बात करेंगे एक ऐसे ही अदम्य साहसी सैनिक की, जिन्होंने 1971 के भारत-पाक युद्ध में अपनी जान की परवाह न करते हुए दुश्मन के छक्के छुड़ा दिए। सिपाही पांडुरंग साळुंखे, जो मरणोपरांत महावीर चक्र से सम्मानित हुए।

प्रारंभिक जीवन और सेना में प्रवेश

सिपाही पांडुरंग साळुंखे
सिपाही पांडुरंग साळुंखे

सिपाही पांडुरंग साळुंखे का जन्म 1 मई 1950 को महाराष्ट्र के सांगली जिले के छोटे से गांव मनीराजुरी में हुआ था। उनके पिता श्री बालकृष्ण साळुंखे एक साधारण किसान परिवार से थे, जहां देशभक्ति और मेहनत की भावना बचपन से ही घर कर गई थी। पांडुरंग जी ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा गांव में ही पूरी की और युवावस्था में देश सेवा का संकल्प लिया।

13 फरवरी 1969 को मात्र 19 वर्ष की आयु में वे भारतीय सेना की प्रसिद्ध 15 मराठा लाइट इंफैन्ट्री में भर्ती हो गए। मराठा रेजिमेंट की वीरता की गाथाएं तो जगप्रसिद्ध हैं, और पांडुरंग जी ने जल्द ही अपनी ट्रेनिंग में उत्कृष्ट प्रदर्शन कर इस रेजिमेंट का हिस्सा बनने का गौरव हासिल किया। वे एक समर्पित सैनिक थे, जिनमें नेतृत्व, साहस और टीमवर्क की अद्भुत क्षमता थी। सेना में उनके साथी उन्हें उनकी निडरता और हंसमुख स्वभाव के लिए याद करते थे।

1971 का भारत-पाक युद्ध: पृष्ठभूमि

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1971 का भारत-पाक युद्ध

1971 का युद्ध भारत के इतिहास का एक स्वर्णिम अध्याय है, जहां हमने न केवल पाकिस्तान को करारी शिकस्त दी, बल्कि बांग्लादेश के निर्माण में निर्णायक भूमिका निभाई। युद्ध की शुरुआत 3 दिसंबर 1971 को हुई, जब पाकिस्तान ने भारत पर हवाई हमले किए। पश्चिमी मोर्चे पर लड़ाई बेहद उग्र थी। 15 मराठा लाइट इंफैन्ट्री को 96 इंफैन्ट्री ब्रिगेड के साथ जोड़ा गया, और उनकी जिम्मेदारी थी सीमा की रक्षा करना तथा खोई हुई चौकियों को पुनः हासिल करना।

उस रात पाकिस्तानी सेना ने बड़ी संख्या में फतेहपुर और बुर्ज सीमा चौकियों पर आक्रमण कर दिया। वहां तैनात सीमा सुरक्षा बल (BSF) के जवान बहादुरी से लड़े, लेकिन दुश्मन की भारी संख्या और आधुनिक हथियारों के सामने चौकियां उनके हाथ चली गईं। यह भारत के लिए एक चुनौती थी – खोई भूमि को वापस लेना आवश्यक था, नहीं तो पूरा मोर्चा खतरे में पड़ जाता।

जवाबी हमला: बुर्ज की लड़ाई

खोई चौकियों को वापस लेने के लिए 15 मराठा लाइट इंफैन्ट्री को तत्काल आदेश मिला। लगभग एक कंपनी strength के सैनिकों को, जिनमें BSF के 35 जवान भी शामिल थे, आर्मर्ड ट्रूप्स (टैंकों) की सहायता से दो दलों में बांट दिया गया। योजना थी – 6 दिसंबर 1971 को सुबह-सुबह धावा बोलना।

