Captain Anuj Nayyar कैप्टन अनुज नय्यर की शौर्य गाथा : कारगिल का वो जांबाज, जिसने मौत को गले लगाकर तिरंगा फहराया
Captain Anuj Nayyar :- जब भी भारत के वीर सपूतों की बात होती है, तो 1999 के कारगिल युद्ध का नाम सबसे पहले आता है। यह एक ऐसा युद्ध था जिसने दुनिया को दिखाया कि भारतीय सेना के पास न केवल आधुनिक हथियार हैं, बल्कि ऐसे जिगरे वाले सिपाही भी हैं जो अपनी मातृभूमि के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। इन्हीं नायकों में से एक थे कैप्टन अनुज नय्यर। मात्र 24 साल की उम्र में उन्होंने जो वीरता दिखाई, उसने उन्हें इतिहास के पन्नों में अमर कर दिया।
| विवरण | जानकारी |
| पूरा नाम | कैप्टन अनुज नय्यर Captain Anuj Nayyar |
| जन्म | 28 अगस्त, 1975 |
| जन्म स्थान | दिल्ली, भारत |
| पिता का नाम | प्रो. एस. के. नय्यर (दिल्ली मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन के पूर्व कार्यकारी निदेशक) |
| माता का नाम | श्रीमती मीना नय्यर |
| रेजीमेंट | 17 जाट (17 Jat Regiment) |
| सम्मान | महावीर चक्र (मरणोपरांत) |
बचपन और सेना में आने का अटूट सपना

28 अगस्त 1975 को दिल्ली के एक मध्यमवर्गीय परिवार में जन्मे Captain Anuj Nayyar बचपन से ही अन्य बच्चों से अलग थे। उनके पिता, प्रोफेसर एस.के. नय्यर, दिल्ली मेट्रो में कार्यरत थे। अनुज की शुरुआती शिक्षा दिल्ली के धौला कुआं स्थित आर्मी पब्लिक स्कूल से हुई।
सेना की वर्दी के प्रति Captain Anuj Nayyar का आकर्षण इतना गहरा था कि उन्होंने अपनी स्कूली शिक्षा पूरी करते ही नेशनल डिफेंस एकेडमी (NDA) की परीक्षा दी और सफल हुए। NDA के 90वें कोर्स से पास आउट होने के बाद, उन्होंने भारतीय सैन्य अकादमी (IMA) में प्रशिक्षण लिया। जून 1997 में वे भारतीय सेना की प्रतिष्ठित ’17 जाट रेजीमेंट’ में बतौर ऑफिसर शामिल हुए।
कारगिल युद्ध और मुश्कोह घाटी का मोर्चा
साल 1999 की गर्मियों में जब पाकिस्तान ने विश्वासघात करते हुए कारगिल की चोटियों पर कब्जा कर लिया, तब कैप्टन अनुज नय्यर को मोर्चे पर भेजा गया। उनकी टुकड़ी को मुश्कोह घाटी में स्थित पॉइंट 4875 को वापस जीतने का लक्ष्य दिया गया। यह रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण चोटी थी, क्योंकि यहाँ से दुश्मन भारतीय सेना के रसद मार्ग पर सीधी नज़र रख सकते थे।
6 जुलाई 1999 की वह रात इतिहास में दर्ज होने वाली थी। Captain Anuj Nayyar को अपनी कंपनी के ‘चार्ली’ ग्रुप का नेतृत्व करने की जिम्मेदारी दी गई। उनकी टुकड़ी को बिना किसी तोपखाने (Artillery) की मदद के ऊपर की ओर चढ़ना था, जबकि दुश्मन चोटी पर बंकर बनाकर बैठे थे और लगातार गोलियों की बौछार कर रहे थे।
अदम्य साहस: जब अकेले ही नष्ट किए चार बंकर
चढ़ाई के दौरान, Captain Anuj Nayyar और उनकी टीम पर भारी गोलीबारी हुई। लेकिन Captain Anuj Nayyar के इरादे चट्टान की तरह मजबूत थे। उन्होंने अपनी टीम को कवर दिया और खुद आगे बढ़कर दुश्मन के पहले बंकर पर ग्रेनेड से हमला किया। पहला बंकर तबाह हो गया। इसके बाद उन्होंने हार नहीं मानी और दूसरे तथा तीसरे बंकर को भी आमने-सामने की लड़ाई (Hand-to-Hand Combat) में नष्ट कर दिया।
अंतिम बंकर को नष्ट करते समय, एक दुश्मन का आरपीजी (RPG) सीधे अनुज को लगा। वे गंभीर रूप से घायल हो गए और खून से लथपथ थे। लेकिन मौत को सामने देखकर भी इस वीर योद्धा के कदम पीछे नहीं हटे। Captain Anuj Nayyar ने चौथे बंकर को भी नष्ट किया और यह सुनिश्चित किया कि उनके साथी चोटी पर कब्जा कर सकें। अंतिम सांस लेने से पहले उन्होंने अपनी टीम को लक्ष्य हासिल करते देखा।
मरणोपरांत सम्मान और अनमोल विरासत

Captain Anuj Nayyar की इस शहादत ने न केवल उनके परिवार को, बल्कि पूरे देश को गर्व से भर दिया। उनकी असाधारण वीरता के लिए भारत सरकार ने उन्हें मरणोपरांत महावीर चक्र (MVC) से सम्मानित किया। जिस ‘पॉइंट 4875’ पर उन्होंने अपने प्राणों की आहुति दी, उसे आज सेना में सम्मान के साथ ‘नय्यर हिल’ के नाम से पुकारा जाता है।
एक भावुक पहलू यह भी है कि युद्ध पर जाने से कुछ समय पहले ही उनकी सगाई हुई थी और कुछ ही महीनों बाद उनकी शादी होने वाली थी। उनके पिता आज भी उनकी यादों को संजोकर रखते हैं। वे अक्सर बताते हैं कि अनुज के जूतों को वे आज भी खुद पॉलिश करते हैं, मानो उनका बेटा अभी सरहद से लौटकर आएगा।

Captain Anuj Nayyar की कहानी केवल युद्ध की कहानी नहीं है, बल्कि यह कहानी है उस जुनून की जो वतन की मिट्टी के लिए मर मिटने की प्रेरणा देता है। 24 साल की उम्र में जहाँ युवा अपने करियर की शुरुआत कर रहे होते हैं, अनुज ने देश के लिए सर्वोच्च बलिदान दे दिया। आज का युवा वर्ग उनसे नेतृत्व, साहस और अटूट कर्तव्यनिष्ठा की सीख ले सकता है।
Captain Anuj Nayyar जैसे नायकों के कारण ही आज हम चैन की नींद सो पाते हैं। उनके बलिदान को यह देश कभी नहीं भूलेगा।
जय हिंद, जय भारत!
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