युद्ध का भयानक दृश्य
– दुश्मन की तैयारी: पाकिस्तानी सैनिक बंकरों में छिपे थे, जहां से वे मशीनगनों, रॉकेट लॉन्चर्स और ग्रेनेड्स से भारी गोलाबारी कर रहे थे।
– भारतीय सैनिकों का साहस: मराठा सैनिकों ने निकट युद्ध (close-quarters combat) में दुश्मन से भिड़ंत की। एक-एक बंकर को साफ करना पड़ रहा था।
– कई बार सैनिकों ने दुश्मन से हथियार छीन लिए।
– मात्र 1 मीटर की दूरी से बंकरों में हैंड ग्रेनेड्स फेंके गए।
– लड़ाई इतनी उग्र थी कि हवा में बारूद की गंध और चीखें गूंज रही थीं। भारतीय टैंक आगे बढ़ रहे थे, लेकिन दुश्मन की एंटी-टैंक गनें खतरा बनी हुई थीं।

पांडुरंग साळुंखे का निर्णायक क्षण

सिपाही पांडुरंग साळुंखे
सिपाही पांडुरंग साळुंखे

युद्ध के इस चरम क्षण में एक पाकिस्तानी रॉकेट लॉन्चर ने भारतीय टैंकों और पैदल सेना को निशाना बनाना शुरू कर दिया। यह लॉन्चर अगर नहीं रोका जाता, तो पूरी कंपनी तबाह हो सकती थी। तभी सिपाही पांडुरंग साळुंखे ने अपनी जान की बाजी लगा दी।

– उनका साहसिक फैसला: बिना किसी हिचक के वे दुश्मन की ओर लपके।
– कार्रवाई: उन्होंने रॉकेट लॉन्चर के चालक पर हमला किया, उसे मार गिराया और लॉन्चर छीन लिया।
– बलिदान: इस दौरान दुश्मन की स्टेन गन से निकट दूरी से गोलीबारी हुई। पांडुरंग जी को छाती और पेट में कई गोलियां लगीं, और वे वीरगति को प्राप्त हो गए।

उनका यह बलिदान व्यर्थ नहीं गया। रॉकेट लॉन्चर के खतरे के समाप्त होने से मराठा सैनिकों का मनोबल बढ़ा, और वे बुर्ज चौकी पर पुनः कब्जा करने में सफल रहे। इससे 96 इंफैन्ट्री ब्रिगेड की आगे की सफलता का मार्ग प्रशस्त हुआ, और पूरे मोर्चे पर भारत की जीत सुनिश्चित हुई।

महावीर चक्र: सर्वोच्च सम्मान

महावीर चक्र MVC
महावीर चक्र MVC

पांडुरंग साळुंखे की इस अद्वितीय वीरता को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें मरणोपरांत महावीर चक्र से अलंकृत किया। महावीर चक्र युद्धकालीन सर्वोच्च वीरता पुरस्कारों में दूसरा स्थान रखता है (परमवीर चक्र के बाद)। उनकी Citation में लिखा है:

> “सिपाही पांडुरंग साळुंखे ने दुश्मन के रॉकेट लॉन्चर को नष्ट करने के लिए अपनी जान जोखिम में डालकर असाधारण साहस दिखाया, जिससे अपनी यूनिट की सफलता सुनिश्चित हुई।”

यह सम्मान उनके परिवार को सौंपा गया, और आज भी महाराष्ट्र के सांगली जिले में उनकी स्मृति में आयोजन होते हैं।

विरासत और प्रेरणा

पांडुरंग साळुंखे मात्र 21 वर्ष के थे जब वे अमर हो गए। उनका बलिदान हमें सिखाता है:
– देशभक्ति की कोई उम्र नहीं होती।
– साहस छोटे-छोटे फैसलों में छिपा होता है।
– एक सैनिक का बलिदान पूरे राष्ट्र को मजबूत बनाता है।

आज 15 मराठा लाइट इंफैन्ट्री में उनकी कहानी नए सैनिकों को ट्रेनिंग का हिस्सा है। मनीराजुरी गांव में उनकी प्रतिमा स्थापित है, और हर साल 6 दिसंबर को विजय दिवस पर उन्हें याद किया जाता है।

विवरण जानकारी
जन्म 1 मई 1950, मनीराजुरी, सांगली, महाराष्ट्र
पिता का नाम श्री बालकृष्ण साळुंखे
सेना में भर्ती 13 फरवरी 1969, 15 मराठा लाइट इंफैन्ट्री
युद्ध 1971 भारत-पाक युद्ध, पश्चिमी मोर्चा
निर्णायक तारीख 6 दिसंबर 1971
बलिदान बुर्ज चौकी पर रॉकेट लॉन्चर छीनते हुए
सम्मान मरणोपरांत महावीर चक्र

श्रद्धांजलि

सिपाही पांडुरंग साळुंखे जैसे वीरों के कारण आज हम सुरक्षित हैं। उनकी कहानी हर भारतीय को प्रेरित करती है कि जरूरत पड़ने पर अपना सब कुछ न्योछावर कर दें।

जय हिंद! 

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Captain Chander Narayan Singh कप्तान चन्दर नारायण सिंह शौर्य गाथा: महावीर चक्र विजेता (मरणोपरांत) https://shauryasaga.com/captain-chander-narayan-singhv-maha-vir-chakra/ https://shauryasaga.com/captain-chander-narayan-singhv-maha-vir-chakra/?noamp=mobile#respond Thu, 06 Nov 2025 10:44:15 +0000 https://shauryasaga.com/?p=5864

आज हम भारतीय सेना के एक ऐसे महान सपूत की कहानी से रूबरू होंगे, जिन्होंने देश की रक्षा में अपनी निजी सुरक्षा की परवाह न करते हुए, अदम्य साहस और प्रेरक नेतृत्व का परिचय दिया। हम बात कर रहे हैं कप्तान चन्दर नारायण सिंह, जिन्हें 1965 के भारत-पाक युद्ध के दौरान वीरगति प्राप्त करने पर, देश के दूसरे सर्वोच्च सैन्य सम्मान महावीर चक्र (मरणोपरांत) से अलंकृत किया गया।

वंश और पृष्ठभूमि

कप्तान चन्दर नारायण सिंह
कप्तान चन्दर नारायण सिंह

कप्तान चन्दर नारायण सिंह का जन्म 02 जुलाई, 1939 को जम्मू और कश्मीर के श्रीनगर में हुआ था। उनके घर में सैन्य सेवा एक वंशानुगत परंपरा थी। उनके पिता, कप्तान बलवंत सिंह, और चाचा भी भारतीय सेना में उच्च पदों पर आसीन थे। यह वातावरण ही था जिसने युवा चन्दर नारायण सिंह में बचपन से ही देशभक्ति और साहस के बीज बो दिए थे।

इस गौरवशाली परंपरा को आगे बढ़ाते हुए, उन्हें 11 जून, 1961 को भारतीय सेना की अत्यंत प्रतिष्ठित रेजिमेंट गढ़वाल राइफल्स में कमीशन मिला। सेना में उनका शुरुआती कार्यकाल उनकी प्रोफेशनल दक्षता और नेतृत्व क्षमता को निखारने में बीता, जो बाद में उन्हें एक अभूतपूर्व सैन्य अधिकारी के रूप में स्थापित करने वाला था।

पुंछ में निर्णायक क्षण

1965 ind pak war
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अगस्त 1965, वह समय था जब भारत-पाकिस्तान सीमा पर तनाव चरम पर था और युद्ध की आहट सुनाई दे रही थी। कप्तान चन्दर नारायण सिंह उस समय पुंछ सेक्टर में 120 इंफैन्ट्री ब्रिगेड मुख्यालय में एक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी संभाल रहे थे।

05 अगस्त, 1965 को एक अति-महत्वपूर्ण और खतरनाक खुफिया जानकारी मिली: 5 पाकिस्तानी घुसपैठिए भारतीय क्षेत्र में प्रवेश कर चुके थे और वे सीधे ब्रिगेड मुख्यालय के आसपास देखे गए थे। यह घुसपैठ न सिर्फ एक सैन्य खतरा थी, बल्कि मुख्यालय की सुरक्षा और संचालन के लिए एक गंभीर चुनौती थी। किसी भी बड़े खतरे को टालने के लिए तत्काल और निर्णायक कार्रवाई आवश्यक थी।

इस नाजुक स्थिति में, 26 वर्षीय कप्तान चन्दर नारायण सिंह को घुसपैठियों को ढूंढ निकालने और उनका सफाया करने के लिए एक गश्ती दल का नेतृत्व करने की जिम्मेदारी सौंपी गई। यह मिशन अत्यधिक जोखिम भरा था, खासकर शाम के धुंधलके में, जब दुश्मन के पास छिपने और घात लगाने का प्राकृतिक लाभ होता है। गश्ती दल 18:30 बजे (शाम 6:30 बजे) अंधेरे और ऊबड़-खाबड़ पर्वतीय इलाके में रवाना हुआ।

दुश्मन के ठिकाने पर साहसी हमला

रात का निर्णायक धावा

1965 ind pak war
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एक घंटे की गहन खोज के बाद, 19:30 बजे (शाम 7:30 बजे), गश्ती दल को अचानक भीषण गोलाबारी का सामना करना पड़ा। दुश्मन एक ऊंचाई पर स्थित ठिकाने से हल्की मशीन गन (LMGs), मोर्टार और हथगोलों से आग उगल रहा था। इस अचानक और भारी हमले से एक भारतीय सैनिक की शहादत हो गई।

स्थिति विकट थी, लेकिन कप्तान चन्दर नारायण सिंह की दृढ़ता और शांत मन अविचलित रहा। उन्होंने तुरंत स्थिति का आकलन किया। दुश्मन को उनकी स्थिति से बेदखल करना आसान नहीं था, लेकिन जान गंवाने के बजाय, उन्होंने रणनीतिक चतुराई का प्रदर्शन किया।

भारी गोलाबारी से अपने दल को बचाते हुए, उन्होंने बड़ी समझदारी से गश्ती दल को दुश्मन के पार्श्व (Flank) की ओर ले गए, जहाँ उन्हें प्राकृतिक ओट (कवर) मिल गई। यह एक मास्टरस्ट्रोक था। नई स्थिति से, भारतीय सैनिकों ने सटीक जवाबी कार्रवाई की। इस पैंतरेबाजी के कारण, दुश्मन की वे LMGs, जो पहले प्रभावी ढंग से गश्ती दल पर हमला कर रही थीं, तुरंत निष्क्रिय हो गईं।

लेकिन दुश्मन संख्या में अधिक और अच्छी तरह से जमा हुआ था। कप्तान चन्दर नारायण सिंह ने दिन के उजाले में सीधी लड़ाई के बजाय रात के अंधेरे का फायदा उठाने का निर्णय लिया। उन्होंने रात को धावा बोलने की योजना बनाई।

परिणाम

कप्तान चन्दर नारायण सिंह
कप्तान चन्दर नारायण सिंह

व्यक्तिगत सुरक्षा की परवाह न करते हुए, कप्तान सिंह ने अपनी वीरता की पराकाष्ठा दिखाते हुए, मुट्ठी भर सैनिकों के साथ रात में दुश्मन पर धावा बोल दिया। मोर्टार की गर्जना और हथगोलों की बौछार के बीच, उन्होंने अपने सैनिकों को प्रेरित किया और उन्हें आगे बढ़ाया। उनका लक्ष्य स्पष्ट था: घुसपैठियों के ठिकाने को नष्ट करना

अविश्वसनीय साहस का परिचय देते हुए, कप्तान चन्दर नारायण सिंह अपनी टीम के साथ दुश्मन के ठिकाने के 50 मीटर अंदर तक घुस गए। उनकी दहाड़ और प्रेरणा ने उनके सैनिकों में नई ऊर्जा भर दी। उन्होंने तुरंत बिना रुके दूसरा आक्रमण शुरू किया, और दुश्मन की चौकी के 10 मीटर के करीब पहुँच गए।

विजय की दहलीज पर, नियति ने अपना क्रूर खेल दिखाया। इसी क्षण, दुश्मन की एक लाइट मशीन गन की बौछार उनके सीने में लगी और कप्तान चन्दर नारायण सिंह ने देश की सेवा में अपनी अंतिम सांस ली।

हालांकि उन्होंने अपनी जान गंवा दी, लेकिन उनका बलिदान व्यर्थ नहीं गया। उनके साहसी और निर्णायक हमले ने दुश्मन को भारी नुकसान पहुंचाया। इस मुठभेड़ में 6 पाकिस्तानी सैनिक मारे गए और कई घायल हुए। दुश्मन भगदड़ में बड़ी मात्रा में गोला-बारूद पीछे छोड़ गया।

सम्मान महावीर चक्र

महावीर चक्र MVC
महावीर चक्र MVC

कप्तान चन्दर नारायण सिंह को विशिष्ट वीरता, अदम्य साहस और उत्कृष्ट प्रेरक नेतृत्व के लिए मरणोपरांत महावीर चक्र से अलंकृत किया गया।

उनका यह सर्वोच्च बलिदान भारतीय सेना के अमर बलिदानों में हमेशा याद किया जाएगा, जो हमें सिखाता है कि कर्तव्य हमेशा सुरक्षा से ऊपर होता है।

जय हिन्द! 

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नायक सुगन सिंह (महावीर चक्र) – शौर्य और बलिदान की अमर गाथा

नायक सुगन सिंह
नायक सुगन सिंह

भारत की सैन्य इतिहास में कई ऐसे नाम दर्ज हैं, जिन्होंने अपने अदम्य साहस और सर्वोच्च बलिदान से राष्ट्र के गौरव को बढ़ाया है। इन्हीं वीरों में से एक हैं नायक सुगन सिंह, जिन्हें 1971 के भारत-पाक युद्ध में उनकी असाधारण वीरता के लिए मरणोपरांत भारत का दूसरा सबसे बड़ा सैन्य अलंकरण ‘महावीर चक्र’ प्रदान किया गया। उनकी कहानी न केवल एक सैनिक के कर्तव्य की पराकाष्ठा है, बल्कि यह भी दर्शाती है कि मातृभूमि की रक्षा के लिए एक सच्चा योद्धा किस हद तक जा सकता है।

प्रारंभिक जीवन और सैन्य यात्रा

नायक सुगन सिंह
नायक सुगन सिंह
Rajputana_Rifles_Insignia_(India)
Rajputana_Rifles_Insignia_(India)

नायक सुगन सिंह का जन्म 06 मार्च, 1942 को राजस्थान के नागौर जिले में हुआ था। उनके पिता का नाम श्री अबे सिंह था। एक साधारण पृष्ठभूमि से आने वाले सुगन सिंह में देशप्रेम और सेवा का जज़्बा कूट-कूट कर भरा था। अपने इसी जुनून के चलते, वह अपने जन्म दिवस के दिन, 06 मार्च, 1962 को भारतीय सेना की प्रतिष्ठित राजपूताना राइफल्स रेजिमेंट में भर्ती हुए। अपनी मेहनत और लगन से उन्होंने सेना में नायक का पद प्राप्त किया, और अपनी बटालियन, 17 राजपूताना राइफल्स के एक महत्वपूर्ण सदस्य बन गए।

1971 का युद्ध: पूर्वी मोर्चे पर चुनौती

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1971 का भारत-पाक युद्ध

जब 1971 में भारत-पाक युद्ध छिड़ा, तो नायक सुगन सिंह की 17 राजपूताना राइफल्स को पूर्वी मोर्चे पर तैनात किया गया था। यह युद्ध न केवल बांग्लादेश की मुक्ति के लिए लड़ा जा रहा था, बल्कि यह भारतीय सेना के शौर्य की भी परीक्षा थी। युद्ध के निर्णायक क्षणों में, 09 दिसंबर, 1971 को, उनकी बटालियन को एक अत्यंत महत्वपूर्ण और दुर्गम लक्ष्य सौंपा गया: मैनामती रिज पर हमला कर एक मोर्चा स्थापित करना।

मैनामती रिज एक रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण कड़ी थी। यह रिज शत्रु की रक्षा-व्यवस्था का केंद्र था, और इसे सुरक्षित किए बिना मैनामती छावनी (कैंटोनमेंट) पर कब्जा करना लगभग असंभव था। शत्रु ने इस रिज की सुरक्षा के लिए एक संपूर्ण ब्रिगेड ग्रुप तैनात कर रखा था, और यह क्षेत्र खाइयों, मजबूत बंकरों और सुरंगों से भली-भांति सुरक्षित था। यह रिज उस कुमुक (Reinforcement) को रोकने के लिए भी महत्वपूर्ण था, जो चांदपुर से पाकिस्तानी सेना की मदद के लिए आ सकती थी। इसलिए, इस रिज पर तुरंत हमला करने का निर्णय लिया गया।

मैनामती रिज पर धावा और अदम्य साहस

09 दिसंबर की रात को, बटालियन ने लक्ष्य की ओर कूच किया। घने अंधेरे और शत्रु की निगरानी के बीच, 12 किलोमीटर की लंबी दूरी तय करके, धावामार सैनिक आधी रात को आक्रमण के लिए निर्धारित स्थान पर पहुँचे।

10 दिसंबर को 0230 बजे, बटालियन ने पश्चिम दिशा से हमला शुरू किया। इस आक्रमण में, नायक सुगन सिंह बटालियन के एक आक्रामक सेक्शन का नेतृत्व कर रहे थे।

जैसे ही उनका सेक्शन लक्ष्य के करीब पहुँचा, दुश्मन ने तीव्र और विनाशकारी प्रतिक्रिया दी। भली-भांति तैयार ठिकानों से मीडियम मशीन गन (MMG) और छोटे हथियारों से गोलियों की बौछार शुरू हो गई। इस भीषण गोलीबारी ने भारतीय सैनिकों की प्रगति को क्षण भर के लिए रोक दिया।

नायक सुगन सिंह शत्रु की इस बेअदबी (चुनौती) को सहन नहीं कर सके। उन्होंने तुरंत दुश्मन की मीडियम मशीन गन को नष्ट करने का संकल्प लिया और अकेले ही उस पर आक्रमण कर दिया।

चोट, दृढ़ संकल्प और सर्वोच्च बलिदान

नायक सुगन सिंह
नायक सुगन सिंह

शत्रु के ठिकाने की ओर बढ़ते हुए, गोलियों की एक बौछार ने उनके कंधों पर बड़ी चोट पहुँचाई, जिससे भारी रक्तस्राव होने लगा। परंतु इस गंभीर चोट ने भी उनके दृढ़ संकल्प को डिगने नहीं दिया।

  1. पहले बंकर पर हमला: घायल अवस्था में भी, उन्होंने अपना प्रयास जारी रखा। वे रेंगकर दुश्मन के पहले बंकर तक पहुँचे, उसमें एक हथगोला फेंका और उस बंकर के दो रक्षकों को मार गिराया, जिससे वह MMG शांत हो गई।
  2. दूसरे बंकर की ओर: इसके बाद, उन्होंने दूसरी मीडियम मशीन गन के ठिकाने की ओर रेंगना शुरू किया। इस बीच, अत्यधिक खून बह जाने के कारण वे अत्यंत दुर्बल हो गए और लड़खड़ा कर गिर पड़े।
  3. अंतिम साँस तक संघर्ष: अपनी शारीरिक शक्ति लगभग खो चुके होने पर भी, शहीद ने हार नहीं मानी। वे फिर से रेंगकर दूसरे बंकर तक पहुँचे, उसमें एक और हथगोला फेंका और दुश्मन के तीन सैनिकों को मार गिराया।

दुश्मन की दो प्रमुख मशीन गनों को शांत करके, उन्होंने अपनी बटालियन के लिए आगे बढ़ने का मार्ग प्रशस्त कर दिया। हालाँकि, इसी स्थान पर एक विस्फोट से उनकी भी वीरगति प्राप्त हुई।

विरासत और सम्मान

नायक सुगन सिंह ने अकेले दम पर दुश्मन के दो मजबूत ठिकानों को ध्वस्त कर दिया, जिससे उनकी बटालियन मैनामती रिज पर अपना मोर्चा (लॉजमेंट) स्थापित करने में सफल रही, जो अंततः मैनामती कैंटोनमेंट पर कब्जे के लिए महत्वपूर्ण साबित हुआ। उनका यह कार्य वीरता, कर्तव्यनिष्ठा और साहस की एक अद्वितीय मिसाल है।

मरणोपरांत महावीर चक्र

महावीर चक्र MVC
महावीर चक्र MVC

उनके इस असाधारण वीरता और सर्वोच्च बलिदान के लिए, भारत सरकार ने उन्हें मरणोपरांत ‘महावीर चक्र’ से सम्मानित किया।

नायक सुगन सिंह का जीवन हमें यह सिखाता है कि युद्ध केवल हथियारों से नहीं, बल्कि सैनिक के साहस और इच्छाशक्ति से जीते जाते हैं। उनका बलिदान आज भी हर भारतीय को देश की संप्रभुता और अखंडता की रक्षा के लिए प्रेरित करता रहेगा।

हम भारत माँ के इस अमर सपूत को शत-शत नमन करते हैं!

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